चुनाव आयोग ने कहा है कि मतदाता सूचियों का विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) निष्पक्ष, न्यायसंगत और सही प्रक्रिया है। आयोग ने गुरुवार को सुप्रीम कोर्ट से अपील की कि बिहार में इस प्रक्रिया को चुनौती देने वाली याचिकाओं को खारिज कर दिया जाए।
चुनाव आयोग की ओर से पेश हुए सीनियर एडवोकेट राकेश द्विवेदी ने कहा, ‘‘बिहार एसआईआर में जिन 66 लाख लोगों के नाम हटाये गये थे, उनमें से कोई भी इस अदालत या हाईकोर्ट में नहीं आया और न ही उन्होंने चुनाव आयोग के समक्ष कोई याचिका दायर की। एडीआर (एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स), पीयूसीएल (पीपुल्स यूनियन फॉर सिविल लिबर्टी) तथा कुछ सांसदों के कहने पर बिना किसी ठोस आधार के जांच की अनुमति नहीं दी जा सकती।’’
द्विवेदी ने बिहार समेत विभिन्न राज्यों में एसआईआर की प्रक्रिया के निर्णय को चुनौती देने संबंधी याचिकाओं की अंतिम सुनवाई के दौरान ये दलीलें पेश कीं।
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सुप्रीम कोर्ट के फैसले का किया जिक्र
द्विवेदी ने उस फैसले का जिक्र किया जिसमें सुप्रीम कोर्ट ने बैलेट पेपर को फिर से लागू करने और इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन (ईवीएम) को रद्द करने की याचिका खारिज कर दी थी।
द्विवेदी ने कहा, ‘संक्षेप में, हमें यूरोप का अनुसरण करना चाहिए। अगर वे ईवीएम को अपनाते हैं, तो हमें भी इसे अपनाना चाहिए। और अगर वे बैलेट पेपर को अपनाते हैं, तो हमें भी इसे अपनाना चाहिए।’ उन्होंने कहा कि एक व्यक्ति अखबार में लेख लिखता है और दूसरा व्यक्ति उसी का हवाला देते हुए सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर करता है।
चुनाव आयोग के विवेक पर निर्भर- द्विवेदी
द्विवेदी ने सीजेआई सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्य बागची की बेंच से अपील की कि वे इस संबंध में दायर याचिकाओं को खारिज कर दें और साथ ही जुर्माना भी लगाया जाये क्योंकि एसआईआर लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950 के तहत चुनाव आयोग की शक्तियों के मुताबिक उठाया गया कदम है। उन्होंने दलील दी कि एक बार जब चुनाव आयोग 1950 के अधिनियम की धारा 21(3) के तहत अपनी शक्तियों का इस्तेमाल करता है तो एसआईआर को करने का तरीका और प्रक्रिया पूरी तरह से उसके विवेक पर निर्भर करती है।
द्विवेदी ने कहा कि बिहार में लगभग 20 साल से एसआईआर की कवायद नहीं की गई थी और इसे शहरीकरण और आबादी के इधर से उधर होने के बाद बदलते हालातों को देखते हुए किया गया। हालांकि, सीजेआई ने कहा कि अगर चुनाव आयोग का यह तर्क मान लिया जाता है कि धारा 21(3) बिना किसी रोक-टोक के विवेक का अधिकार देती है, तो ‘‘मामला यहीं पर खत्म हो जाएगा।’’
जस्टिस बागची ने सवाल किया कि क्या बदला हुआ नागरिकता ढांचा मौजूदा एसआईआर का कारण था। उन्होंने कहा कि चुनाव आयोग के आदेश में साफ तौर पर सीमा पार या अवैध प्रवासन को इसका आधार नहीं बताया गया था। जस्टिस बागची ने कहा, ‘‘आमतौर पर ‘प्रवासन’ शब्द का मतलब कानूनी आवाजाही होता है। एक राज्य से दूसरे राज्य में जाना संवैधानिक अधिकार है’’।
द्विवेदी ने कहा कि यह संशोधन पहले कभी लागू नहीं किया गया था और मौजूदा एसआईआर बदले हुए कानूनी ढांचे पर ध्यान देने का एक सही मौका देता है। उन्होंने साफ किया कि मकसद संविधान के अनुच्छेद 326 के दायरे में नागरिकता की जांच करना था, जो मताधिकार की गारंटी देता है।
बीएलए करते हैं सत्यापन
द्विवेदी ने कहा कि बूथ स्तर के एजेंट (बीएलए) घर-घर जाकर सत्यापन करते हैं, मतदाताओं को पांच करोड़ से अधिक एसएमएस अलर्ट भेजे गए और इस प्रक्रिया में सख्ती से सुरक्षा कदमों का पालन किया गया। उन्होंने बताया कि लगभग 76 प्रतिशत मतदाताओं को कोई दस्तावेज जमा करने की आवश्यकता नहीं थी, जबकि अन्य को 11 निर्धारित दस्तावेजों में से किसी एक को लाने की अनुमति दी गई थी।
