निधि शर्मा
शिक्षक का काम विद्यार्थियों को सिर्फ पाठ्यक्रम पढ़ाना ही नहीं, बल्कि उनको शारीरिक, मानसिक और आध्यात्मिक विकास के लिए प्रेरित करना भी है। इस अहम भूमिका के बावजूद पिछले दिनों की कुछ घटनाओं ने अध्यापक की भूमिका पर ही प्रश्न चिह्न लगाए। किसी स्कूल में बच्चों को बच्चों के खिलाफ खड़ा कर दिया गया तो किसी में बच्चे को समझाने की जगह उसकी पिटाई कर दी गई। हालांकि यह समझना मुश्किल है कि शिक्षा और मनोविज्ञान की प्राथमिक शर्त के रूप में कुछ शिक्षक यह क्यों नहीं समझ पाते कि बच्चे के खिलाफ किसी भी तरह का आक्रामक बर्ताव या हिंसा उस पर बेहद नकारात्मक असर डालेगा। लेकिन इससे भी आगे बढ़ कर जब शिक्षा के क्षेत्र में धर्म और जाति के नाम पर शिक्षकों के द्वारा विद्यार्थियों को जांचा और परखा जाएगा तो समझा जा सकता है कि समाज में कैसी पीढ़ी-लिखी युवा पीढ़ी तैयार होगी।
सोशल मीडिया से लेकर अनेक मंचों के जरिए आक्रामकता, हिंसा और नफरत के बीज बोए जा रहे
यों भी वर्तमान में युवा पीढ़ी के मन में सोशल मीडिया से लेकर अनेक मंचों के जरिए आक्रामकता, हिंसा और नफरत के बीज बोए जा रहे हैं, जिनसे बनने वाला पौधा किसी भी हाल में खुशहाल समाज की नींव नहीं रख सकता। छोटी-छोटी बातों पर युवाओं के अलग-अलग गुट बन जाते हैं, उनके बीच मनमुटाव का रूप कई बार हिंसा की शक्ल ले लेता है। किसी भी राय प्रभावित करने वाले समूह के बहकावे में आकर तर्कहीन विचार का अनुसरण करना आम हो गया है।
इस परिस्थिति में विद्यार्थियों के मानसिक विकास में एक अध्यापक की बहुत बड़ी भूमिका होती है। लेकिन अगर अध्यापक की भूमिका ही तर्कसंगत न हो, तो समाज किससे आशा करेगा? सबसे महत्त्वपूर्ण बात यह है कि सोशल मीडिया के अधिक प्रसार से पहले बच्चा अपनी मां के बाद शिक्षक से ही ज्ञान प्राप्त करते थे। लेकिन इंटरनेट आधारित विभिन्न माध्यमों के प्रचार-प्रसार के कारण विद्यार्थियों की निर्भरता उन पर अधिक हो गई है।
शिक्षक किताबी ज्ञान के साथ-साथ तर्कसंगत शिक्षण पर फोकस करें
सूचना की अधिकता के कारण आज विद्यार्थियों के मन में बढ़ती शंका ने ही कई समस्याओं को जन्म दे दिया है। इस बिंदु को ध्यान में रखते हुए शिक्षकों को किताबी ज्ञान के साथ-साथ तर्कसंगत शिक्षण की ओर भी ध्यान देना पड़ेगा। अध्यापकों को यह समझना पड़ेगा कि आज वे उस युवा पीढ़ी को शिक्षित कर रहे हैं जो तकनीक के माध्यम से सोचती, समझती और संचालित होती है। इस पीढ़ी में आलोचनात्मक विवेक के साथ सोच को विकसित करने की जिम्मेदारी शिक्षकों पर है, ताकि उनकी ऊर्जा को सही दिशा में लगाया जा सके।
शिक्षा के क्षेत्र में प्रेरणा और रुचि का सिद्धांत बहुत कारगर है, क्योंकि वर्तमान में विभिन्न क्रिया-कलापों से बच्चों और उनके माता-पिता पर गैरजरूरी बोझ डाला जा रहा है। जबकि जरूरी है कि बचपन से ही उनकी रुचि को समझकर अध्यापक उन्हें उसे प्राप्त करने के लिए प्रेरित करे, ताकि उसकी रुचि को सही दिशा में लगा कर उसकी मंजिल तक पहुंचाया जा सके। शिक्षकों को चाहिए कि विद्यार्थियों की व्यक्तिगत विभिन्नताओं की जानकारी से लेकर शिक्षण कार्य करे, उन्हें सिखाने-समझाने के नए तरीके निकाले, ताकि शिक्षा में कम होती रुचि वाले बच्चों की भागीदारी को बढ़ाया जा सके। हरेक बच्चे की ग्राहय क्षमता और प्रकार अलग-अलग हो सकती है।
उन्हें समझाने की तरीके की खोज करना शिक्षक का ही दायित्व है। यह बहाना कमजोर है कि बच्चे ने कोई पाठ याद नहीं किया तो उसके लिए वह बच्चा ही जिम्मेदार है। इसमें शिक्षक की कमजोरी भी झलकती है। फिर इसके लिए बच्चे की पिटाई या बच्चों से पिटवाना या फिर किसी बच्चे की सामाजिक पृष्ठभूमि पर निशाना साधना तो हर हाल में शिक्षक को कठघरे में खड़ा करता है।
आज सबसे बड़ी चुनौती बच्चों के मानसिक विकास को गति देने की है, क्योंकि दिखावटी क्रियाकलापों से उनकी अपनी रुचि, सोच और विचार अत्यधिक प्रभावित हो रही है, जिसके कारण अधिक दबाव महसूस होने से वे या तो आत्महत्या कर रहे हैं या हिंसक हो रहे हैं। इसके लिए सीधे तो नहीं, लेकिन अप्रत्यक्ष रूप से माता-पिता के बाद अध्यापकों की जिम्मेवारी बनती है, क्योंकि बच्चे के सोचने-समझने और चीजों को देखने का मानस तैयार होने में माता-पिता, परिवार, समाज और शिक्षक की भूमिका बेहद अहम होती है। इसलिए जरूरी है कि भागीदारी पूर्ण शिक्षा पद्धति को अपनाया जाए, ताकि न उस पर अध्यापक हावी हो, और न ही विद्यार्थी, क्योंकि एक तरफ शिक्षा पद्धति से विद्यार्थी और अध्यापक, दोनों का ही नुकसान होता है, तो दूसरी इसका घाटा समाज और देश को भी उठाना पड़ता है।
अभिभावक से लेकर हर तरफ लोग या कई बार अध्यापक अपने विचार, अनुभवों और क्रियाओं को बच्चों पर थोपने की कोशिश करते हैं, जो वर्तमान में हो रही घटनाओं को जन्म देती है और वहीं दूसरी तरफ छात्र खुद को सर्वोपरि समझने लगते हैं, जिसके कारण अध्यापकों के प्रति आदर का भाव कम होता है। इसलिए यह समझना होगा कि नई शिक्षा नीतियों से शिक्षा के स्वरूप में तो बदलाव लाया जा सकता है, पर शिक्षक और विद्यार्थी के स्तर में सकारात्मक बदलाव आपसी भागीदारी और तर्कशीलता से ही लाया जा सकता है।
