किशोर या किशोरियों के साथ लैगिंक अपराधों के संबंध में मुकदमा दर्ज नहीं करने की शिकायत मिली तो संबंधित थानेदार के खिलाफ मुकदमा दर्ज करा दिया जाएगा। कलेक्ट्रेट सभागार में जिलाधिकारी ने समेकित बाल संरक्षण योजना के तहत पुलिस व प्रशासनिक अधिकारियों की बैठक में यह बात कही। उन्होंने कहा कि बालकों के साथ हो रहे उत्पीड़न चाहे वह लैंगिक अपराध का प्रयास हो या घटना घट चुकी हो, इस संबंध में कड़ी कार्रवाई की जानी चाहिए।

शासन के निर्देश पर बालकों को लैंगिक अपराधों से बचाने व इसकी रोकथाम करने के लिए जिलाधिकारी डा सरोज कुमार व पुलिस अधीक्षक दीपक कुमार भट्ट की मौजूदगी में जनपद के सभी थानेदारों, तीनों तहसीलों के उप-जिलाधिकारियों, पुलिस क्षेत्राधिकारियों व तहसीलदारों व विशेष किशोर पुलिस इकाई व जनपद के शासकीय अधिवक्ता फौजदारी व जिला प्रोबेशन अधिकारी व अन्य समाजसेवियों की बैठक बुलाई गई।

इसमें राष्ट्रीय बाल संरक्षण आयोग दिल्ली के दिशा निर्देश की जानकारी देते हुए जिला प्रोबेशन अधिकारी विनोद कुमार राय ने बताया कि यदि किसी किशोर या किशोरी के साथ लैंगिक अपराध होता है तो इसकी सूचना पर तत्काल संबंधित थानाक्षेत्र के थानेदार क मामला दर्ज करना चाहिए।

महिला पुलिस अधिकारी जो पुलिस उप-निरीक्षक स्तर से नीचे की अधिकारी न हो, को पीड़ित के घर पर जाकर लेनी चाहिए उसको थाने नहीं बुलाना चाहिए। इसके अलावा उस पीड़ित के अभिभावकों के साथ उसको अस्पताल ले जाकर मेडिकल परीक्षण कराया जाना चाहिए। पीड़ित को बार-बार थाने पर नहीं बुलाया जाना चाहिए।

जिला प्रोबेशन अधिकारी विनोद कुमार राय ने बताया कि बालकों के लैंगिक अपराधों से संरक्षण अधिनियम के तहत मुकदमा दर्ज होने के बाद इस तरह के मुकदमों के विचार के लिए प्रत्येक जनपद में एक-एक विशेष न्यायालय की स्थापना की गई है जहां इस तरह के मुकदमों की सुनवाई अधिकतम एक साल में समाप्त हो जानी चाहिए। उन्होंने बालकों के साथ हुए इस तरह के लैंगिक अपराधों के मामले में पीड़ित पक्ष का नाम मीडिया को नहीं उजागर करना चाहिए बल्कि काल्पनिक नाम से ही कवरेज करने का निर्देश आयोग के गाइडलाइन में दिया गया है। इस तरह के अपराधों को रोकने के लिए लोगों को मीडिया के माध्यम से जागरूक किए जाने की बात भी उन्होंने बताई।