नियंत्रक और महालेखा परीक्षक (कैग) ने दूरसंचार मंत्रालय द्वारा स्पेक्ट्रम प्रबंधन में कई कमियां पाई हैं, जिनके चलते सरकारी खजाने को करोड़ों का नुकसान हुआ है। पीटीआई के मुताबिक कैग ने पाया कि 2015 में समिति की सिफारिशों के खिलाफ ‘पहले आओ पहले पाओ’ के आधार पर एक टेलिकॉम ऑपरेटर को स्पेक्ट्रम आवंटित किया गया, जबकि माइक्रोवेव (एमडब्ल्यू) स्पेक्ट्रम के लिए 101 आवेदन सरकार के पास लंबित थे। कैग ने अपनी रिपोर्ट में कहा कि दूरसंचार विभाग ने दिसंबर 2012 में स्पेक्ट्रम उपयोगकर्ताओं की विभिन्न श्रेणियों में स्पेक्ट्रम के आवंटन को देखने के लिए एक समिति का गठन किया था और प्रस्तावित किया था कि सभी ऑपरेटरों को माइक्रोवेव बैंड में स्पेक्ट्रम का आवंटन बाजार से संबंधित प्रक्रिया यानी नीलामी के माध्यम से किया जाना चाहिए। रिपोर्ट में कहा गया कि समिति की सिफारशों के खिलाफ अब तक माइक्रोवेब एक्सेस स्पेक्ट्रम को पहले आओ पहले पाओ के आधार पर आवंटित किया गया जैसा कि 2009 तक 2जी लाइसेंस और एक्सेस स्पेक्ट्रम के लिए किया जा रहा था।
2012 में सुप्रीम कोर्ट ने 2008-09 के 2 जी स्पेक्ट्रम आवंटन मामले में पहले आओ पहले पाओ नीति को रद्द कर दिया था। इस प्रक्रिया के माध्यम से दिए जाने वाले स्पेक्ट्रम के लिए 122 दूरसंचार परमिट रद्द कर दिए गए थे। कम दूरी के लिए मोबाइल सेवाओं को प्रदान करने के लिए दूरसंचार ऑपरेटरों को माइक्रोवेव एक्सेस स्पेक्ट्रम आवंटित किया जाता है। कंपनी का नाम बताए बिना सीएजी ने कहा, “यह भी पाया गया कि एक्सेस सेवा प्रदाताओं को माइक्रोवेब एक्सेस का आवंटन दूरसंचार विभाग द्वारा जून 2010 से रोक दिया गया था और दिसंबर 2015 में केवल एक आवेदक के खिलाफ आवंटन किया गया था।
[bc_video video_id=”5987089730001″ account_id=”5798671092001″ player_id=”JZkm7IO4g3″ embed=”in-page” padding_top=”56%” autoplay=”” min_width=”0px” max_width=”640px” width=”100%” height=”100%”]
माइक्रोवेब एक्सेस के आवंटन के लिए नवंबर 2016 तक 101 आवेदन लंबित थे। सीएजी की रिपोर्ट के अनुसार दूरसंचार विभाग के स्पेक्ट्रम कुप्रबंधन की विभिन्न घटनाओं से सरकार पर लगभग 560 करोड़ रुपये का वित्तीय प्रभाव पड़ा। कुल नुकसान में, ऑडिटर ने बीएसएनएल से स्पेक्ट्रम वापस न लेने के कारण सरकारी खजाने पर 520.79 करोड़ रुपये का अधिकतम वित्तीय प्रभाव देखा।

