बलात्कार के बाद हुए यौन हमले से बीते 42 सालों तक कोमा में रही किंग एडवर्ड मेमोरियल (केईएम)अस्पताल की 67 साल की नर्स अरुणा शानबाग का सोमवार की सुबह साढ़े आठ बजे निधन हो गया। बीते चार दिनों से अरुणा को सांस लेने में तकलीफ हो रही थी। निमोनिया के साथ उनके फेफड़ों में संक्रमण हो गया था लिहाजा उन्हें वेंटिलेटर पर रखा गया था।

सोमवार सुबह उन्होंने इलाज के दौरान ही अंतिम सांस ली। उनके निधन के बाद अस्पताल प्रशासन ने कहा कि उनका कोई रिश्तेदार हो, तो वह आकर अंतिम संस्कार करने के लिए उनका शव ले सकता है। इसके बाद दोपहर को अरुणा के रिश्तेदार अस्पताल पहुंचे। अस्पताल प्रशासन के साथ मिलकर उन्होंने अरुणा की बहन के बेटे के जरिए अरुणा की चिता को मुखाग्नि दिलवाई। नर्सिंग समुदाय समेत सैकड़ों लोगों ने अश्रुपूरित नेत्रों से अरुणा को अंतिम विदाई दी। अंतिम संस्कार से पहले आखिरी दर्शन के लिए अस्पताल में उनकी पार्थिव देह को रखा गया और बाद में भोइवाड़ा शवदाहगृह ले जाया गया।

अरुणा शानबाग केईएम अस्पताल में नर्स का काम करती थीं। 29 नवंबर 1973 की रात को वे अपनी ड्यूटी पूरी करने के बाद अस्पताल के तलघर में कपड़े बदलने के कमरे में गईं। जब वे कपड़े बदलकर बाहर निकलीं तो घात लगाकर बैठे अस्पताल के वार्ड बॉय सोहनलाल वाल्मीकी ने उन पर हमला कर दिया। अरुणा पर बुरी नजर रखनेवाले सोहनलाल ने अरुणा पर काबू पाने के लिए कुत्ते बांधने की जंजीर से अरुणा का गला दबाया। इससे अरुणा बेहाल हो गई। इसके बाद सोहनलाल ने अरुणा के साथ बलात्कार किया।

आरोपी सोहनलाल बाद में पकड़ा गया। उस पर मुकदमा चला। मुकदमे के दौरान सोहनलाल पर चोरी और हत्या की कोशिश के आरोप तो साबित हुए, मगर बलात्कार का मामला साबित नहीं हो सका। सोहनलाल को सात साल की सजा हुई। यौन प्रताड़ना और इस हमले में गला दबने से अरुणा के मस्तिष्क को रक्त की आपूर्ति बाधित हुई और उनके दिमाग ने काम करना बंद कर दिया। घटना के बाद से ही अरुणा कोमा में थीं।

कोमा में जाने के बाद बाद धीरे-धीरे उनके शरीर के दूसरे अंगों ने काम करना बंद कर दिया था। अरुणा की आंखें हमेशा खुली रहती थीं। वे न देख सकती थीं, न सुन सकती थीं और न ही हिल डुल सकती थीं। बीते 42 सालों से अस्पताल के छोटे से कमरे में उनका इलाज चल रहा था। अस्पताल के सहकर्मी उनके इलाज में कोई कसर नहीं छोड़ रहे थे।

जब यह तय हो गया कि अब अरुणा कोमा से बाहर नहीं आ सकेंगी तो अस्पताल प्रशासन ने उनके परिवार व रिश्तेदारों को बुलाकर स्थिति स्पष्ट की। मगर अरुणा की बहन और एक रिश्तेदार ने आर्थिक अभावों के चलते अरुणा को उस हालत में घर में रखने में असमर्थता जताई। लिहाजा अस्पताल के कमरे से लगे हुए एक कमरे में अरुणा का इलाज शुरू हुआ और उसकी सारी जिम्मेदारी अस्पताल की नर्सों ने उठाई।

केईएम अस्पताल के डीन अविनाश सुपे ने सोमवार सुबह कहा था कि अगर अरुणा का कोई रिश्तेदार है, तो वह अस्पताल आकर अरुणा के अंतिम संस्कार के लिए दावा कर सकता है। इसके बाद अरुणा के रिश्तेदार दोपहर को अस्पताल में पहुंचे।

अस्पताल प्रशासन का कहना था कि उनके रिश्तेदारों के साथ बातचीत करने के बाद अरुणा के अंतिम संस्कार का निर्णय किया जाएगा। मगर अस्पताल की नर्सें इन रिश्तेदारों को देखकर बहुत नाराज हुईं। उनका कहना था कि हम लोग इतने सालों से अरुणा की देखभाल कर रहे हैं, क्या रिश्तेदारों का फर्ज नहीं बनता था कि इस बीच आकर अरुणा से मिलें। पत्रकार और सामाजिक कार्यकर्ता पिंकी विरानी ने बताया कि अरुणा का एक भाई था जिनका निधन हो चुका है।

बेहतर हो कि कोई गौड़ सारस्वत कोंकणीय ब्राह्मण को ढूंढ़कर अरुणा का अंतिम संस्कार करवाया जाए क्योंकि अरुणा गौड़ सारस्वत कोंकणीय ब्राह्मण परिवार से थी। आखिर एक सहमति के तहत नर्सों, अस्पताल के अन्य कर्मचारियों और अरुणा के परिजनों ने मिलकर अंतिम संस्कार की रस्म अदा की और केईएम अस्पताल के डीन व अरुणा की बहन के बेटे ने अरुणा को मुखाग्नि थी।

 

इच्छामृत्यु का मुद्दा

1980 के दशक में अरुणा शानबाग को अस्पताल से बाहर लाने की कोशिश भी हुई। मगर अस्पताल में अरुणा के सहकर्मियों ने इसका कड़ा विरोध किया। उनकी सहकर्मियों ने अरुणा को अस्पताल में ही रखे जाने को लेकर हड़ताल शुरू कर दी। उनकी ऐसी हालत को देखकर पत्रकार और सामाजिक कार्यकर्ता पिंकी विरानी ने अदालत में अरुणा को इच्छा मृत्यु देने की याचिका दायर की। विरानी की इस याचिका का अरुणा के अस्पताल के सहकर्मियों ने विरोध किया। उनका कहना था कि अरुणा की जब तक स्वाभावित मौत नहीं आती तब तक वे उसकी देखरेख करने के लिए तैयार हैं।

24 जनवरी 2011 में अरुणा को इच्छामृत्यु देने की पिंकी विरानी की याचिका देश के इतिहास में अपनी तरह की पहली याचिका थी। सुप्रीम कोर्ट ने सात मार्च 2011 को यह याचिका खारिज कर दी। मगर फैसले के दौरान सर्वोच्च अदालत ने इस आशय के स्पष्ट संकेत दिए कि विशेष स्थितियों में इच्छामृत्यु की स्वीकृति दी जा सकती है। न्यायालय ने स्थायी कोमा की स्थिति में मरीजों को जीवनरक्षक प्रणाली से हटाकर परोक्ष इच्छामृत्यु (पैसिव यूथनेशिया) की अनुमति दे दी लेकिन जहरीला इंजेक्शन देकर जीवन खत्म करने के तरीके प्रत्यक्ष इच्छामृत्यु (एक्टिव यूथनेशिया) को खारिज कर दिया। अरुणा को दयामृत्यु देने से इनकार करते हुए न्यायालय ने कुछ कड़े दिशानिर्देश तय किए जिनके तहत हाई कोर्ट की निगरानी व्यवस्था के माध्यम से परोक्ष इच्छामृत्यु कानूनी रूप ले सकती है।
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कथा अरुणाची

2002 में अरुणा के जीवन पर मराठी नाटक ‘कथा अरुणाची’ का मंचन हुआ था। इसके लिए विशेष तौर पर केईएम अस्पताल के डॉक्टरों और नर्सों को बुलाया गया था और उनकी अनुमति मिलने के बाद ही इस नाटक का मंचन किया गया था। इसमें अरुणा की भूमिका अभिनेत्री चिन्मय सुमीत ने की थी। अरुणा के निधन के बाद सुमीत ने कहा कि अरुणा इस संसार से चली गई हों मगर उनके दिलोदिमाग से नहीं जा सकती। अरुणा ने एक आंदोलन को जन्म दिया था।

अरुणा की कहानी उस पुरुष मानसिकता की कहानी है, जिसके तहत यह माना जाता है कि किसी महिला को जीवन भर का सबक सिखाना हो तो उसकी इज्जत लूट लो। इस नाटक का निर्देशन दिवंगत अभिनेता विनय आप्टे ने किया था। उनकी पत्नी वैजयंती आप्टे का कहना है कि दो साल तक यह नाटक खेला गया। मगर जब इस नाटक से अवसाद पैदा होने लगा तो उन्होंने इसका मंचन बंद कर दिया। नाटक की तैयारी के लिए आप्टे और उनके कलाकारों को अरुणा से केईएम अस्पताल ने मिलने नहीं दिया था। उन्होंने दूर से ही अरुणा को देखा था।

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‘समाज को झकझोरने वाला था यह हादसा’

अरुणा शानबाग के निधन के बाद समाज के हर क्षेत्र से जुड़े लोगों ने शोक जताया। महाराष्ट्र के राज्यपाल सी विद्यासागर राव ने कहा कि अरुणा के निधन की खबर सुनकर दुख हुआ। अरुणा के साथ हुए हादसे का उनके जीवन पर जो असर हुआ वह पूरे समाज को झकझोरनेवाला है। महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने हार्दिक संवेदना जताते हुए केईएम अस्पताल के डॉक्टरों और नर्सों के प्रति आभार जताया जिन्होंने इतने सालों से अरुणा की सेवा की।

फडणवीस ने कहा कि शानबाग को इतने सालों तक इस स्थिति में देखना दुखदायी था। केईएम अस्पताल की नर्सों ने उनकी सेवा में कोई कसर नहीं छोड़ी, मैं उन्हें सलाम करता हूं। कांग्रेस प्रदेशाध्यक्ष अशोक चव्हाण ने कहा कि अरुणा के निधन का असर हर संवेदनशील व्यक्ति पर हुआ है। उन्होंने कहा कि अरुणा का सपना लोगों की सेवा करना था, मगर उन्हें पूरी जिंदगी बिस्तर पर गुजारनी पड़ी। नियति की क्रूरता से वह लड़ती रहीं और उनका संघर्ष उनके निधन के साथ खत्म हुआ।

पत्रकार और सामाजिक कार्यकर्ता पिंकी विरानी ने अरुणा के निधन पर प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए विरानी ने कहा कि अरुणा तो 29 नवंबर को ही मर चुकी थी। उसका शरीर भर जिंदा था। वह तिल तिल करके रोज मर रही थी। मेरी अरुणा बहुत तड़पी है। उसे न्याय नहीं मिल पाया। उसके निधन पर मैं इतना ही कहूंगी, अलविदा अरुणा! अरुणा चली गई मगर एक ऐसा सशक्त कानून दे गई जिसके तहत अब कोई ऐसी स्थिति में इच्छामृत्यु की मांग कर सकता है। अरुणा को तो इच्छामृत्यु नहीं मिली, दूसरों को मिलने की संभावना बन गई है।

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बॉलीवुड भी शोक में डूबा

बॉलीवुड अभिनेता ऋषि कपूर, नेहा धूपिया, सतीश कौशिक और निर्देशक मधुर भंडारकर आदि ने भी ट्विटर के जरिए अरुणा को श्रद्धाजंलि दी। अभिनेत्री नेहा धूपिया ने लिखा- कितना दुखद है। अरुणा शानबाग को श्रद्धांजलि।

फिल्मकार मधुर भंडारकर ने लिखा- उन्हें दूसरी दुनिया में बेहतर जिंदगी मिले। सतीश कौशिक ने कहा- 42 साल! हे भगवान। कितना भयावह है। अरुणा को आखिरकार दुखों और दर्द से छुटकारा मिला।