आज के दौर में किताबी ज्ञान पर ज्यादा जोर दिया जाता है। मगर सामाजिक जीवन में ज्ञान का उपयोग कब और कैसे करना चाहिए, किस बात पर क्या प्रतिक्रिया देनी चाहिए, इसकी समझ केवल किताबी ज्ञान से नहीं आती है। इसलिए ज्ञानार्जन के साथ चेतना का होना अत्यंत जरूरी है, क्योंकि चेतना ही उस ज्ञान को अनुभव, समझ और आंतरिक रूप से एकीकृत करने का माध्यम है।
यह हमें ज्ञान का वास्तविक अर्थ समझने, परिवर्तन लाने और उसे जीवन में उतारने में मदद करती है, जिससे व्यक्ति केवल ज्ञानी नहीं, बल्कि जागरूक और बौद्धिक भी बनता है। चेतना के विकास के लिए जरूरी है कि नियमित तौर पर आत्म-निरीक्षण किया जाए।
सही-गलत का निर्णय
- चेतना अनुभवों, विचारों, भावनाओं और दुनिया के साथ हमारे संबंधों को संभव बनाती है। इससे हम सही-गलत का निर्णय ले पाते हैं और जीवन को सार्थक बनाने का प्रयास कर पाते हैं।
- चेतना असल में आंतरिक जागरूकता का एक रूप है, जो हमें अपनी आदतों को समझने एवं उनमें बदलाव करने तथा व्यक्तिगत विकास और नैतिकता की समझ विकसित करती है।
- अगर कोई व्यक्ति उच्च शिक्षा हासिल कर किसी उच्च पद पर आसीन हो जाता है, मगर उसके भीतर चेतना नहीं है, तो सामाजिक जीवन में उसे सफल कहना बेमानी ही होगा।
चिंतन की शक्ति
चिंतन मानसिक चेतना का प्रमुख तत्त्व है। हमारे आसपास होने वाली रोजमर्रा की घटनाओं से हमारे जीवन पर पड़ने वाले प्रभाव का आकलन करने के लिए चिंतन बेहद जरूरी है। इसके अलावा रचनात्मक विचारों का सृजन भी चेतना पर ही आधारित है। विचार हमारे मन में उत्पन्न होते हैं और चेतना विचारों के माध्यम से हमारे अनुभवों को आकार देती है। इसी से भावनाओं का भी निर्माण होता है, जो सामाजिक रिश्तों के धागों को बुनने में मदद करती हैं।
चेतना विचारों को एकत्र करने और उन पर चिंतन करने की क्षमता विकसित करती है। यानी मानसिक चेतना मनुष्य के जीवन में एक अहम भूमिका निभाती है और विभिन्न धार्मिक, दार्शनिक तथा वैज्ञानिक दृष्टिकोण के सृजन में इसका गहरा महत्त्व है।
बौद्धिकता का निर्माण
ज्ञान और चेतना दोनों ही जीवन की महत्त्वपूर्ण कड़ियां हैं। ज्ञान जहां जानकारी और तथ्यों से रूबरू कराता है, वहीं चेतना उस ज्ञान को समझने और जीवन में उसका सही उपयोग करने की क्षमता देती है।
बिना चेतना के ज्ञान केवल सूचना बनकर रह जाता है, जबकि चेतना उसे अनुभव और विवेक में बदल देती है, जिससे न केवल व्यक्तिगत विकास संभव हो पाता है, बल्कि सामाजिक जीवन भी सफलता की राह पर चल पड़ता है। इस बात को समझना भी जरूरी है कि चेतना सिर्फ ज्ञान अर्जित करने से नहीं आती, बल्कि यह स्वयं को वास्तविकता में परखने से आती है।
