आज के दौर में भले ही मानव जीवन साधन संपन्न होता जा रहा है, लेकिन मानसिक शांति और संतुष्टि लोगों से दूर होती जा रही है। इसका कारण निराशा और तनाव का बढ़ता दायरा है। कई बार किसी कारण से हम इस कदर हताश हो जाते हैं कि हमारे चारों ओर निराशा का अंधेरा छा जाता है।
दरअसल, निराशा एक नकारात्मक भावना है, जिसमें व्यक्ति की उम्मीदें दम तोड़ देती हैं, मन उदासी से भर जाता है और आंतरिक ऊर्जा का क्षरण होने लगता है। यह स्थिति अक्सर किसी लक्ष्य के पूरा न होने, असफलता, या अन्य किसी दुखद घटना के कारण पैदा होती है। इस दशा से बाहर निकलना आसान नहीं होता, लेकिन यह नामुमकिन भी नहीं है। धैर्य, सकारात्मकता, भावनाओं पर नियंत्रण और इच्छाशक्ति से निराशा को आशा में तब्दील किया जा सकता है।
स्वीकारें और समझें
एक समय था, जब अक्सर सफलता की बजाय कर्म को प्राथमिकता दी जाती थी। संयुक्त परिवारों में बड़ी से बड़ी मुश्किल या दुख का भी मिलकर सामना किया जाता था। मगर, भौतिक संसाधनों की होड़ और व्यक्तिवाद की बढ़ती प्रवृत्ति से एकाकी हो रहे परिवारों में धैर्य, सहनशीलता, मार्गदर्शन और विवेक का दायरा भी सिकुड़ता जा रहा है। अब लोगों का ध्यान सफलता और पूंजी अर्जित करने पर ज्यादा केंद्रित हो रहा है, जिसका नतीजा, निराशा, उदासी, कुंठा, तनाव और आक्रामक स्वभाव के रूप में सामने आ रहा है।
यह समझना जरूरी है कि जीवन में समस्याएं आती हैं और यह एक अस्थायी अवस्था है, तात्कालिक स्थिति को बदलने की बजाय अपनी आंतरिक प्रतिक्रिया को बदलना ज्यादा महत्त्वपूर्ण है। मन में यह विश्वास पैदा करने की जरूरत होती है कि अगर ईमानदारी से प्रयास की निरंतरता बनाए रखेंगे, तो सफलता ज्यादा दिन तक दूर नहीं रह सकती।
सकारात्मक सोच अपनाएं
निराशा से छुटकारा पाने में सकारात्मक सोच की भूमिका अहम है। नई उम्मीदों की रोशनी निराशा के अंधकार को मिटा देती है और उम्मीद का सृजन सकारात्मक सोच से ही होता है। मुश्किलें और समस्याएं जीवन का हिस्सा हैं और उलझनें सुलझाने से सुलझ सकती हैं, इस विचार के साथ आगे बढ़ने का प्रयास कई मायनों में महत्त्वपूर्ण होता है।
ऐसी स्थिति में भावनाओं पर नियंत्रण और सार्थक बातचीत मन को शांत करने का काम करती है। अतीत को असफलता के नजरिए से नहीं, बल्कि इस लिहाज से याद रखना चाहिए कि उससे निरंतर प्रेरणा मिलती रहे। मन में ऐसे विचार न आने दें, जो हौसले को हतोत्साहित करे या जिनका हमारे कार्यों पर प्रतिकूल प्रभाव पड़े।
मनपसंद से शुरुआत
निराशा में जब कोई काम करने की इच्छा न हो, तो एक बार अपने कार्यों की सूची बनाकर देखें और उसमें से कोई ऐसा काम चुनें, जो आपको संतुष्टि देता हो। उदासी के क्षणों में जब कोई मनपसंद काम किया जाता है, तो उसे करने से मन में विश्वास का भाव भी पैदा होता है। अकेलेपन से भी बचने की आवश्यकता होती है।
हम जो कुछ भी महसूस करें, उसे दूसरे के साथ साझा करना चाहिए। इससे हमारे भीतर नई ऊर्जा का संचार होता है और हम अपने काम के साथ एक लय में बहते चले जाते हैं। यह नकारात्मकता के भाव को धीरे-धीरे खत्म कर देता है और नई उम्मीदें आकार लेने लगती हैं, जो निराशा को आशा में बदल देती हैं।
