सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को कहा कि एसिड अटैक के मामलों में सख्त कानून बनाने की जरूरत हो सकती है। शीर्ष अदालत ने सुझाव दिया कि जैसे दहेज हत्या के मामलों में कड़े प्रावधान और सबूत का बोझ आरोपी पर डाला जाता है, वैसे ही प्रावधान एसिड हमलों के लिए भी बनाए जा सकते हैं। इसके लिए केंद्र सरकार को कानून में बदलाव करना पड़ सकता है।
यह टिप्पणी सीजेआई सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्य बागची की पीठ ने की। यह मामला एसिड अटैक पीड़िता शाहीन मलिक की जनहित याचिका पर सुनवाई के दौरान सामने आया। याचिका में मांग की गई है कि जिन पीड़ितों को जबरन एसिड पिलाया जाता है, उन्हें कानून में साफ तौर पर पहचान और सुरक्षा दी जाए।
लाइव लॉ की रिपोर्ट के मुताबिक, शाहीन मलिक की ओर से पेश वकील ने कोर्ट को बताया कि उनके मामले में सभी आरोपियों को बरी कर दिया गया है। इस फैसले के खिलाफ उन्होंने आपराधिक अपील दायर की है। उनकी स्थिति को देखते हुए सुप्रीम कोर्ट ने उन्हें कानूनी सहायता देने का आदेश दिया।
शीर्ष अदालत के समक्ष शाहीन मलिक ने कहा कि कानूनी लड़ाई लड़ने में उनके जीवन के 16 कीमती साल गुजर गए, लेकिन अंत में आरोपियों को बरी कर दिया गया। उन्होंने अनुरोध किया कि हाई कोर्ट को उनकी अपील पर शीघ्र निर्णय लेने का निर्देश दिया जाए। इससे पहले, शीर्ष अदालत ने सभी उच्च न्यायालयों से एसिड हमले के लंबित मामलों के संबंध में रिपोर्ट मांगी थी। कलकत्ता, इलाहाबाद, गुजरात आदि कुछ उच्च न्यायालयों से रिपोर्ट प्राप्त हो चुकी हैं, जबकि कई अन्य उच्च न्यायालयों से रिपोर्ट का इंतजार है।
न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत स्थिति के अनुसार, 15 उच्च न्यायालयों ने लंबित एसिड हमले के मामलों का विवरण प्रस्तुत किया है। उत्तर प्रदेश में 198 मामले लंबित हैं, पश्चिम बंगाल में 60, गुजरात में 114, बिहार में 68 और महाराष्ट्र में 58। अन्य उच्च न्यायालयों से स्थिति रिपोर्ट अभी प्रतीक्षित हैं।
अपने आदेश में, शीर्ष अदालत ने सभी उच्च न्यायालयों से अनुरोध किया कि वे एसिड हमले के मामलों को प्राथमिकता के आधार पर और समयबद्ध तरीके से निपटाएं। सभी राज्य विधि सेवा प्राधिकरणों को भी निर्देश दिया गया कि यदि एसिड हमले के पीड़ितों के पुनर्वास, मुआवजे और चिकित्सा सहायता के लिए कोई योजना लागू की गई है, तो उसका विवरण प्रस्तुत करें।
पीठ ने कहा कि हम उच्च न्यायालयों से अनुरोध करते हैं कि वे एसिड हमलों से संबंधित मामलों को समयबद्ध तरीके से और प्राथमिकता के आधार पर निपटाने के लिए निर्णय लेने की उपयुक्तता पर विचार करें। सभी राज्य विधि सेवा प्राधिकरणों को निर्देश दिया जाता है कि वे एसिड हमलों के पीड़ितों के पुनर्वास, मुआवजे या चिकित्सा सहायता के लिए उनके द्वारा कार्यान्वित की गई योजनाओं को प्रस्तुत करें।
न्यायालय ने सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को चार सप्ताह के भीतर विस्तृत जानकारी प्रस्तुत करने का निर्देश दिया। जिसमें एसिड हमले की घटनाओं, आरोपपत्र दाखिल करने, लंबित मुकदमों और अपीलों से संबंधित वर्षवार आंकड़े और प्रत्येक पीड़ित का विस्तृत विवरण शामिल हो, जिसमें शिक्षा, रोजगार, वैवाहिक स्थिति, चिकित्सा उपचार और राज्य द्वारा किए गए या प्रस्तावित व्यय शामिल हों। एसिड का पिलाने के लिए मजबूर किए गए पीड़ितों के लिए अलग से विवरण भी मांगा गया।
सीजेआई ने जताई चिंता
सीजेआई सूर्यकांत ने कहा कि एसिड अटैक जैसे अपराधों को रोकने के लिए सख्त कदम जरूरी हैं। उन्होंने सुझाव दिया कि अगर कोई व्यक्ति एसिड हमले का दोषी पाया जाता है, तो उसकी संपत्ति जब्त करके पीड़ित को मुआवजा दिया जाना चाहिए। उनका कहना था कि बिना कड़े दंड के ऐसे अपराधों पर रोक लगाना मुश्किल है, इसलिए निवारक नीति अपनानी होगी।
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कोर्ट ने यह भी कहा कि सजा को और सख्त बनाने के लिए केंद्र सरकार को कानून में बदलाव करना पड़ सकता है। मुख्य न्यायाधीश ने सुझाव दिया कि दहेज हत्या के मामलों की तरह एसिड अटैक में भी सबूत का बोझ आरोपी पर डाला जाए। उन्होंने साफ कहा कि यह अपराध दहेज हत्या से कम गंभीर नहीं है।
सुनवाई के दौरान पीड़िता शाहीन मलिक ने बताया कि एसिड हमले से बेहद दर्द और पीड़ा झेलनी पड़ती है। उन्होंने कहा कि अब तक उनकी 25 सर्जरी हो चुकी हैं। मलिक ने यह भी बताया कि कई एसिड अटैक पीड़ित पूरी तरह अंधे हो चुके हैं और अब भी उचित इलाज और पुनर्वास का इंतजार कर रहे हैं।
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