सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को अनुसूचित जाति (एससी) और अनुसूचित जनजाति (एसटी) के लिए आरक्षण में ‘क्रीमी लेयर’ को लागू करने की मांग वाली जनहित याचिका पर केंद्र और सभी राज्य सरकारों को नोटिस जारी किया है।

इस मामले में एडवोकेट अश्विनी कुमार उपाध्याय ने अदालत में याचिका दायर की है। सीजेआई सूर्यकांत और जॉयमाल्या बागची की बेंच ने उपाध्याय द्वारा दायर याचिका पर केंद्र और सभी राज्य सरकारों से जवाब मांगा है।

उपाध्याय ने याचिका में क्या कहा?

उपाध्याय ने सुप्रीम कोर्ट के सामने तर्क दिया कि जिन मामलों में एससी/एसटी परिवार का कोई सदस्य पहले से ही संवैधानिक या बड़े सरकारी पद पर है, ऐसे शख्स के बच्चों को आरक्षण का लाभ नहीं मिलना चाहिए। उपाध्याय ने अपनी याचिका में कहा था कि एससी/एसटी वर्ग के भीतर ऐसे परिवार जो सामाजिक और आर्थिक रूप से आगे बढ़ चुके हैं, उनके आरक्षण को जारी रखने से इसका मकसद फेल हो जाता है।

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कमजोर लोगों को नहीं मिल पाता मौका

याचिका में कहा गया है कि आरक्षण की व्यवस्था ऐसे लोगों को आगे बढ़ाने के लिए की गई थी, जो सामाजिक, शैक्षणिक और आर्थिक रूप से पिछड़े रहे हैं लेकिन समय के साथ ही एससी/एसटी समुदायों में एक संपन्न और प्रभावशाली वर्ग उभरा है। ऐसे प्रभावशाली परिवार पीढ़ी दर पीढ़ी आरक्षण का लाभ लेते रहते हैं, जिससे इन समुदायों के सबसे कमजोर लोगों को आगे बढ़ने का मौका नहीं मिल पाता।

उपाध्याय ने अपनी याचिका में संविधान सभा की बहसों का हवाला भी दिया है।

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7 जजों की बेंच ने दिया था फैसला

1 अगस्त, 2024 को दिए गए ऐतिहासिक फैसले में तत्कालीन सीजेआई डी. वाई. चंद्रचूड़ की अध्यक्षता वाली 7 जजों की संविधान पीठ ने एससी/एसटी आरक्षण में ‘क्रीमी लेयर’ को लागू करने का सुझाव दिया था। हालांकि, यह शर्त भी रखी गई थी कि उप-वर्गीकरण करते समय सरकार किसी विशेष उप-वर्ग के लिए 100 प्रतिशत सीटें आरक्षित नहीं कर सकती।

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