सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को अरावली हिल्स मामले की सुनवाई के दौरान चंडीगढ़ की प्रतिष्ठित सुखना झील के सूखने पर चिंता व्यक्त करते हुए अवैध निर्माण का मुद्दा उठाया। सीजेआई सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने हरियाणा सरकार को पिछली गलतियों को न दोहराने की चेतावनी देते हुए कहा कि अधिकारियों और बिल्डर माफिया की मिलीभगत से सुखना झील “पूरी तरह से बर्बाद” हो गई है।
सीजेआई की अध्यक्षता वाली पीठ ने कहा कि राज्य के अधिकारियों की मिलीभगत से बिल्डर माफिया सक्रिय है… आप सुखना झील को और कितना सुखाओगे… आपने झील को पूरी तरह से बर्बाद कर दिया है।
बारिश के पानी से पोषित सुखना झील, जो चंडीगढ़ के प्रमुख पर्यटन स्थलों में से एक है। वह लंबे समय से घटते जलस्तर से ग्रस्त है। वास्तव में, यह झील उस सुरम्य जल निकाय से बिल्कुल अलग हो गई है जो कभी प्रतिदिन हजारों लोगों को आकर्षित करती थी।
अरावली पहाड़ियों का मामला
सुप्रीम कोर्ट की तीखी टिप्पणी अरावली पर्वतमाला की नई परिभाषा से संबंधित मामले की सुनवाई के दौरान आई। नई परिभाषा को लेकर व्यापक आक्रोश के बीच, न्यायालय ने पिछले वर्ष अपने ही आदेश पर रोक लगा दी और इस मुद्दे की गहन जांच करने के लिए एक विशेषज्ञ समिति (सीईसी) का गठन किया।
इससे पहले, सुप्रीम कोर्ट ने सरकार द्वारा प्रस्तावित अरावली की परिभाषा को स्वीकार कर लिया था- 100 मीटर की ऊंचाई वाली पहाड़ियों को ‘अरावली पहाड़ियां’ माना जाएगा। 500 मीटर की दूरी के भीतर स्थित ऐसी दो या दो से अधिक पहाड़ियों और उनके बीच की भूमि को अरावली पर्वतमाला माना जाएगा। ये पहाड़ियां हरियाणा, दिल्ली, राजस्थान और गुजरात में फैली हुई हैं।
सीजेआई ने बुधवार को अदालत की सहायता कर रहे वरिष्ठ अधिवक्ता के परमेश्वर, जो कि एमिकस क्यूरी हैं। उनसे सभी पक्षों और हितधारकों के सुझावों को शामिल करते हुए चार सप्ताह के भीतर एक विस्तृत नोट दाखिल करने को कहा है।
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सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि नए आदेश में “वन (Forests)” और “अरावली” की परिभाषा अलग-अलग रखी जाएगी। शीर्ष अदालत ने कहा कि वन की परिभाषा का अलग से विश्लेषण किया जाएगा। हम इसे एक व्यापक शब्द के रूप में देखेंगे। अरावली का मुद्दा संकीर्ण (Narrower) रखा जाएगा। इसने राजस्थान सरकार को यह सुनिश्चित करने का भी निर्देश दिया कि अवैध खनन को “तत्काल” रोका जाए।
अरावली जू प्रोजेक्ट
प्रस्तावित अरावली चिड़ियाघर सफारी परियोजना पर सीजेआई की अध्यक्षता वाली पीठ ने स्पष्ट किया कि केंद्रीय पैनल द्वारा अपनी राय प्रस्तुत करने और सभी पर्यावरणीय स्वीकृतियां प्राप्त होने तक किसी भी कार्य की अनुमति नहीं दी जाएगी। एमिकस ने बताया कि प्रथम दृष्टया यह प्रतीत होता है कि परियोजना से पारिस्थितिक क्षति हो सकती है और जल स्तर को लेकर भी चिंताएं हैं। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि पर्यावरण आयोग के विशेषज्ञ की राय और पर्यावरण निकायों की मंजूरी के बिना कोई भी काम शुरू करने की अनुमति नहीं दी जाएगी। वहीं, यह भी पढ़ें कि अरावली श्रृंखला और पर्यावरणीय संकट को लेकर सरकार की उदासीनता और जन आंदोलनों का प्रभाव का क्या है।
