मध्य प्रदेश से एक हैरान कर देने वाला मामला सामने आया। यहां पर एक पति ने अपनी पत्नी पर व्यभिचार का आरोप लगाया है। पति ने अपने बच्ची के पिता होने पर सवाल उठाया और कहा कि वह अपनी पत्नी से हर 3 से 6 महीने में एक बार मिलते थे। इसके बाद मामला फैमिली कोर्ट पहुंचा। कोर्ट के बच्चे का डीएनए टेस्ट करवाने का आदेश दे दिया। पत्नी ने तर्क दिया कि डीएनए टेस्ट करवाने से बच्चों की वैधता पर बेवजह शक होगा और यह प्राइवेसी के अधिकार का उल्लंघन भी है।

बच्चे का DNA टेस्ट कराने की मिली इजाज़त

इसके बाद मामला मध्य प्रदेश हाई कोर्ट पहुंचा। यहां पत्नी ने याचिका दायर की थी। हाई कोर्ट ने फैमिली कोर्ट के फैसले को बरकरार रखा है और DNA टेस्ट कराने की इजाज़त दी गई। हाई कोर्ट के जस्टिस विवेक जैन महिला की याचिका पर सुनवाई कर रहे थे। आदेश में पत्नी से अलग रह रहे पति को यह पता लगाने के लिए बच्चे का DNA टेस्ट कराने की इजाज़त दी गई थी कि बच्चा उसका है या नहीं।

21 जनवरी को दिए गए आदेश में कहा गया, “तलाक की याचिका व्यभिचार के आधार पर दायर की गई है। यह ऐसा मामला नहीं है जहां पति बच्चे की पितृत्व जानना चाहता है, या वह बच्चे के भरण-पोषण की ज़िम्मेदारी से बचना चाहता है। कोर्ट ने इस बात पर ज़ोर दिया कि मौजूदा मामले में बच्चे का DNA टेस्ट सिर्फ़ पत्नी के खिलाफ़ व्यभिचार के आरोप को साबित करने के लिए मांगा गया था।

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कोर्ट ने क्या कहा?

कोर्ट ने कहा, ” जिन मामलों में ज़रूरी दलीलें मौजूद हैं और बच्चे की नाजायज़ता के बारे में कोई घोषणा नहीं मांगी गई है। मामला सिर्फ़ पत्नी के व्यभिचार से संबंधित है, तो ऐसे मामलों में DNA टेस्ट का आदेश दिया जा सकता है।इस मामले में तलाक की याचिका में पर्याप्त दलीलें मौजूद हैं।”

बता दें कि इस मामले में यह तीसरी तलाक की याचिका है और पहली तलाक की याचिका पत्नी ने इस दावे पर रद्द करवा दी थी कि वह आपसी सहमति से तलाक लेना चाहती है। फिर आपसी सहमति के लिए आवेदन दायर किया गया, जिसमें पत्नी दूसरे मोशन के लिए पेश नहीं हुई और अब यह तीसरी तलाक की याचिका दायर की गई है, जो साल 2021 से लंबित है। हालांकि हाई कोर्ट ने महिला की याचिका खारिज कर दी।

कोर्ट ने कहा, “अगर याचिकाकर्ता अभी भी DNA सैंपल देने से इनकार करती है, तो फैमिली कोर्ट भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 114(h) (अदालत यह मान सकती है कि यदि कोई व्यक्ति ऐसे प्रश्न का उत्तर देने से इनकार करता है (जिसका उत्तर देने के लिए वह कानून द्वारा बाध्य नहीं है तो दिया गया उत्तर उसके लिए प्रतिकूल होगा) या BSA 2023 के संबंधित प्रावधानों के तहत याचिकाकर्ता-पत्नी के खिलाफ़ अनुमान लगा सकता है।

क्या है मामला?

यह विवाद तब शुरू हुआ जब पति ने 2019 में बेवफाई के आधार पर तलाक की अर्जी दी, जिसमें उसने आरोप लगाया कि बच्चे के गर्भधारण के समय उसका अपनी पत्नी से कोई संबंध नहीं था और 2022 में फैमिली कोर्ट ने उसकी अर्जी मान ली। पति ने दावा किया कि वह अक्टूबर 2015 में बाहर की ड्यूटी से घर लौटा, और चार दिनों के अंदर उसकी पत्नी ने उसे बताया कि वह प्रेग्नेंट है।

उसने आगे तर्क दिया कि बच्चा उस तारीख के आठ महीने के अंदर पैदा हुआ था, और मेडिकल सलाह पर उसे पता चला कि बच्चे के गर्भधारण का पता चार दिनों के अंदर नहीं चल सकता और यह बात महिला को गर्भधारण के कम से कम 20 से 30 दिन बाद पता चल सकती है। पत्नी ने पति की बातों का ज़ोरदार विरोध किया और तर्क दिया कि प्राइवेसी के अधिकार की रक्षा के लिए, फैमिली कोर्ट बच्चे का DNA टेस्ट कराने का निर्देश नहीं दे सकता था।

पत्नी ने यह भी तर्क दिया गया कि बाल अधिकारों पर कन्वेंशन के तहत बच्चों की प्राइवेसी, आज़ादी और पहचान के अधिकार का सम्मान किया जाना चाहिए और ऐसे निर्देश देते समय अदालतों को बच्चे के सबसे अच्छे हितों को सुरक्षित करना चाहिए। पढ़ें कोर्ट ने इमाम को दोषी करार दिया