Chhattisgarh High Court: छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय ने हाल ही में एक मामले में बेहद सख्त टिप्पणी की और कहा कि अदालत “न्याय प्रदान करने के लिए एक गरिमापूर्ण, निष्पक्ष स्थान है, न कि प्रदर्शन या गैरकानूनी सभा आयोजित करने के लिए। कोर्ट ने यह टिप्पणी इसलिए की क्योंकि अदालत ने दो लोगों की अग्रिम जमानत याचिका खारिज कर दी। इन्होंने कथित तौर पर अदालत कक्ष के अंदर नारे लगाए। एक आरोपी व्यक्ति को धमकी दी और पुलिसकर्मियों के साथ हाथापाई की।
दरअसल, हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस रमेश सिन्हा उन दो व्यक्तियों की अग्रिम जमानत याचिका पर सुनवाई कर रहे थे, जिन पर अदालत में घुसकर न्यायिक कार्यवाही बाधित करने का आरोप है। उन्होंने कहा कि अदालत परिसर को न्याय प्रशासन के लिए समर्पित तटस्थ, गरिमामय स्थान के रूप में बनाए रखना आवश्यक है। इनका उपयोग किसी भी प्रकार के विरोध प्रदर्शन, धरने या सार्वजनिक आंदोलनों के लिए नहीं किया जाना चाहिए।
क्या है ये पूरा मामला?
बता दें कि यह मामला नवंबर 2025 का है। एक धार्मिक कथावाचक आशुतोष चैतन्य को सतनामी समुदाय के खिलाफ कथित अपमानजनक टिप्पणी करने के आरोप में गिरफ्तार किया गया था। जब पुलिस उन्हें बिलासपुर की कोर्ट में पेश करने ले जा रही थी, तब वहां एक भीड़ जमा हो गई। आरोप यह है कि उस भीड़ ने अदालत परिसर के भीतर जमकर नारेबाजी की।
आरोपी कथावाचक को गालियां दीं और जान से मारने की धमकी दी। ड्यूटी पर तैनात पुलिसकर्मियों के साथ हाथापाई की और उन्हें काम करने से रोका। इस मामले में पुलिस ने कई धाराओं (जैसे दंगा भड़काना, सरकारी काम में बाधा डालना और धमकी देना) के तहत केस दर्ज किया था। इसी मामले के दो आरोपियों ने गिरफ्तारी से बचने के लिए हाई कोर्ट में जमानत की अर्जी लगाई थी।
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चीफ जस्टिस ने क्या-क्या कहा?
इस मामले में मुख्य न्यायाधीश रमेश सिन्हा ने याचिका खारिज करते हुए कुछ बड़ी बातें कहीं है। चीफ जस्टिस ने अदालत की पवित्रता को लेकर कोर्ट परिसर और उसके आसपास का इलाका न्याय के लिए होता है। इसे किसी भी तरह के धरने, प्रदर्शन या आंदोलन के लिए इस्तेमाल नहीं किया जा सकता। उन्होंने इसे सुरक्षा को खतरा बताया। मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि ऐसी घटनाएं वकील, जज और वहां आने वाले आम लोगों की सुरक्षा के लिए गंभीर खतरा पैदा करती हैं।
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मुख्य न्यायाधीश रमेश सिन्हा ने कहा कि कानून हाथ में लेना गलत है। किसी को भी विरोध के नाम पर कानून हाथ में लेने या सरकारी अधिकारियों को धमकाने की इजाजत नहीं है। अगर ऐसे कृत्य करने वालों को जमानत दी गई, तो समाज में गलत संदेश जाएगा और न्याय व्यवस्था से लोगों का भरोसा उठ जाएगा।
क्या है किसका तर्क?
आरोपियों के पक्ष की बात करें तो उनके वकील ने कहा कि वे निर्दोष हैं और किसी निजी काम से वहां गए थे। उन्होंने दावा किया कि वे वीडियो फुटेज में कहीं नहीं दिख रहे हैं और उन पर राजनीतिक दबाव में केस दर्ज किया गया है। सरकारी वकील ने कहा कि इन लोगों ने न सिर्फ हंगामा किया बल्कि पुलिस के साथ मारपीट भी की। साथ ही, कोर्ट को बताया गया कि इन आरोपियों का पुराना आपराधिक रिकॉर्ड भी रहा है हालांकि, कोर्ट ने माना कि अपराध गंभीर है और न्यायिक संस्थाओं की मर्यादा बनाए रखने के लिए आरोपियों को कोई राहत नहीं दी जा सकती।
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