सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को कहा कि आपस में झगड़ रहे पति-पत्नी को अपने निजी विवाद सुलझाने के लिए अदालतों को “युद्ध का मैदान” नहीं बनाना चाहिए। इससे न्याय व्यवस्था पर अनावश्यक बोझ पड़ता है और विवाद और ज्यादा बढ़ जाता है। अदालत ने साफ कहा कि ऐसे मामलों में बेहतर है कि दंपति मध्यस्थता का रास्ता अपनाएं, ताकि जल्दी और शांति से समाधान निकल सके। कोर्ट में एक-दूसरे पर आरोप लगाने से समस्या सुलझने के बजाय और बिगड़ती है।

जस्टिस राजेश बिंदल और मनमोहन की पीठ ने ये बातें उस मामले में कहीं, जिसमें पति-पत्नी सिर्फ 65 दिन साथ रहे थे और 10 साल से ज्यादा समय से अलग रह रहे थे। अदालत ने उनके विवाह को समाप्त कर दिया। विवाह पूरी तरह से समाप्त चुका था और उसके सुधरने की कोई संभावना नहीं थी। इसे देखते हुए सुप्रीम कोर्ट ने संविधान के अनुच्छेद 142 के तहत अपनी विशेष शक्ति का इस्तेमाल करते हुए विवाह को समाप्त कर दिया।

अदालत ने कहा कि झगड़ रहे पति-पत्नी को अपने निजी विवादों के लिए अदालतों को लड़ाई का मैदान नहीं बनाना चाहिए। इससे न्याय व्यवस्था बाधित होती है। अगर आपसी तालमेल नहीं है, तो विवाद को जल्दी सुलझाने के लिए दूसरे रास्ते मौजूद हैं। पीठ ने कहा कि मध्यस्थता मुकदमा शुरू होने से पहले भी की जा सकती है और बाद में भी। जब पति-पत्नी एक-दूसरे के खिलाफ, खासकर आपराधिक मामले दर्ज कर देते हैं, तो समझौते की संभावना कम हो जाती है, लेकिन पूरी तरह खत्म नहीं होती।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि वैवाहिक विवादों में अक्सर ऐसा होता है कि मतभेद होते ही एक-दूसरे को सबक सिखाने की सोच शुरू हो जाती है। इसके लिए सबूत इकट्ठा किए जाते हैं और कई बार सबूत गढ़े भी जाते हैं। अदालत ने कहा कि कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) के दौर में झूठे आरोप और ज्यादा बढ़ गए हैं। कोर्ट ने यह भी कहा कि वैवाहिक विवादों का समाज पर सीधा असर पड़ता है। इसलिए सभी संबंधित लोगों की जिम्मेदारी है कि मामला ज्यादा बिगड़ने और दोनों पक्षों के कठोर रुख अपनाने से पहले ही, उसे जल्द से जल्द सुलझाने की पूरी कोशिश की जाए।

पीठ ने कहा कि हर जिले में मध्यस्थता केंद्र मौजूद हैं, जहां मुकदमा शुरू होने से पहले भी समझौते की कोशिश की जा सकती है। अदालत के अनुसार, कई मामलों में इस पर पहले से काम हो रहा है और सफलता की दर भी अच्छी है। कुछ मामलों में तो विवाद सुलझने के बाद पति-पत्नी फिर से साथ रहने लगे हैं।

सुप्रीम कोर्ट ने यह भी माना कि बच्चे या बच्चों के जन्म के बाद विवाद ज्यादा बढ़ जाता है। कई बार बच्चा ही झगड़ रहे पति-पत्नी के बीच तनाव और विवाद की वजह बन जाता है। अदालत ने कहा कि सबसे जरूरी बात यह है कि मुकदमे से पहले पक्षों को मध्यस्थता के लिए राजी करने की पूरी कोशिश की जाए। साथ ही, मध्यस्थता की प्रक्रिया के दौरान जब भी वकीलों से सलाह ली जाए, तो उनके मार्गदर्शन का पालन करना चाहिए। कुछ मामलों में वकीलों की सलाह लेना जरूरी भी हो सकता है।

पीठ ने कहा कि अगर भरण-पोषण जैसे छोटे मुद्दे पर भी बीएनएसएस, 2023 की धारा 144 या घरेलू हिंसा कानून की धारा 12 के तहत मामला अदालत में दाखिल किया जाता है, तो अदालत का पहला प्रयास मध्यस्थता का रास्ता तलाशना होना चाहिए। अदालत ने कहा कि सीधे जवाब दाखिल करने को कहना ठीक नहीं है, क्योंकि एक-दूसरे पर लगाए गए आरोप अक्सर विवाद को और बढ़ा देते हैं।

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सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा कि अगर किसी साधारण वैवाहिक विवाद की शिकायत पुलिस में दर्ज कराने की बात आती है, तो सबसे पहले समझौते और सुलह की कोशिश होनी चाहिए। यह कोशिश, जहां तक संभव हो, अदालतों में बने मध्यस्थता केंद्रों के जरिए होनी चाहिए, न कि पक्षों को पुलिस थाने बुलाकर।

अदालत ने कहा कि बदलते समय में वैवाहिक मामलों की संख्या तेजी से बढ़ी है। इसलिए पति-पत्नी ही नहीं, बल्कि उनके परिवार के सदस्यों की भी जिम्मेदारी है कि किसी भी दीवानी या आपराधिक कार्रवाई को शुरू करने से पहले, विवाद को सुलझाने की पूरी कोशिश करें।

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