सुरेश कौशिक
अच्छा खेलने पर सुर्खियां बटोरते हैं खिलाड़ी और उनकी टीमें। प्रदर्शन का मंच स्कूली स्तर पर हो तो खेल के भावी भविष्य की तस्वीर भी स्पष्ट हो जाती है। इस स्तर पर किसी टूर्नामेंट का निरंतर आयोजन करते रहना भी चुनौती है। खासतौर पर तब जब मैच देखने पर कोई प्रवेश शुल्क नहीं हो, उत्साह बढ़ाने के लिए स्टेडियम में मुट्ठी भर दर्शक हों। ऐसे में आयोजकों का धैर्य भी जवाब दे जाता है। पर देश में एक ऐसी सोसायटी है जिसके पदाधिकारियों की लगन, मेहनत और जज्बे ने भारतीय फुटबॉल को जीवंत रखने का काम किया है। यह है सुब्रोतो मुखर्जी स्पोर्ट्स एजुकेशन सोसायटी जो इस साल डायमंड जुबली मना रही है। फुटबॉल विकास में योगदान के लिए इसे ‘राष्ट्रीय खेल प्रोत्साहन पुरस्कार’ भी मिल चुका है।
किसी भी खेल को मजबूत आधार देने के लिए जरूरी है प्रतिभाओं को तलाशना और उन्हें विकसित करना। भारत जैसे विशाल देश में हर जिले, राज्य स्तर तक पहुंच बनाना वाकई जटिल काम है। सुब्रोतो मुखर्जी स्पोर्ट्स एजुकेशन सोसायटी इस दायित्व को बखूबी निभा रही है। एक या दो मौकों को छोड़ दिया जाए तो इससे जुड़े पदाधिकारियों ने खेल और टूर्नामेंट को बेहतर करने की कोशिश की है। 17 साल तक के लड़कों के लिए 1960 में शुरू हुआ यह सफर अपना दायरा बढ़ा चुका है। 14 साल तक के सब जूनियर वर्ग और 17 साल तक की जूनियर लड़कियों को भी इस कड़ी में जोड़कर सोसायटी ने फुटबॉल जुनून बढ़ा दिया।
अब इस टूर्नामेंट ने अपनी पहचान बना ली है। जब 1960 में इस टूर्नामेंट की शुरुआत हुई थी तो इसे ‘लिटिल डूरंड’ की संज्ञा दी गई थी। डूरंड कप देश का सबसे पुराना टूर्नामेंट है जो 1988 में शुरू हुआ था। जब 1954 में एअर मार्शल सुब्रोतो मुखर्जी डूरंड फुटबॉल टूर्नामेंट सोसायटी के अध्यक्ष बने तो उन्होंने सपना संजोया स्कूली स्तर पर अंतरराज्यीय फुटबॉल टूर्नामेंट के आयोजन का। सफर दिल्ली से शुरू हुआ। पहला फाइनल डीएवी स्कूल की दरियागंज और चित्रगुप्त रोड की टीमों के बीच हुआ। फाइनल 1-1 से बराबरी पर छूटा और टीमों को संयुक्त विजेता घोषित कर दिया गया। टूर्नामेंट का फैलाव शुरू हुआ। दिल्ली में चुनौती पेश करने के लिए आने से पहले हजारों स्कूल जिला और अंतरराज्यीय स्तर पर शक्ति परीक्षण से गुजरते हैं। कई अनजान खिलाड़ी स्टार बनकर उभरे और टीमों की भी पहचान बनी। कड़े अनुशासन से यह सुनिश्चित हुआ कि टूर्नामेंट सुचारू रूप से चले। विंग कमांडर केके गांगुली और उनकी टीम ने नियमों को सख्ती से लागू किया। बाद में स्क्वैड्रन लीडर अजित सिंह, बाला शर्मा और वीएन सिंह ने टीमवर्क से सफल आयोजन में योगदान दिया।
खेल स्तर उठा तो टीमों के साथ नामी प्रशिक्षक भी जुड़ने लगे। 1978 में तो बंगाल के प्रशिक्षकों की प्रतिद्वंद्विता दिल्ली के आंबेडकर स्टेडियम पर आ पहुंची। नामी प्रशिक्षक पीके बनर्जी सेंट एंथनी स्कूल, शिलांग जबकि अमल दत्ता मध्यमग्राम हाई स्कूल, कोलकाता की टीम के साथ आए। इत्तफाक से दोनों की टीमें फाइनल में आमने सामने हुई तो फुलमून के गोल से शिलांग टीम खिताब जीतने में सफल रही। 1993 का सुब्रोतो कप फाइनल भी यादगार रहा। यादगार इसलिए कि स्पेशल स्पोर्ट्स स्कूल, ताशकंद (उज्बेकिस्तान) की टीम अपनी प्रतिद्वंद्वी टीमों को आसानी से रौंदते हुए फाइनल में पहुंची थी जहां उसका मुकाबला सेंट इग्नेशियस हाई स्कूल, गुमला से हुआ। गुमला टीम ने उज्बेक टीम को बखूबी रोकर टाईब्रेकर में बाजी मारकर कप को विदेश जाने से रोक दिया। छह दशक में तेजी, कौशल, कलाकारी, निशानेबाजी और भिन्न शैलियों की फुटबॉल का अद्भुत नजारा देखने को मिला है। ढेरों खिलाड़ियों ने अपनी प्रतिभा का सिक्का जमाकर ‘इंडिया कलर’ का सपना संजोया। मोहन सिंह, श्याम थापा, परमिंदर सिंह, हरजिंदर सिंह, ब्रुनो कुरिन्हो, प्रशांत बनर्जी, विक्टर अमलराज, श्यामल बनर्जी, वीपी सत्यन, अजय कुमार सिंह, संग्राम मुखर्जी, बाईचुंग भूटिया इसमें प्रमुख हैं। शुरुआती सालों में कोलकाता की टीमें हावी रहीं। देहरादून के गोरखा ब्याज ने भी कई फाइनल खेले और कप भी जीता। गवर्नमेंट हायर सेकंडरी स्कूल, निकोबार 1966, 67 और 69 में चैंपियन बनकर उभरा। सन 70 के दशक में उत्तर पूर्वी राज्यों की टीमों का प्रदर्शन दमदार रहा। मध्यमग्राम हाई स्कूल की भी धाक जमी।
आर्थिक रूप से सुब्रोतो मुखर्जी सोसायटी मजबूत हुई तो इनामी राशि में भी इजाफा हुआ। जूनियर विजेता को कभी 15 हजार मिलते थे और इस बार चार लाख रुपए मिलेंगे। 2011 में अंडर-17 गर्ल्स टूर्नामेंट भी शुरू हुआ और इस बार चैंपियन बनने वाली टीम को भी लड़कों के बराबर राशि मिलेगी। अंडर-14 वर्ग की विजेता को तीन लाख रुपए मिलेंगे। आयु सीमा का उल्लंघन तो रिवाज बन गया है। हर साल काफी संख्या में खिलाड़ी मेडिकल जांच में अयोग्य करार दिए जाते हैं। कई बार तो टीमों को नौ खिलाड़ियों से ही चुनौती देनी पड़ती है। पदाधिकारी बदलने के साथ सोच भी बदलती है पर पदाधिकारियों को इस बात का ख्याल रखना होगा कि ज्यादा चमक-दमक के चक्कर में नहीं पड़ें। टूर्नामेंट के मूल उद्देश्य से खिलवाड़ न करें। सुब्रोतो टूर्नामेंट में प्रदर्शन के आधार पर टीम बनाकर उसे विदेशी अनुभव दिलाना भी अच्छा कदम है। फीफा भी फुटबॉल विकास के लिए सोसायटी द्वारा किए जा रहे प्रयासों से प्रभावित है।
