मनोज जोशी
सुनने में अच्छा लगता है कि इस बार खेल बजट में 258 करोड़ रुपए की वृद्धि की गई और इससे पिछली बार यह वृद्धि 350 करोड़ रुपए की थी। जाहिर है कि शब्दों की बाजीगरी कोई इस सरकार से सीखे जिसमें ऊपर से सब कुछ अच्छा ही अच्छा लगता है लेकिन हकीकत में जिन बातों की ओर ध्यान दिया जाना चाहिए था, उसे फिर नजरअंदाज कर दिया गया।
इस बार खेल बजट में न तो खेलों की ढांचागत सुविधाओं की ओर ध्यान दिया गया और न खिलाड़ियों की ट्रेनिंग की बात कही गई। रही-सही कसर नैशनल एंटी डोपिंग एजेंसी के बजट में कोई वृद्धि न करके पूरी हो गई। यह बात सर्वविदित है कि जिस देश को ओलंपिक में केवल दो पदक हासिल होते हों, वह देश डोपिंग के दोषी खिलाड़ियों की संख्या के मामले में दुनिया में तीसरे स्थान पर है। हमारे भारोत्तोलक से लेकर तमाम एथलीट देश को कई आयोजनों में शमर्सार कर चुके हैं। जब मामला देश की प्रतिष्ठा को बचाने का हो तो उस पर युद्धस्तर पर ध्यान देने की ज़रूरत थी।
देश की भौगोलिक स्थिति को देखते हुए मूलभूत ढांचागत सुविधाएं बढ़ाना सरकार की प्राथमिकता होनी चाहिए थी। यहां तक कि दिल्ली में भी छत्रसाल स्टेडियम, विनोद नगर, अशोक नगर, बवाना, नजफगढ़, सिंघु बोर्डर और त्यागराज स्पोर्ट्स कॉम्प्लेक्स ही ऐसे केंद्र हैं जहां दिल्ली सरकार की खेल सुविधाएं उपलब्ध हैं। बाकी साई की सुविधाएं नेशनल स्टेडियम, आईजी स्टेडियम, कर्णी सिंह रेंज और तालकटोरा तरणताल तक सीमित हैं जबकि डीडीए कॉम्प्लेक्स आम आदमी के लिहाज से काफी महंगा है। बाकी राज्यों में हाल क्या होगा, इसका अंदाज लगाया जा सकता है।
सरकार ने खूब वाहवाही बटोरने के लिए राष्ट्रीय स्कूल खेलों में ग्लैमर का तड़का लगाकर खेलो इंडिया योजना शुरू की है। इस बार के बजट में इसकी राशि को 350 करोड़ से बढ़ाकर 520.9 करोड़ कर दिया गया है। गांव-देहात से लेकर कस्बों और शहरों में इस बात का खूब प्रचार किया गया कि इस योजना में चुने गए खिलाड़ियों को अगले आठ साल तक पांच लाख रुपए मिलेंगे जबकि सच यह है कि यह राशि आधुनिकतम सुविधाओं और उनके प्रशिक्षण पर खर्च की जाएगी। यह ट्रेनिंग कहां दी जाएगी, इसकी भी अभी तक पहचान नहीं की जा सकी है। सच तो यह है कि खेलो इंडिया योजना न तो पूरी तरह से खिलाड़ियों के साथ जुड़ पाई है और न ही दर्शकों के साथ। आलम यह है कि जिन खिलाड़ियों के नाम सूची में नहीं हैं, उन्हें भी मैदान में उतार दिया गया।
इस साल अप्रैल में राष्ट्रमंडल खेल हैं और अगस्त में एशियाई खेल। विश्व कप हॉकी भी इसी साल है। ऐसे में खेल के नीति निर्धारकों को 2010 के राष्ट्रमंडल खेल से सबक सीखना चाहिए था, जहां तीन साल के प्रशिक्षण पर ही 650 करोड़ रुपए मुहैया कराए गए थे। इस प्रशिक्षण ने उन खेलों में भारत के सौ पदक और लंदन ओलंपिक में अब तक का सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन करने में अहम भूमिका निभाई। सरकार को यह बात अच्छी तरह से समझ लेनी चाहिए कि बेवजह का बजट बढ़ाने से अच्छे परिणामों की उम्मीद नहीं की जा सकती। आज दक्षिण अफ्रीका से लेकर स्वीडन, केन्या, क्यूबा और नाइजीरिया आदि देशों का बजट भारत से कहीं कम है लेकिन ये सभी देश कुछ खेलों में अपना अलग वजूद रखते हैं। ज़रूरत है सही दिशा में सही कदम उठाने की। खिलाड़ियों की ट्रेनिंग, ढांचागत आधारभूत सुविधाएं और डोपिंग जैसे मुद्दों की अनदेखी खेलो इंडिया योजना पर करोड़ों बहाकर पूरी नहीं की जा सकती। ज़रूरत है सही समय पर सही कदम उठाने की।
खेल बजट
’कुल बजट 2196,36 करोड़ रुपए- 258 करोड़ की वृद्धि
’खिलाड़ियों की ट्रेनिंग और सुविधाओं को किया नज़रअंदाज़
’डोपिंग जैसे संवेदनशील मुद्दे भी रहे नदारद
’खेलो इंडिया का बजट हुआ 520.9 करोड़ रुपए
*साई का बजट फिर घटा

