ऑस्ट्रेलिया के खिलाफ दो टैस्ट मैचों की शृंखला में बुरी तरह हारने के बाद पाकिस्तान क्रिकेट बोर्ड के अधिकारियों ने टीम को लेकर मंथन जरूर शुरू कर दिया होगा। यह प्रारूप बिलकुल अगल है लेकिन 2020 टी-20 विश्व आस्ट्रेलिया में ही खेला जाना है और उस लिहाज से कंगारूओं की धरती पर पाकिस्तान का यह प्रदर्शन नए कोच और मुख्य चयनकर्ता मिस्बाह उल हक के लिए चिंता का विषय है। 90 के दौर की यह दिग्गज टीम आज बेहतर प्रतिभा की तंगी की शिकार है। कभी ‘पेस आर्मी’ के लिए मशहूर पाक के पास आज अनुभवी तेज गेंदबाजों को कमी है। क्रिकेट पंडितों ने तो यहां तक कह दिया कि लगता है कि उसकी ‘पेस फैक्टरी’ अब बंद हो गई। ऐसे में टी-20 के लिए मजबूत और बेहतर टीम तैयार करना मिस्बाह के लिए कड़ी चुनौती होगी।
किसी भी टीम की काबिलियत का आंकलन उसके टैस्ट मैचों के प्रदर्शन के आधार पर किया जाता है। पाकिस्तान को लगातार छह टैस्ट मैचों में हार का सामना करना पड़ा है। उसने पिछले 22 टैस्ट मैचों में से 15 गंवाए हैं। यह सिर्फ टैस्ट मैचों की बात नहीं है, एकदियवसीय और टीम-20 मैचों में भी उसे बहुत ज्यादा सफलता नहीं मिली है। इसके लिए उसके बल्लेबाजों के साथ गेंदबाज भी जिम्मेदार हैं और इन सब से ज्यादा कसूरवार पाक की घरेलू क्रिकेट व्यवस्था है। कभी वकार युनिस, इमरान खान, वसीम अकरम जैसे गेंदबाजों से सजी टीम के पास आज एक भी अनुभवी प्रतिभाशाली तेज गेंदबाज नहीं है। आस्ट्रेलिया के खिलाफ नवंबर में टैस्ट शृंखला हार इसी का नतिजा है। कोच ने शाहीन शाह अफरीदी, मोहम्मद मुसा और नसीम शाह पर भरोसा दिखाकर उन्हें टीम में शामिल किया ताकि तेज गेंदबाजी आक्रमण को धार मिले लेकिन आस्ट्रेलियाई बल्लेबाजों के सामने इनकी एक न चली। ऐसा इसलिए भी हुआ क्योंकि ये अभी अनुभवहीन हैं।
तेज गेंदबाजी आक्रमण में न अनुभव न दम: आंकड़ों पर नजर डालें तो पाकिस्तान की तेज गेंदबाजी आक्रमण में दम नजर नहीं आता। मोहम्मद आमीर को छोड़ दें तो अन्य गेंदबाजों के पास कुल मिलाकर भी 50 टैस्ट मैचों का अनुभव नहीं है। आमीर के नाम टैस्ट में 119 विकेट है। वहीं 61 एकदिवसीय में उन्होंने 81 विकेट चटकाए हैं। टी-20 में उन्होंने 48 मैचों में 59 विकेट अपनी झोली में डाले हैं। युवा तेज गेंदबाज मोहम्मद मुसा के पास मात्र एक टैस्ट और एक टी-20 मैच खेलने का अनुभव है। इसमें उन्हें कोई विकेट प्राप्त नहीं हुआ। मध्यम तेज गेंदबाज मोहम्मद हसनैन ने अब तक पांच टैस्ट खेले हैं जिसमें उन्हें इतने ही विकेट भी मिले हैं। चार टी-20 में उन्होंने तीन विकेट हासिल किए हैं। एक अन्य खिलाड़ी नसीम अब्बास शाह के पास भी महज एक टैस्ट मैच का अनुभव है और इतने ही विकेट भी उन्होने अपने नाम किया है। अब सवाल उठता है कि क्या ऐसे ही अनुभवहीन गेंदबाजों के साथ पाकिस्तान टीम आस्ट्रेलियाई सरजमीं पर टी-20 विश्व कप में चुनौती पेश करेगी।
निरंतरता भी एक बड़ी चुनौती: इसमें कोई दो-मत नहीं कि पाकिस्तान के पास नए और प्रतिभाशाली खिलाड़ियों की जमात है लेकिन वह कितने दिन खेल पाएंगे यह कह पाना काफी मुश्किल है। चोट या अन्य चिकित्सा संबंधी कारणों से तो हर टीम का खिलाड़ी बाहर होता है लेकिन पाक के ज्यादातर खिलाड़ी विवादों में फंसकर टीम से बाहर हो जाते हैं। उनके मुख्य कोच और चयनकर्ता के पास इस समस्या का हल निकालने की भी चुनौती है। हसन अली और शाहीन शाह जैसे ऊर्जावान और बेहतर प्रदर्शन करने वाले खिलाड़ियों को निरंतर टीम में बनाकर रखना पाक के लिए टेढी खीर है। शाह ने अपने पांच टैस्ट मैचों की सात पारियों में 17 विकेट के साथ साबित किया है कि वे काफी आगे जा सकते हैं। हसन अली ने भी नौ टैस्ट मैच में 31 बल्लेबाजों को पवेलियन भेजा है।
घरेलू प्रारूप में मैचों की कमी भी समस्या: 90 के दौर में हीरो रहे टीम की हालत अचानक ही ऐसी नहीं हो गई। 92 विश्व कप विजेता टीम जब 2019 विश्व कप में उतरी तब जो खिलाड़ी पाक टीम में शामिल थे उनके पास 796 प्रथम श्रेणी मैचों का ही अनुभव था। वहीं इंग्लैंड के खिलाड़ियों ने 1433, श्रीलंका के 974 और दक्षिण अफ्रीकी खिलाड़ियों ने 957 प्रथम श्रेणी मैचों में हिस्सा लिया था। एक मजबूत स्थानापन्न तैयार करने के लिए प्रथम श्रेणी मैचों से प्रतिभाओं को तलाशना और उन्हें अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अनुभव दिलाना टीम मैनेजमेंट का काम होता है। पाक क्रिकेट बोर्ड इस मोर्चे पर भी नाकाम रहा है।
संदीप भूषण
