India’s South Asian Games: ”हर रोज गिरकर भी मुकम्मल खड़े हैं ऐ जिंदगी देख मेरे हौसले तुझसे बड़े हैं।” यह कहावत बिहार की बेटी नसरीन शेख पर एक दम सटीक बैठती है, जिन्होंने हर मुश्किल हालात को मात देकर अपनी मंजिल पाई और न सिर्फ बिहार का बल्कि पूरे देश का नाम रोशन किया है। नसरीन ने नेपाल में हुए साउथ एशियन गेम्स से देश के लिए गोल्ड मेडल जीता। उनकी अगुआई में भारतीय महिला खो-खो टीम ने नेपाल को 17-5 से मात देकर स्वर्ण पदक पर कब्जा जमाया।

नसरीन आज सफलता के जिस मुकाम पर खड़ी हैं, वहां तक पहुंचने की उनकी राह आसान नहीं रही है। उनके पिता मोहम्मद गफूर ने भी बेटी के सपने को सच करने लिए कोई कसर नहीं छोड़ी। गफूर कबाड़ का काम करते हैं। कबाड़ का काम करने वाले गफूर को पता था कि सड़क पर बेचने वालों से अलग-थलग बनने के लिए कुछ अलग ही करना होगा। गफूर कहते हैं, ‘खाने की दिक्कत, पुलिस के डंडे, कर्जा, उधारी, ठेला उठाके ले जाने का डर, ये सब दिमाग के टेंशन से बेटी को दूर करना था।’

नसरीन पिता गफूर की बातों को याद करते हुए बताती हैं, ‘पापा कहते थे कि अगर इंडिया खेलेगी तो देश हमारे लिए सोचेगा।’ नसरीन ने भी अपने पिता के सपनों को सच कर दिखाया। साउथ एशियन गेम्स में बेटी के गोल्ड जीतने के बाद गफूर कहते हैं, ‘पहले वह गफूर की छोरी थी। अब मैं नसरीन का पापा करके जाना जाता हूं।’ यह भी एक संयोग ही है नसरीन ने भारत के लिए गोल्ड मेडल उसी देश में जहां कभी उनके पिता परिवार चलाने के लिए छोटी-मोटी नौकरी करते थे।

नसरीन मूल रूप से बिहार के अररिया जिले की रहने वाली हैं। उनके पिता पहले नेपाल के विराट नगर स्थित स्टील की फैक्ट्री में काम किया करते थे,  लेकिन खो-खो में बेटी की लग्न को देखकर वे दिल्ली आए। शुरुआत में मजदूरी की फिर कबाड़ का काम करना शुरू कर दिया। राजधानी में नसरीन ने अश्विन शर्मा के मार्गदर्शन और एमएस त्यागी के सानिध्य में रहकर खो-खो के तकनीक गुर सीखे थे।

नसरीन के शुरुआती कोच अश्विन शर्मा ने उन्हें कठोर मिट्टी की सतहों पर खेलते हुए लड़कों की टीमों के साथ खो-खो में पारंगत किया। कोच कहा कहना है कि पहले उसकी टीम के लड़के बहुत तेज भागते थे जिन्हें देख वह काफी आश्चर्य में पड़ जाती थी। उन्हें देख बाद में नसरीन खुद भी तेज भागने की कोशिश करती थीं। पुरानी ट्रेनिंग के अनुभव को बयां करते हुए नसरीन ने बताया कि लड़कों के साथ मुझे तेज दौड़ने में बहुत मजा आया और उनकी मुट्ठी से बाहर निकलते हुए, मैं मुश्किल से पीछा करने वाले पैक्स के खिलाफ निडर हो गई थी।

नसरीन की मेहनत रंग लाई और 2016 में उनका चयन इंदौर में हुई चैंपियनशिप प्रतियोगता के लिए हुआ। 2018 में लंदन में आयोजित खो-खो प्रतियोगिताय में भी नसरीन चुनी गईं। नसरीन अब तक 35 नेशनल और तीन इंटरनेशनल गेम खेल में हिस्सा ले चुकी हैं। वर्तमान में वह 20 हजार के मासिक वेतन पर भारत सरकार के एयरपोर्ट अथॉरिटी ऑफ इंडिया में कार्यरत हैं। नसरीन के पिता मोहम्मद गफूर ज्यादातर दिनों में सड़कों पर स्टील के बर्तन बेचते हैं।

पिता ने समाज की नहीं, बेटी की सुनी

नसरीन का कहना है कि उनके पिता भले ही रूढ़िवादी प्रथाओं को नहीं मनाते हों लेकिन रिश्तेदारों ने उनके खो-खो में जाने को लेकर काफी कुछ कहा। रिश्तेदारों का कहना था कि लड़कियों को खो-खो नहीं खेलना चाहिए क्योंकि इसमें छोटे कपड़े पहनने होते हैं। लेकिन पिता कभी भी रिश्तेदारों की बातों में नहीं आए। उन्होंने बेटी को आगे बढ़ाने की ठान ली थी। नसरीन के पिता का कहना है कि हम मुसलमान हैं इसलिए कई बार लोगों ने हमारे साथ बुरा बर्ताव किया। हमारी मदद के लिए भी कोई नहीं आया। बाद में मैंने सबकी बात अनसुनी कर पत्नी से चर्चा की और बेटी को आगे बढ़ने की ठानी।