तनिष्क वड्डी। भारतीय महिला क्रिकेट ने बीते कुछ वर्षों में अंतरराष्ट्रीय मंच पर बड़ी पहचान बनाई है। हरमनप्रीत कौर, स्मृति मंधाना और उनकी टीम ने यह साबित किया है कि प्रतिभा की कमी नहीं है, लेकिन इस सफलता के पीछे पोषण की गंभीर कमी वाली ऐसी सच्चाई छिपी है, जिस पर बहुत कम चर्चा हुई।

भारतीय महिला क्रिकेटरों के लिए मैदान पर जीत हासिल करना जितना कठिन है, उतनी ही बड़ी लड़ाई वे मैदान के बाहर भी लड़ रही हैं और वह है पोषण की कमी। एनीमिया, विटामिन, मिनरल डिफिशिएंसी जैसी समस्याएं लाखों उभरती महिला प्लेयर्स की क्षमता को शुरू में ही सीमित कर देती हैं।

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भारतीय टीम की कप्तान हरमनप्रीत कौर और स्टार बैटर स्मृति मंधाना के साथ काम कर चुके देश के शीर्ष स्पोर्ट्स न्यूट्रिशनिस्ट रयान फर्नांडो बताते हैं कि कैसे गलत खानपान और सामाजिक सोच भारतीय महिला क्रिकेट की सबसे बड़ी अदृश्य बाधा बन चुकी है।

द इंडियन एक्सप्रेस को रयान फर्नांडो ने बताया कि भारतीय महिला क्रिकेटरों की सबसे बड़ी चुनौती मैदान पर नहीं, बल्कि थाली में शुरू होती है।

एनीमिया क्यों सबसे बड़ा खतरा?

भारतीय चिकित्सा अनुसंधान परिषद (ICMR) और नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ न्यूट्रिशन के आंकड़े चौंकाने वाले हैं। देश में 44 से 69 प्रतिशत किशोर लड़कियां एनीमिया से पीड़ित हैं, जबकि कुछ राज्यों में यह आंकड़ा 70 प्रतिशत से भी ऊपर है। एनीमिया सिर्फ आयरन की कमी नहीं है।

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रयान फर्नांडो के अनुसार, सिर्फ एक-तिहाई मामलों में आयरन की कमी जिम्मेदार होती है। अन्य मामलों में विटामिन B12, फोलेट जिंक की कमी, बार-बार होने वाले इंफेक्शन, गलत खानपान बड़ी वजह हैं। एनीमिया का असर खिलाड़ी की स्टैमिना, रिकवरी, इम्युनिटी और फोकस पर पड़ता है।

लड़कियों को क्यों नहीं मिल पाता पोषण?

समस्या सिर्फ आर्थिक नहीं, सामाजिक भी है। आज भी कई घरों में लड़कों को ज्यादा और बेहतर खाना मिलता है। लड़कियों की कैलोरी और प्रोटीन जरूरतों को नजरअंदाज किया जाता है। पंद्रह साल से कम उम्र की लड़कियों के नियमित ब्लड टेस्ट नहीं कराए जाते।

धूप से डर और विटामिन-D की कमी

नतीजा यह होता है कि कई लड़कियां खेल की ट्रेनिंग शुरू करने से पहले ही शारीरिक रूप से कमजोर हो चुकी होती हैं। भारत जैसे धूप वाले देश में भी विटामिन-D की कमी एक बड़ी समस्या है। इसकी वजह गोरेपन को लेकर सामाजिक सोच, लड़कियों को धूप में खेलने से रोकना है।

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विटामिन-D की कमी से हड्डियां कमजोर होती हैं। इंजरी का खतरा बढ़ता है। मसल्स रिकवरी धीमी हो जाती है, जो किसी भी खिलाड़ी के लिए खतरनाक स्थिति है। रयान फर्नांडो बताते हैं कि भारत में लगभग पांच% किशोर लड़कियां स्टंटेड (लंबाई में पिछड़ी) होती हैं।

कुपोषण का खेल पर पड़ता असर?

रयान फर्नांडो के मुताबिक, 50% से ज्यादा में माइक्रोन्यूट्रिएंट की कमी है। इससे कई गंभीर समस्याएं पैदा होती हैं। जैसे प्यूबर्टी में देरी, पीरियड्स की गड़बड़ी, थायरॉइड से जुड़ी समस्याएं, लगातार थकान और बीमार पड़ना। ये चीजें किसी भी पेशेवर खिलाड़ी के करियर को नुकसान पहुंचा सकती हैं।

एलीट खिलाड़ियों का बदला खानपान

शीर्ष स्तर पर तस्वीर बदली है। महिला टीम की सीनियर क्रिकेटर्स अब हाई प्रोटीन डाइट, हेल्दी फैट्स, साबुत अनाज, फल और सब्जियों पर आधारित भोजन अपना रही हैं, लेकिन चिंता यह है कि ग्रामीण भारत की सिर्फ 20% किशोर लड़कियों में ही सभी जरूरी पोषक तत्व पर्याप्त मात्रा में मौजूद हैं।

उभरती महिला क्रिकेटरों को सलाह

रयान फर्नांडो का कहना है कि बचपन से संतुलित आहार लें। आयरन, कैल्शियम, प्रोटीन और B12 को नजरअंदाज न करें। नियमित ब्लड टेस्ट कराएं। क्रैश डाइट और बिना सलाह सप्लीमेंट से बचें। हाइड्रेशन को गंभीरता से लें। रयान फर्नांडो के मुताबिक, महिला क्रिकेट में साइंस-बेस्ड न्यूट्रिशन अब लग्जरी नहीं, बल्कि अनिवार्य है।

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भारतीय महिला क्रिकेटरों ने यह साबित किया है कि सही मार्गदर्शन और अवसर मिलने पर वे दुनिया की सर्वश्रेष्ठ टीमों को चुनौती दे सकती हैं। जरूरत है कि पोषण को भी उतनी ही गंभीरता से लिया जाए जितनी ट्रेनिंग और टैलेंट को, क्योंकि मजबूत शरीर के बिना, मैदान पर बड़ी जीत संभव नहीं।