सुप्रीम कोर्ट द्वारा नियुक्त किए गए प्रशासकों की समिति के प्रमुख विनोद राय ने गुरुवार (26 अप्रैल) को द्रोणाचार्य अवार्ड के लिए राहुल द्रविड़ के नाम का प्रस्ताव दिया था। लेकिन भारत के कुछ क्रिकेट नियंत्रण बोर्ड के अधिकारियों का मानना है कि द्रोणाचार्य अवार्ड के लिए द्रविड़ के नाम का प्रस्ताव गलत है। अधिकारियों का ये तर्क है कि द्रविड़ के नाम के कारण उन कोच की अनदेखी हो रही है, जो नए खिलाड़ियों को तैयार करने में उनके बचपन से मेहनत कर रहे हैं। जिनके सिखाए हुए खिलाड़ी अंडर—19 या फिर इंडिया—ए टीम में खेल रहे हैं। हालांकि आपत्ति जताने वाले अधिकारी द्रविड़ के अंडर—19 या इंडिया—ए टीम के कोच के तौर पर किए योगदान से इंकार नहीं करते हैं। अधिकारी मानते हैं कि ये अवार्ड द्रविड़ के बजाय हार्दिक पाण्ड्या, जसप्रीत बुमराह, ऋषभ पंत, कुलदीप यादव और यजुवेन्द्र चहल जैसे खिलाड़ियों को बचपन में क्रिकेट खेलना सिखाने वाले कोच को मिलना चाहिए।
पत्रकारों से बात करते हुए बीसीसीआई के एक वरिष्ठ अधिकारी ने कहा, भारतीय क्रिकेट में द्रविड़ का योगदान अतुलनीय है। लेकिन उन्हें द्रोणाचार्य अवार्ड देना उन सभी कोच के साथ अन्याय है जो बचपन में इन बच्चों को चुनते हैं, उन्हें क्रिकेट खेलना सिखाते हैं और घंटों मैदान पर उनकी स्किल्स को सुधारने में खर्च करते हैं। उन कोच की मेहनत ने ही उन्हें चैम्पियन खिलाड़ी बनाया है। अधिकारी ने यह भी कहा कि द्रविड़ के टीम के कोच होने से निश्चित रूप से भारतीय क्रिकेट को बड़ा फायदा मिल रहा है। भारत की बैटिंग लाइन को विश्व की सबसे बेहतरीन लाइन बना देने में उनका बड़ा योगदान है लेकिन महज तीन साल के कोचिंग करियर के कारण द्रविड़ को ये सम्मान देना सालों से मेहनत कर रहे कोचों के साथ अन्याय है। इससे गलत परंपरा की नींव पड़ेगी।
‘बीसीसीआई के एक अधिकारी ने कहा कि,’बीसीसीआई ने हमेशा ही द्रविड़ के अभूतपूर्व योगदान को सराहा है और उसकी प्रशंसा की है। वह लंबे वक्त तक भारतीय बैटिंग लाइन की जान रहे हैं। उन्होंने भारतीय क्रिकेट को उसके उस दौर तक पहुंचाया है, जहां वह आज है। उन्होंने सचिन, सौरव गांगुली, वीरेंदर सहवाग, अनिल कुंबले, जहीर खान जैसे दिग्गजों के साथ बेहतरीन क्रिकेट पारियां देश के लिए खेली हैं। उस गौरव के लिए भारत सरकार को उनको अर्जुन अवार्ड, पदमश्री, खेल रत्न और भारत रत्न जैसे सम्मान देने चाहिए। लेकिन जब हम द्रोणाचार्य अवार्ड की बात करते हैं तो फिर चाहें वो महान खिलाड़ी ही क्यों न हो, उसका योगदान एक कोच के तौर पर ही आंका जाना चाहिए। न कि मार्गदर्शक और टीम कोच के तौर पर उसे ये सम्मान दिया जाना चाहिए। अंडर—19 वर्ल्ड कप में खेलने वाले हर खिलाड़ी को उसके बचपन से ही किसी कोच ने ट्रेनिंग दी होगी। फिर जब वह स्टेट लेवल, अंडर—14, अंडर—16, अंडर—19 में भी उसे किसी कोच ने संवारा होगा। उन कोच के पूरी जिन्दगी के योगदान को किसी एक मैच के कारण मिली सफलता से आंकते हुए किसी मैच के दौरान कोच रहे शख्स को द्रोणाचार्य अवार्ड देना गलत है।
बता दें कि पूर्व भारतीय कप्तान राहुल द्रविड़ ने बतौर कोच अपना करियर 2014 में शुरू किया था। उन्होंने राजस्थान रॉयल्स के लिए आईपीएल में कोच बनना स्वीकार किया था। बाद में द्रविड़ को इंडिया—ए और फिर अंडर—19 के लिए जून 2015 में कोच बनाया गया था। गुरुवार (26 अप्रैल) को बीसीसीआई के सचिव अमिताभ चौधरी ने उनके नाम का प्रस्ताव आगे बढ़ाया था। उनके नाम का प्रस्ताव वर्ल्ड कप में अंडर—19 टीम के कोच के तौर पर दी गई उनकी सेवाओं के कारण द्रोणाचार्य अवार्ड के लिए किया गया था। उनकी ही देखरेख में 2016 के नए खिलाड़यों के बैच ने बांग्लादेश में फाइनल खेला था। द्रविड़ ने हमेशा ये तय करने की कोशिश की कि इंडिया ए टीम का प्रदर्शन बेहतर रहे और जरूरत पड़ने पर उन्होंने हमेशा टीम में जरूरी बदलाव किए हैं।
