BMC Election Result 2026: ठाकरे परिवार का आखिरी गढ़ भी टूट गया है। भारतीय जनता पार्टी के नेतृत्व वाली महायुति ने बृहन्मुंबई नगर निगम (BMC) में ठाकरे परिवार के दशकों पुराने वर्चस्व को खत्म कर दिया है। यहां तक ​​कि चचेरे भाई उद्धव और राज के बीच हुए ‘ब्रह्मास्त्र’ के प्रयोग से भी ठाकरे परिवार सबसे धनी निकाय पर अपना नियंत्रण बरकरार नहीं रख सका। उद्धव ठाकरे के लिए यह करो या मरो का चुनावी मुकाबला था। अपनी सरकार, पार्टी और चुनाव चिन्ह खोने के बाद, उद्धव के लिए बीएमसी पर अपना कंट्रोल बनाए रखना बेहद जरूरी था। उद्धव की शिवसेना यूबीटी ने भले ही कड़ा मुकाबला किया, लेकिन अंत में यह काफी नहीं रहा।

बीएमसी चुनाव के नतीजे?

अब बीएमसी चुनाव के नतीजों की बात करें तो 227 वार्डों में से भारतीय जनता पार्टी ने 89 सीटें जीतीं, जबकि शिवसेना (यूबीटी) ने 65 सीटें जीतकर कुल वोटों का 27.52% हासिल किया। कांग्रेस को 24 सीटें मिलीं, जो कुल वोटों का 9.31% है। ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन (एआईएमआईएम) ने 8 सीटें जीतीं और महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना (एमएनएस) को 6 सीटें हासिल मिली हैं। अन्य दलों में, एकनाथ शिंदे के नेतृत्व वाली शिवसेना ने 29 सीटें जीतीं, अजित पवार के नेतृत्व वाली एनसीपी ने 3 सीटें, समाजवादी पार्टी ने 2 सीटें और शरद पवार के नेतृत्व वाली एनसीपी (एसपी) ने 1 सीट हासिल की। ​​आम आदमी पार्टी नगर निगम चुनावों में अपना खाता भी नहीं खोल पाई।

पूरे महाराष्ट्र निकाय चुनाव के नतीजे?

महाराष्ट्र के नगर निगम चुनावों में भारतीय जनता पार्टी और उसके गठबंधन वाली पार्टियों यानी महायुति ने एकतरफा जीत हासिल की है। राज्य चुनाव आयुक्त के मुताबिक 29 नगर निगमों की सभी 2869 सीटों में से भारतीय जनता पार्टी ने 1425 सीटें जीतीं हैं। एकनाथ शिंदे की शिवसेना को 399 और अजित पवार की नेशनलिस्ट कांग्रेस पार्टी (NCP) को 167 सीटों पर जीत मिली। शिवसेना यूबीटी को 155 सीटें मिलीं, एमएनएस को 13, बहुजन समाज पार्टी को 6, एसईसी के साथ रजिस्टर्ड पार्टियों को 129, गैर-मान्यता प्राप्त दलों ने 196 और 19 निर्दलीय उम्मीदवारों ने जीत हासिल की।

ये भी पढ़ें: ‘जिन्होंने मेरा घर गिराया…’, उद्धव ठाकरे के BMC चुनाव में हारने पर कंगना रनौत का रिएक्शन

कितनी सीटें जीत पाई उद्धव ठाकरे की पार्टी

पूरे महाराष्ट्र निकाय चुनाव में उद्धव ठाकरे की पार्टी शिवसेना यूबीटी को बड़ा झटका लगा। वह 155 सीटें ही हासिल कर पाई। वहीं बीएमसी चुनाव में उद्धव ठाकरे का जादू नहीं चल पाया। वह सबसे धनी निकाय में केवल 65 सीटें ही हासिल कर पाए और दूसरे नंबर पर रहे।

कहां चूक कर गए उद्धव ठाकरे?

दरअसल, उद्धव ठाकरे की चूक यही है कि वह कांग्रेस को मनाने में नाकाम रहे, जिससे विपक्षी वोट बंट गए। 2024 विधानसभा चुनावों में एमवीए (शिवसेना UBT + कांग्रेस + NCP-SP) ने साथ लड़कर अच्छा प्रदर्शन किया था। लेकिन बीएमसी चुनाव में अगर उद्धव ने MVA को एकजुट रखा होता, तो स्थिति कुछ अलग होती। कांग्रेस ने 151 वार्डों में उम्मीदवार उतारे और 24 सीटें जीतीं, लेकिन उनका वोट बैंक मुख्य रूप से मुस्लिम और दलित इलाकों में था, जहां UBT भी मजबूत है, लेकिन असल में कई वार्डों में वोट बंटवारे से महायुति को फायदा हुआ।

उद्धव ठाकरे के लिए एक और चिंता की बात शिंदे की शिवसेना का उत्साहजनक प्रदर्शन है। उद्धव ठाकरे से अलग होने के बाद से एकनाथ शिंदे ने प्रभावशाली बढ़त हासिल की है। उन्होंने हर चुनाव में यह साबित किया है कि महाराष्ट्र में उद्धव सेना की तुलना में उनकी शिवसेना को कहीं अधिक समर्थन हासिल है।

उद्धव ठाकरे का भविष्य क्या?

अपने पुराने मजबूत वोट बैंक से बाहर भी प्रासंगिक बने रहने के लिए उद्धव ठाकरे को शिवसेना (यूबीटी) की राजनीति में बदलाव करना होगा। उन्हें केवल मराठी मतदाताओं पर निर्भर रहने के बजाय दूसरे वर्गों तक भी अपनी बात पहुंचानी होगी। साथ ही, बीजेपी का सामना करने के लिए एक मजबूत और भरोसेमंद गठबंधन फिर से खड़ा करना जरूरी होगा, खासकर तब जब बीजेपी शहर की सत्ता पर पूरी तरह काबिज हो चुकी है।

ये भी पढ़ें: महाराष्ट्र में राज ठाकरे-शरद पवार से आगे निकल गए ओवैसी, मुस्लिम बहुल इलाकों में ‘भाईजान’ ने दिखाया दम

बीएमसी चुनाव का नतीजा बहुत अहम है। उद्धव ठाकरे वह संस्थागत ताकत खो चुके हैं जो कभी शिवसेना की पहचान हुआ करती थी। हालांकि, उनके पास अब भी वफादार समर्थक हैं और मुंबई में ठाकरे परिवार की विरासत पर उनका प्रतीकात्मक प्रभाव बना हुआ है। इसी सीमित लेकिन मजबूत आधार से वे भविष्य में अपनी राजनीति को नए रूप में ढालने की कोशिश कर सकते हैं, भले ही यह रास्ता पहले से ज्यादा मुश्किल हो।

सिर्फ ठाकरे ब्रॉन्ड के सहारे नहीं चलेगी राजनीति?

बीएमसी हार के बाद ठाकरे ब्रांड को चोट पहुंची है। ठाकरे ब्रांड सिर्फ एक नाम नहीं था, बल्कि तीन चीजों का कॉम्बिनेशन था। इसमें पहला तो बीएमसी पर पकड़ शामिल थी। दूसरा मराठी अस्मित वाला नैरेटिव और तीसरा हिंदुत्व की मूल पहचान के तौर पर शिवसेना को जाना जाता था। क्षेत्रवाद और हिंदुत्व की राजनीति करने वाले उद्धव ठाकरे, बाल ठाकरे की विचारधारा पर चलने वाले उनके भतीजे राज ठाकरे का साथ काम नहीं आया। राज ठाकरे की छवि उत्तर भारत विरोधी बन गई है। उद्धव ठाकरे नए-नए उदारवादी बने हैं। दोनों की जोड़ी पर भी जनता भरोसा नहीं कर पाई। हालांकि, पार्टी टूटने के बाद अभी भी एक वर्ग उद्धव ठाकरे को धोखा खाया हुआ नेता मानते हैं। जो वोटर भारतीय जनता पार्टी से असहज है, वह अभी भी उद्धव ठाकरे को विकल्प मानता है।

ये भी पढ़ें: राज ठाकरे को जिंदगी भर याद रहेगा ‘रसमलाई’ वाला तंज, बीएमसी चुनाव में बीजेपी नेता अन्नामलाई पर मारा था ताना