अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने गाजा युद्ध के बाद नई व्यवस्था के तहत अपने नेतृत्व में प्रस्तावित ‘‘बोर्ड ऑफ पीस’’ में शामिल होने के लिए भारत समेत कई देशों को आमंत्रित किया है। यूएन जैसी बहुपक्षीय संस्थाओं को दरकिनार करने वाली इस सक्रिय पहल ने वैश्विक स्तर पर नई बहस को जन्म दिया है। अब बड़ा सवाल यह है कि क्या ट्रंप, पूर्व राष्ट्रपतियों से अलग, संस्थाओं से ऊपर उठकर, यूएन को कमजोर कर खुद एक नया अंतरराष्ट्रीय मंच बनना चाहते हैं?
वैसे भी डोनाल्ड ट्रंप आधुनिक अमेरिकी राजनीति की सबसे चर्चित और विवादित शख्सियत बन गए हैं। वे केवल अमेरिका के राष्ट्रपति नहीं हैं, बल्कि उस अंतरराष्ट्रीय नेतृत्व का प्रतीक हैं जिसमें नेता खुद को संस्थाओं, नियमों और परंपराओं से ऊपर मानते हैं। ट्रंप की अंतरराष्ट्रीय शैली उनसे पहले के राष्ट्रपतियों से पूरी तरह अलग है। जहां पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति हमेशा संस्थागत संयम, कूटनीतिक प्रक्रिया और बहुपक्षीय सहयोग को प्राथमिकता देते थे, वहीं ट्रंप ने इसे एक व्यक्तिगत मंच में बदल दिया है। उनके लिए हर वैश्विक घटना चाहे भारत-पाकिस्तान तनाव हो, रूस-यूक्रेन युद्ध हो, मध्य-पूर्व के विवाद हों, उनके व्यक्तिगत हस्तक्षेप और निर्णय के आधार पर नियंत्रित हो सकती है। ट्रंप की यह मुखरता केवल बयानबाजी नहीं है, बल्कि उनके कार्यकाल में अपनाई गई नीतियों, व्यापारिक निर्णयों, और अंतरराष्ट्रीय मंच पर हस्तक्षेप में भी स्पष्ट रूप से दिखाई देती है।
क्या है ट्रंप का ‘बोर्ड ऑफ पीस’ और इसकी कार्यप्रणाली?
ट्रंप की अंतरराष्ट्रीय नीतियों का सबसे स्पष्ट उदाहरण है उनका ‘बोर्ड ऑफ पीस’ नामक मंच, जिसे उन्होंने गाजा संकट के समाधान और पुनर्निर्माण के लिए स्थापित किया। शुरुआत में यह बोर्ड केवल गाजा में स्थायी शांति और प्रशासनिक सुधार सुनिश्चित करने के लिए बनाया गया था, लेकिन अब इसे एक नए वैश्विक मंच के रूप में विकसित किया गया है। इस बोर्ड के सदस्य देशों को तीन साल की अवधि की सदस्यता या एक अरब डॉलर का योगदान करके स्थायी सदस्य बनने का विकल्प दिया गया है। ट्रंप खुद इस बोर्ड के अध्यक्ष हैं और उनका कार्यकाल केवल राष्ट्रपति पद तक सीमित नहीं है। इसका मतलब यह है कि ट्रंप ने पारंपरिक बहुपक्षीय संस्थाओं और संयुक्त राष्ट्र के ढांचे को पार करते हुए खुद का अंतरराष्ट्रीय नेतृत्व स्थापित किया है। यह कदम केवल शांति स्थापना का दावा नहीं, बल्कि अंतरराष्ट्रीय राजनीति में ट्रंप की स्थायी और केंद्रीकृत भूमिका का प्रतीक है।
ट्रंप की अंतरराष्ट्रीय रणनीति उनकी व्यक्तिगत शैली, कारोबारी पृष्ठभूमि और मीडिया कौशल से गहराई से जुड़ी हुई है। राजनीति में आने से पहले वे एक रियल इस्टेट व्यवसायी और टेलीविजन पर्सनालिटी थे, जिनके लिए सफलता का मतलब था ध्यान आकर्षित करना, बड़े दावे करना और खुद को एक ब्रांड के रूप में स्थापित करना। राजनीति में भी उन्होंने यही फार्मूला अपनाया। उनके लिए “अमेरिका फ़र्स्ट” केवल नारा नहीं है, बल्कि उनकी सोच का परिचायक है कि अंतरराष्ट्रीय व्यवस्थाओं को साझेदारी के बजाय सौदेबाजी के दृष्टिकोण से देखा जाना चाहिए। इसी कारण उन्होंने संयुक्त राष्ट्र और नाटो जैसी बहुपक्षीय संस्थाओं को अक्सर सार्वजनिक रूप से चुनौती दी। उनका मानना है कि ये संस्थाएं अमेरिका की शक्ति को बांधती हैं और निर्णय साझा करने के लिए बाध्य करती हैं। ट्रंप की अंतरराष्ट्रीय नीतियों में व्यक्ति की केंद्रीय भूमिका, निर्णायक हस्तक्षेप और नैरेटिव नियंत्रण सर्वोपरि है।
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ट्रंप का अंतरराष्ट्रीय मंच पर व्यक्तित्व केवल मध्य-पूर्व या यूरोप तक सीमित नहीं रहा। उन्होंने अपने कार्यकाल में कई ऐसे निर्णय लिए जो उनके राष्ट्रवादी दृष्टिकोण और व्यक्तिगत नेतृत्व को उजागर करते हैं। ग्रीनलैंड को खरीदने का प्रस्ताव, लैटिन अमेरिकी देशों पर दबाव, भारत समेत कई देशों पर व्यापार टैरिफ लगाना और अमेरिकी घरेलू उद्योगों की सुरक्षा के लिए आर्थिक नीतियां अपनाना उनके भू-रणनीतिक और आर्थिक दृष्टिकोण का हिस्सा था। इन फैसलों में उन्होंने अंतरराष्ट्रीय नैतिकता की अपेक्षा राष्ट्रीय हित को प्राथमिकता दी। यही कारण है कि ट्रंप के दावे — जैसे भारत-पाकिस्तान संघर्ष रोकना या रूस-यूक्रेन युद्ध को जल्दी समाप्त करना — के पीछे केवल राजनीतिक लाभ और वैश्विक नेतृत्व की छवि बनाना उद्देश्य है।
भारत जैसी उभरती शक्ति के लिए ट्रंप की अंतरराष्ट्रीय शैली और उनके मंच का महत्व और भी बढ़ जाता है। भारत ने हमेशा बहुपक्षीय संस्थाओं और संयुक्त राष्ट्र में सुधार का समर्थन किया है, क्योंकि स्थिर अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था अंततः मध्यम और विकासशील देशों के हित में होती है। बोर्ड ऑफ पीस के मामले में भारत को यह तय करना होगा कि क्या यह मंच केवल शांति स्थापना का साधन है या एक नया वैश्विक नियंत्रण ढांचा बनकर संयुक्त राष्ट्र जैसी संस्थाओं की भूमिका को कमजोर कर सकता है। ट्रंप की रणनीति में अक्सर राष्ट्रीय हित सर्वोपरि होते हैं और सहयोगी देशों के लिए दबाव साधने का भी प्रावधान होता है। भारत-पाकिस्तान मुद्दों पर ट्रंप के हस्तक्षेप और उनके दावे यह दिखाते हैं कि तीसरे पक्ष की भूमिका कभी-कभी अंतरराष्ट्रीय नैरेटिव को प्रभावित कर सकती है। भारत ने हमेशा इस तरह की स्थितियों में सावधानी और रणनीतिक स्वायत्तता का पालन किया है।
अंततः ट्रंप का अंतरराष्ट्रीय मंच पर व्यक्तित्व और बड़े दावे विश्व राजनीति में संक्रमण काल का संकेत देते हैं। उनका दृष्टिकोण यह स्पष्ट करता है कि वैश्विक नेतृत्व अब केवल नैतिक अपील या शक्ति प्रदर्शन पर निर्भर नहीं है, बल्कि व्यक्ति के नियंत्रण, निर्णायक हस्तक्षेप और रणनीतिक सोच के संयोजन से संचालित होता है। भारत और अन्य मध्यम शक्तियों के लिए यह चुनौतीपूर्ण है कि वे अपने हितों और अंतरराष्ट्रीय संतुलन को बनाए रखते हुए ऐसे नेतृत्व के साथ सहयोग या संतुलन कैसे स्थापित करें। भारत जैसी उभरती शक्ति के लिए इस युग में संतुलन बनाए रखना और रणनीतिक स्वायत्तता सुनिश्चित करना ही दीर्घकालिक स्थायित्व की कुंजी है। यह भी पढ़ें : ट्रंप को क्यों चाहिए ग्रीनलैंड? नार्वे के प्रधानमंत्री को लिखे संदेश में बताई असल वजह
