राज कपूर की फिल्म ‘आवारा’ का गीत, ‘आवारा हूं, या गर्दिश में हूं, आसमान का तारा हूं’ ने सड़कों की जिंदगी को एक रुमानियत दी थी। भारतीय शहरों में यह रुमानियत सड़कों पर कुत्तों को लेकर भी उमड़ी। आवारा कुत्तों को खिलाने व उनकी देखभाल करने का एक बड़ा तबका तैयार हुआ। जल्द ही यह रुमानियत खौफ में बदल गई, जब आवारा कुत्तों के काटने से लोगों की जान पर बन आई। क्या बच्चे और बड़े, सभी आवारा कुत्तों के काटने के शिकार हुए।

भारत में बढ़ते रेबीज के मामले और मौत से खौफ इतना पसरा कि यह जनसंचार माध्यमों की सुर्खियां बना। कुत्तों के हमलों के खौफनाक वीडियो सोशल मीडिया पर तैरने लगे। पिछले दिनों दिल्ली और देश में आवारा कुत्तों के हमलों से घायल और मौत के मामलों पर शीर्ष अदालत ने खुद संज्ञान लिया। इस मसले पर अदालती बहस जारी है। पशु प्रेमी और इंसानी सुरक्षा आमने-सामने है। कभी पशु प्रेमियों की आंखों के तारे, और अभी गर्दिश में गए आवारा कुत्तों पर सरोकार की पड़ताल।

भारत में कम से कम छह करोड़ आवारा कुत्ते हैं। हालांकि, साल 2019 के सरकारी आंकड़ों के अनुसार ऐसे कुत्तों की संख्या 1.53 करोड़ है। सर्वेक्षणों में अकेले दिल्ली में लगभग 10 लाख कुत्ते पाए गए। इसी से संबंधित एक और तथ्य यह है कि वैश्विक स्तर पर रेबीज से होने वाली मौत में से एक तिहाई से अधिक भारत में होती हैं।

आवारा कुत्ते और अदालती आदेश

ज्यादातर पश्चिमी देशों के विपरीत, भारतीय संस्कृति और कानून कुत्तों को मारने पर रोक लगाते हैं। इसके बजाय, कुत्तों को पकड़ा जाता है, उनका बंध्याकरण किया जाता है, उन्हें टीका लगाया जाता है और सबसे अहम यह है कि उन्हें उनके मूल क्षेत्र में वापस छोड़ दिया जाता है। अगस्त 2025 में हालात बदल गए। कई बच्चों को आवारा कुत्तों ने नोच डाला। इसके बाद सर्वोच्च न्यायालय ने दिल्ली और आसपास के इलाकों के सभी आवारा कुत्तों को पकड़ कर आश्रय स्थलों या पशुशालाओं में रखने का संक्षिप्त आदेश दिया और दशकों में पहली बार सड़कों को कुत्तों से मुक्त करने का वादा किया।

हालांकि यह आदेश अव्यावहारिक था। लाखों कुत्तों के लिए आश्रय स्थल होना असंभव है। इसका पशु अधिकार समूहों की ओर से तीखा विरोध हुआ। दो दिन के भीतर, अदालत ने अपना फैसला पलट दिया और लंबे समय से चली आ रही बंध्याकरण नीति को बहाल कर दिया। बाद के फैसलों ने इस विषय पर ध्यान केंद्रित किया है। नवंबर 2025 में अदालत ने देश भर के स्कूलों, अस्पतालों और सार्वजनिक परिवहन क्षेत्रों से कुत्तों को हटाने का आदेश दिया। साथ ही सार्वजनिक स्थानों पर कुत्तों को खाना खिलाने पर प्रतिबंध लगाया और उन्हें दूर रखने के लिए बाड़ लगाने को प्रोत्साहित किया।

सात जनवरी 2026 को अदालत ने अधिकारियों को निर्देश दिया कि वे भारत के सभी 15 लाख विद्यालयों और महाविद्यालयों को कुत्तों से सुरक्षित करने के लिए बाड़ लगाएं और उन्हें मात्र आठ सप्ताह के भीतर पूरी तरह से संरक्षित करें। हालांकि, पहले के आदेश की तरह, इस आक्रामक समयसीमा में बुनियादी ढांचे से जुड़ी चुनौतियों को नजरअंदाज कर दिया गया। जानकारों का मानना है कि इससे कुत्तों के काटने की घटनाओं या उससे होने वाले संक्रमण में उल्लेखनीय कमी आने की संभावना नहीं है। अदालत वर्तमान में संबंधित पक्षों के साथ सुनवाई कर रही है, क्योंकि वह कुत्तों को बड़े पैमाने पर हटाने और पशु कल्याण संबंधी चिंताओं के बीच संतुलन बनाने का प्रयास कर रही है।

एक्सपर्ट्स क्या कह रहे?

विशेषज्ञों का कहना है कि ऐसा लगता है कि सरकार न तो इन कुत्तों को मार सकती है, न ही उन्हें आश्रय दे सकती है, और न ही उन पर नियंत्रण रख सकती है। उनके साथ क्या किया जाए, यह सवाल जन सुरक्षा और पशु कल्याण से जुड़ा है, लेकिन साथ ही इससे कहीं अधिक गहरा अर्थ रखता है, यह विकास के सबसे उल्लेखनीय साझेदारियों में से एक का नवीनतम अध्याय है।

कुत्ते एकमात्र ऐसे कशेरुकी जीव हैं, जिन्होंने अफ्रीका से मानव प्रवास के दौरान हर प्रकार की जलवायु और बस्ती में अपना निवास स्थान बनाया। यद्यपि इनके पालतू बनने का सटीक समय निश्चित नहीं है, फिर भी कुत्ते मनुष्यों के साथ रहने के लिए विकसित हुए हैं। अब उष्णकटिबंधीय शहरीकरण के कारण अंतर-प्रजाति संबंधों को अभूतपूर्व चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है।

पिछली कुछ शताब्दियों में, जैसे-जैसे कुत्ते घरों में जगह बनाते गए, मनुष्यों ने इनकी 400 से अधिक नस्लें विकसित कीं। इन्हें साथ रहने, काम करने या सुंदरता के लिए परिष्कृत किया गया। यह सह-विकास महत्त्वपूर्ण है, क्योंकि इसका अर्थ है कि कुत्ते मानवीय संकेतों को समझते हैं और विशिष्ट लोगों और स्थानों से गहरा लगाव रखते हैं। शहरी भारत में, जहां कुत्ते बिना मालिक के होते हैं लेकिन पूरी तरह से जंगली नहीं होते। यह लगाव घर या उन्हें भोजन देने वाले व्यक्ति के प्रति क्षेत्रीय व्यवहार के रूप में प्रकट होता है।

आम तौर पर आवारा कुत्ते सड़कों पर डाले गए कूड़ों से अपना खाना निकालते हैं, लेकिन अधिक समृद्ध जिलों में, उन्हें अब जानबूझकर भोजन दिया जाता है। कुत्ते कुछ खास घरों के आसपास झुंड बनाकर रहते हैं, जहां कुछ समर्पित भोजनदाता उनकी लगभग सौ फीसद पोषण संबंधी जरूरतों को पूरा कर सकते हैं। इससे कुत्तों की संख्या में काफी वृद्धि होती है।

शोधकर्ता निशांत कुमार के अनुसार यहीं पर प्राचीन सहअस्तित्व आधुनिक शहरी शैली से टकराता है। भारतीय सड़कें बहुउपयोगी स्थान हैं। उष्णकटिबंधीय जलवायु में, कचरा बीनने वाले और श्रमिक अक्सर रात में काम करते हैं। ठीक उसी समय जब कुत्ते अपने क्षेत्र को लेकर सबसे अधिक संवेदनशील होते हैं, और जब उन्हें भोजन देने वाले धनी निवासी सो रहे होते हैं। कुत्तों ने अपने व्यवहार को इस तरह ढाल लिया है कि भौंकना, पीछा करना, कभी-कभी काटना उनकी आदत में शामिल है। इससे खाना खिलाने वालों को अनजाने में तो प्रोत्साहन मिलता है, लेकिन दूसरों के लिए खतरा पैदा हो जाता है। आंकड़े चौंकाने वाले हैं, हर साल कुत्तों के काटने के हजारों मामले होते हैं।

फिर भी, सर्वोच्च न्यायालय के आदेशों पर कुछ प्रतिक्रियाएं अपरिहार्य थीं। जैसे जैसे शहरी विकास के कारण शहरी जीवन कैसा होना चाहिए, यह तय करने का अधिकार बदल रहा है, मूल्यों का एक संघर्ष सामने आया है। कुछ लोग जानवरों की साझा उपस्थिति को महत्त्व देते हैं, जबकि अन्य जोखिम उन्मूलन को प्राथमिकता देते हैं। भारत के शहर शायद सहयोग के चरम पर पहुंच चुके हैं। रोजमर्रा की परेशानियों-भौंकना, पीछा करना के बावजूद लाखों लोग इन कुत्तों को खाना खिलाते हैं। फिर भी, वही कुत्ता किसी नए को काट भी सकता है।

यह तर्कहीन आक्रामकता नहीं है, यह एक विशिष्ट मानव समुदाय के साथ गहरे जुड़ाव से उत्पन्न क्षेत्रीय सुरक्षा है। पश्चिमी शहरों में सामाजिक प्राथमिकताएं अधिक एक समान होने के कारण बहुत पहले ही आवारा कुत्तों की संख्या को सीमित कर दिया गया था। भारत की विविधता का अर्थ है कि ऐसी कोई आम सहमति मौजूद नहीं है। शहरी आबादी द्वारा कुत्तों की मौजूदगी को एक समान रूप से असहनीय मानने में शायद 20 या 30 साल और लग सकते हैं।

भारत के शहरीकरण के साथ-साथ, उसे यह तय करना होगा कि वह उन प्राचीन संबंधों के लिए स्थान बनाए रखे जो शहरों के अस्तित्व से भी पहले के हैं या पूर्ण प्रबंधन के पश्चिमी मार्ग का अनुसरण करे।

कुछ यूरोपीय देशों में हालात बेहतर

यरोप और अमेरिका में आवारा कुत्तों की स्थिति अलग-अलग है। यूरोप के कई देश (जैसे नीदरलैंड, जर्मनी) सख्त नियमों और बंध्याकरण/टीकाकरण कार्यक्रमों से समस्या को कम कर रहे हैं। अमेरिका में (खासकर ह्यूस्टन जैसे शहरों में) बड़ी संख्या में आवारा कुत्ते हैं, जो आश्रयों पर दबाव डाल रहे हैं और सार्वजनिक सुरक्षा की चिंता का कारण बन रहे हैं। दोनों क्षेत्रों में अवैध प्रजनन और पशुओं को उत्पाद समझने की सोच समस्या को बढ़ाती है, लेकिन समाधान के लिए शिक्षा, गोद लेने और नियंत्रण (सीएनवीआर) पर जोर दिया जा रहा है। अमेरिका में, विशेषकर टेक्सास जैसे राज्यों में लाखों आवारा कुत्ते हैं। इससे आश्रय गृहों पर भारी दबाव है और रेबीज जैसी बीमारियों का खतरा है। आश्रयों की क्षमता से अधिक कुत्ते आने, लोगों की लापरवाही और आवेग में पालतू जानवर खरीदने के कारण यह समस्या बनी हुई है।