देश की राजनीति इस समय कई स्तरों पर बेचैन है। कहीं धर्म और सत्ता आमने-सामने हैं, कहीं चुनावी नतीजों ने नेताओं का कद बदल दिया है। अल्पसंख्यक राजनीति नई राह तलाश रही है तो पुराने राजनीतिक परिवारों में नेतृत्व की जंग तेज होती जा रही है।

सनातन पर सवाल

शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद का मुद्दा उत्तर प्रदेश की योगी सरकार के सनातन वाले एजंडे पर सवाल खड़े कर रहा है। ज्योतिष पीठ के शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद पिछले कई दिन से प्रयागराज के माघ मेले में अपने शिविर के बाहर धरना दे रहे हैं। उनके शिष्यों को मेला प्रशासन ने मौनी अमावस्या के अवसर पर मेले में शोभायात्रा नहीं निकालने दी। आरोप है कि उन पर लाठीचार्ज किया गया और उनकी चोटी खींची गई। विरोध में अविमुक्तेश्वरानंद ने मौनी अमावस्या पर संगम में स्नान भी नहीं किया। उन्होंने विरोध में धरना दिया और योगी सरकार की धर्म के प्रति निष्ठा पर सवाल उठाए तो उन्हें अफसरों से नोटिस भिजवाकर उनके शंकराचार्य होने का सबूत मांग लिया। इससे सनातन धर्म के उनके अनुयायियों में रोष है। विरोध में शंकराचार्य ने बसंत पंचमी को भी संगम में डुबकी नहीं लगाई। वे तेज बुखार के बावजूद धरने पर जमे हैं। पर मुख्यमंत्री योगी परोक्ष रूप से उन्हें ‘कालनेमि’ बताकर उन पर हमला कर रहे हैं। जबकि उन्हीं के उपमुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य ने उनके चरणों में प्रणाम करने का बयान दिया है, जो अब कई सवाल खड़े कर रहा है। विपक्षी दलों से जुड़े धार्मिक समूह इस मुद्दे पर भाजपा सरकार को आड़े हाथों ले रहे हैं। सोशल मीडिया पर जंग छिड़ी हुई है, सो अलग। भाजपा आलाकमान भी चुप्पी साधे योगी की फजीहत देख रहा है।

साबित हुए समुद्र

स्थानीय निकाय चुनाव के नतीजों से देवेंद्र फडणवीस का कद और बढ़ा है। मराठा बहुल सूबे में ब्राह्मण होने के बावजूद वे सबसे कद्दावर नेता बन गए हैं। फडणवीस जब 2014 में महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री बने थे, तो उनकी राष्ट्रीय पहचान नहीं थी। बाद में 2019 में भाजपा का शिवसेना से गठबंधन टूटा और उद्धव ठाकरे कांग्रेस व राकांपा की मदद से मुख्यमंत्री बन गए, तो फडणवीस कमजोर दिखने लगे थे। लेकिन तब फडणवीस ने एक शेर कहा था, ‘मेरा पानी उतरता देख, मेरे किनारे पर घर मत बसा लेना/मैं समंदर हूं, लौटकर जरूर आऊंगा।’ शिवसेना में बगावत कराकर उन्होंने उद्धव से तो हिसाब चुका ही लिया मजबूरी में उपमुख्यमंत्री की कुर्सी भी कबूल कर ली थी। विधानसभा चुनाव में महायुति के बावजूद भाजपा को अकेले ही बहुमत के करीब पहुंचा दिया और दूसरी बार मुख्यमंत्री बन गए तो उनका शेर चरितार्थ हो गया।

अध्यक्ष के नाम की गुत्थी

नितिन नबीन के भाजपा का राष्ट्रीय अध्यक्ष बनने के बाद खबरों की दुनिया में काम करने वालों के बीच सबसे बड़ी चर्चा हुई कि इनका नाम नवीन लिखा जाए या नबीन। यह असमंजस कई जगहों पर बरकरार रहा। प्रधानमंत्री से लेकर पूर्व भाजपा अध्यक्ष जयप्रकाश नड्डा तक ने उनके नाम को ‘नबीन’ लिख कर बधाई दी थी तो बहुत से लोग नवीन लिख रहे थे। अलग-अलग जगहों पर अलग-अलग नाम लिखे व छपे जाने के बाद भाजपा के केंद्रीय मीडिया प्रकोष्ठ की तरफ से बताया गया कि भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष का नाम हिंदी में नवीन तो अंग्रेजी में नबीन लिखा जाना चाहिए। हालांकि अपने चुनावी हलफनामे में हिंदी में किए हस्ताक्षर में भाजपा नेता ने अपना नाम ‘नवीन’ ही लिखा है।

सीधी हिस्सेदारी

धर्मनिरपेक्ष राजनीति करने का दावा करने वाले राजनीतिक दलों के लिए असदुद्दीन ओवैसी खतरे की घंटी बनकर उभरे हैं। पहले बिहार विधानसभा चुनाव में और अब महाराष्ट्र के शहरी निकाय चुनाव के नतीजों ने साबित किया है कि मुसलमानों का झुकाव अब एआइएमआइएम के प्रति बढ़ रहा है। तेलंगाना के अलावा अभी तक महाराष्ट्र ही ऐसा दूसरा राज्य है जहां एआइएमआइएम का उम्मीदवार लोकसभा का चुनाव जीता था। औरंगाबाद में ओवैसी के उम्मीदवार इम्तियाज जलील लोकसभा चुनाव जीते थे। भाजपा ने औरंगाबाद का नाम संभाजीनगर रख दिया पर उससे ओवैसी को कोई फर्क नहीं पड़ा। महाराष्ट्र में उनकी पार्टी के 90 से ज्यादा पार्षद जीत रहे हैं। इससे संकेत मिल रहे हैं कि मुसलिम युवा अब अपना नेतृत्व चाहते हैं। वे कांग्रेस, सपा, बसपा, राजद और राकांपा जैसी पार्टियों के पिछलग्गू मतदाता कहलाना पसंद नहीं कर रहे। उन्हें हिस्सेदारी चाहिए। तभी तो इन दलों का ओवैसी पर ‘भाजपा की बी-टीम’ होने का आरोप असर नहीं दिखा पाया। अस्मिता की लड़ाई में मुसलमानों का एक बड़ा तबका इस बात का समर्थन कर रहा है कि उनकी कौम की दिक्कतों के साथ अब तक राजनीति ही की गई है। मुसलिम तबके का यह आरोप गलत भी नहीं है। इसलिए वे ओवैसी पर भरोसा करना चाह रहे हैं। ओवैसी की चुनौती से निपटने की अगली बारी अब पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी की है।

टकराव बढ़ने के आसार

लालू यादव के परिवार में शह और मात का खेल चल रहा है। विधानसभा चुनाव में हार से तो झटका लगा ही था, अब भी शांति नहीं है। तेज प्रताप यादव को मकर संक्रांति के अवसर पर लालू यादव ने माफ कर दिया। उनका निर्वासन खत्म कर दिया और कह दिया कि वे परिवार के साथ रह सकते हैं। परिवार में एक और ध्रुवीकरण भी चल रहा है। रोहिणी आचार्य ने तेजस्वी के करीबी नेताओं के खिलाफ मोर्चा खोल रखा है। तेज प्रताप, मीसा और रोहिणी आचार्य एक होते हैं तो तेजस्वी यादव की स्थिति कमजोर हो सकती है। लिहाजा तेजस्वी का चिंतित होना स्वाभाविक है। इसलिए वे अब पार्टी पर नियंत्रण की जुगत भिड़ा रहे हैं। चर्चा है कि तेजस्वी आगामी 25 जनवरी को खुद को पार्टी का कार्यकारी अध्यक्ष घोषित करवा सकते हैं। ऐसा हुआ तो उनका मीसा भारती से टकराव शुरू हो जाएगा। मीसा भारती दो बार राज्यसभा की सदस्य रह चुकी हैं और इस समय लोकसभा की सदस्य हैं। दरअसल उन्होंने भी पिछले दिनों अपने माता-पिता से पार्टी का कार्यकारी अध्यक्ष बनने की इच्छा जाहिर की थी। लेकिन वह कुर्सी तेजस्वी लेंगे तो परिवार में टकराव बढ़ेगा।