वरिष्ठ पत्रकार कूमी कपूर ने ‘द इंडियन एक्सप्रेस’ के साप्ताहिक कॉलम ‘इनसाइड ट्रैक’ में बताया है कि बिहार विधानसभा में विश्वास मत से पहले किस तरह भाजपा क्राइसिस मैनेजमेंट में जुटी हुई थी।

कपूर ने लिखा है, “बिहार विधानसभा में विश्वास मत से पहले भाजपा ने यह सुनिश्चित करने के लिए पूरी कमान संभाली कि नीतीश कुमार NDA के समर्थन से जीत हासिल करें। भाजपा इसके लिए क्राइसिस ऑपरेशन में जुटी थी। हालांकि नीतीश इस पूरी कवायद के दौरान नजर नहीं आए।”  

वह आगे लिखती हैं, “विश्वास मत से एक रात पहले संभावित रूप से दलबदलू माने जाने वाले कुछ राजद विधायकों के साथ भाजपा ने एक बैठक की व्यवस्था की थी। लेकिन नीतीश उस बैठक में शामिल नहीं है। जब उनसे जदयू के आधे दर्जन ढुलमुल विधायकों से व्यक्तिगत रूप से बात करने के लिए कहा गया, तो उन्होंने सुलह का स्वर अपनाने के बजाय आक्रामक स्वर अपनाते हुए सुझाव दिया कि यदि वे पार्टी छोड़ना चाहते हैं, तो वे जा सकते हैं।”

बिहार विधानसभा में बहुमत के लिए 122 विधायकों के समर्थन की जरूरत होती है। विश्वास मत के दौरान एनडीए के पक्ष में 129 वोट पड़े। इसमें राजद के भी तीन विधायकों का वोट था। उन्होंने क्रॉस वोटिंग की थी। कपूर मानती हैं कि राजद विधायकों ने नीतीश के पक्ष में भाजपा की कोशिशों के कारण ही वोट दिया।

एनडीए में जाने के एक महीने बाद नीतीश कुमार ने फिर उठाई पुरानी मांग

तमाम राजनीतिक उठा-पटक के बावजूद नीतीश कुमार अपनी एक मांग पर दृढ़ता से कायम हैं। वह है केंद्र से बिहार के लिए “विशेष दर्जा ” की मांग। 23 फरवरी को, जब ऊर्जा मंत्री और वरिष्ठ जेडीयू नेता बिजेंद्र प्रसाद यादव ने नई एनडीए सरकार की ओर से बिहार के लिए विशेष दर्जा की मांग उठाई, तो सीएम को ट्रेजरी बेंच की तरह से इसे मंजूरी देते हुए देखा गया।

एक महीने पहले तक नीतीश ‘इंडिया गठबंधन’ में रहते हुए जो मांग उठा रहे थे, वही मांग वह एनडीए गठबंधन में रहते हुए उठा रहे हैं। नीतीश की यह मांग एक दशक से अधिक पुरानी है। ऊर्जा मंत्री ने सदन को बताया, “मैं इस अवसर पर प्रधानमंत्री से बिहार के लिए एक विशेष आर्थिक पैकेज पर विचार करने का अनुरोध करता हूं। हमने अपने सीमित संसाधनों से बहुत कुछ हासिल किया है और हमारे पास हवा, पानी और सौर स्रोतों से ऊर्जा उत्पादन की अपार संभावनाएं हैं। अगर हमें केंद्र से प्रोत्साहन मिलता है, तो हम और अधिक लोगों को गरीबी से बाहर निकालने में सक्षम होंगे।”

जदयू के एक वरिष्ठ नेता ने कहा, “केंद्र को बिहार के लिए एक रास्ता खोजना होगा। यदि हमें विशेष आर्थिक दर्जा मिलता है, तो हम राज्य में निवेश करने वाले उद्योगों को कर छूट प्रदान कर सकते हैं। यह सच है कि हम न तो यूपीए सरकार से और न ही एनडीए सरकार से विशेष राज्य का दर्जा हासिल कर पाए हैं, क्योंकि नियम इसकी इजाजत नहीं देते। लेकिन बिहार को अभी भी विशेष आर्थिक पैकेज दिया जा सकता है। फिर गुजरात की तरह हम भी विशेष आर्थिक क्षेत्र बना सकते हैं। चमड़ा, कपड़ा, इथेनॉल, आईटी और कई क्षेत्रों में स्टार्ट-अप के साथ हमारी हालिया सफलता ने हमें विश्वास दिलाया है कि बिहार भी औद्योगिक क्षेत्र में तेजी से प्रगति कर सकता है।”

हालांकि, भाजपा के बिहार के उपमुख्यमंत्री सम्राट चौधरी ने कहा है “राज्य को केंद्र से अतिरिक्त धन मिल रहा है। हमारा बजट आकार भी बढ़ गया है।” राज्य के एक अन्य भाजपा नेता ने कहा, “जद(यू) की विशेष आर्थिक पैकेज की मांग पर विचार किया जा सकता है। हमारी सरकार उचित समय पर इसे संबंधित केंद्रीय मंत्रालय के समक्ष उठाएगी।”

क्या है विशेष दर्जे की मांग?

वरिष्ठ पत्रकार संतोष सिंह ने अपने एक आर्टिकल में बताया है कि ऐतिहासिक असुविधा, दुर्गम या पहाड़ी इलाका, जनसंख्या की प्रकृति (कम घनत्व या आदिवासियों की बड़ी हिस्सेदारी), आर्थिक या ढांचागत पिछड़ापन आदि सहित कई कारणों से केंद्र सरकार दशकों से कुछ राज्यों को विशेष सहायता देती रही है।

1969 के बाद राष्ट्रीय विकास परिषद (NDC) नामक एक निकाय ने 11 राज्यों के लिए विशेष श्रेणी का दर्जा देने की सिफारिश की थी। उन राज्यों मे पूर्वोत्तर से आठ, जम्मू और कश्मीर (अब केंद्र शासित प्रदेश), हिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड शामिल थे। अब NDC को समाप्त किया जा चुका है।

हालांकि, 2015 में केंद्र द्वारा 14वें वित्त आयोग की सिफारिशों को स्वीकार करने के बाद, यह अवधारणा प्रभावी रूप से खत्म हो गई। योजना आयोग का स्थान लेने वाले नीति आयोग के पास धन आवंटित करने की कोई शक्ति नहीं है। इसलिए, केंद्र में सत्तारूढ़ दल को योजना आयोग के माध्यम से राज्यों को विशेष लाभ देने का जो विवेक हासिल था, वह अब नहीं है। हालांकि, बिहार, ओडिशा और झारखंड जैसे राज्य मांग पर कायम हैं।