दुनिया भर में मत्स्य और जलीय कृषि से हर साल दो करोड़ टन से अधिक कचरा निकलता है जिसमें अकेले भारत का हिस्सा लगभग 20 लाख टन है। इसे समुद्र केंद्रित अर्थव्यवस्था (ब्लू इकोनामी) का अहम हिस्सा माना जा रहा है। इसके तहत कारोबार के लिए मछली और शंख के अवशेष, समुद्री जैव-द्रव्य और समुद्र तट पर जमा कचरे को भोजन, पशु-आहार, दवा और कास्मेटिक सामग्री तथा जैव-अपघटनीय उत्पादों में बदला जाता है।
आर्थिक, सामाजिक और पर्यावरणीय लाभों के बावजूद, इस चलन को व्यावसायिक स्तर तक पहुंचाना बड़ी चुनौती बना हुआ है। अरसे से इस बात पर जोर दिया जा रहा है उद्यम केवल प्रयोग तक सीमित न रहें और निवेश, पर्यावरण संरक्षण तथा आजीविका के अवसर पैदा कर सकें।
समुद्री परिपत्र उद्यम जैव-आधारित विकल्पों के जरिये कार्बन उत्सर्जन घटाने, भोजन और पोषण सुरक्षा बढ़ाने तथा नए मूल्य-शृंखला विकसित करने में मदद कर सकते हैं। हालांकि ब्लू इकोनामी की क्षमता को व्यापक रूप से माना गया है लेकिन शासन, तकनीक और वित्त से जुड़ी कई आपस में जुड़ी चुनौतियों को सुलझाना जरूरी है। सही और लक्षित नीतियां तकनीक और अर्थव्यवस्था दोनों के विकास को गति दे सकती हैं। उपयुक्त नीति समर्थन मिलने पर 2050 तक ब्लू इकोनामी, खासकर परिपत्र ब्लू इकोनामी, से वैश्विक स्तर पर लगभग 5.1 करोड़ अतिरिक्त नौकरियां पैदा हो सकती हैं।
समुद्री कच्चा माल विविध और मौसमी होता है
समुद्री कच्चा माल विविध और मौसमी होता है जैसे मछली, शंख और समुद्री शैवाल का कचरा। इससे आपूर्ति शृृंखला में अनिश्चितता बनी रहती है। इन कच्चे पदार्थों की रासायनिक संरचना प्रजाति, पर्यावरण और प्रसंस्करण विधि के अनुसार बदलती रहती है जिससे उत्पादन प्रक्रिया, उपज और उत्पाद की गुणवत्ता प्रभावित होती है। प्रयोगशाला या पायलट स्तर पर समायोजन करके इस बदलाव को संभाल लिया जाता है, लेकिन बड़े औद्योगिक स्तर पर यह संभव नहीं होता। कई तटीय क्षेत्रों में केवल 30-40 फीसद समुद्री कचरा ही इकट्ठा होकर उच्च-मूल्य उत्पादों में बदल पाता है जबकि 70 फीसद तक कचरा या तो फेंक दिया जाता है या कम-मूल्य कामों में चला जाता है।
एकीकृत समुद्री बायोरिफाइनरी बनाने के लिए छोटे स्तर पर 20-40 करोड़ रुपए (2-5 मिलियन डालर) और व्यावसायिक स्तर पर 600 करोड़ रुपए से अधिक (80 मिलियन डालर) की जरूरत होती है।
समुद्री कचरे से बने उत्पाद उच्च-मूल्य लेकिन सीमित बाजारों में
अधिकांश समुद्री कचरे से बने उत्पाद उच्च-मूल्य लेकिन सीमित बाजारों (जैसे न्यूट्रास्यूटिकल्स, कास्मेटिक्स और दवाएं) पर केंद्रित हैं, जिनकी सालाना वृद्धि 7-10 फीसद है, लेकिन इन क्षेत्रों में नियम-कानून सख्त हैं और बाजार में आने में समय लगता है।
दूसरी ओर, पशु-आहार और उर्वरक जैसे कम-मूल्य उत्पादों की मांग ज्यादा है। उत्पादन क्षमता और बाजार मांग के इस असंतुलन से कई इकाइयां पूरी क्षमता से काम नहीं कर पाती। साथ ही, पर्यावरण, मत्स्य और उद्योग जैसे अलग-अलग विभागों में बंटी नियामक व्यवस्था के कारण मंजूरी में 12-24 महीने तक लग जाते हैं। खाद्य, पशु-आहार और दवा से जुड़े उत्पादों के लिए लागत कुल निवेश को 15-20 फीसद तक बढ़ा देती है, जो छोटे और मध्यम उद्यमों के लिए मुश्किल बन जाती है।
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