अयोध्या में 22 जनवरी को राम मंदिर का उद्घाटन करते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा कि यह सबके राम हैं। इसकी सही परख के लिए मौजूदा चुनावी अभियान से अच्छा कोई और वक्त नहीं हो सकता। ऐसे वक्त में जब करीब सौ दिनों तक ‘हम, भारत के लोग’, ‘हम, भारत के मतदाता’ बना दिए जाएंगे। हमारी पहचान इस बात के इर्द-गिर्द तय होगी कि हम मतदान केंद्र में अपने अधिकार का गुप्त प्रयोग किस रूप में करेंगे और किसकी झोली में कितनी सीटें डालने में मदद करेंगे।
इसी पृष्ठभूमि और इस शोर के बीच मैंने अपने परिवार की इच्छाओं को सुना और अपने माता-पिता के साथ अयोध्या का दौरा किया। दिव्यता को मात्र शब्दों में बयान करना चुनौतीपूर्ण है, लेकिन मंदिर की घंटियों में हमने जो कुछ सुना, वह स्वर नारों या भाषणों के शोर से ऊपर उठ गया।
बसंत की हवा में, राम के बाल रूप की उपस्थिति में, अपने माता-पिता को प्रार्थना करते हुए देखकर, एकता की एक अचूक भावना थी। एक परिवार की और एक मानवता की भी जो जाति, समुदाय, धर्म की हमारी पहचान से परे हो गई।
‘मर्यादा पुरुषोत्तम राम’
पिछले साल द इंडियन एक्सप्रेस के साथ एक साक्षात्कार में, जब मुख्य मंदिर को अंतिम रूप दिया जा रहा था, श्री राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट के तहत निर्माण समिति के अध्यक्ष और प्रधानमंत्री के पूर्व प्रधान सचिव नृपेंद्र मिश्रा ने अयोध्या से संदेश दिया: “इसे जीत के रूप में नहीं बयां किया जाना चाहिए – हां, भारत और बाहर के लोगों के एक बहुत बड़े समुदाय में उत्साह था जो महसूस करते थे कि अपना समय आ गया है। और कई लोग थे जिन्होंने मेरा मार्गदर्शन किया… और उन्होंने कहा, देखिए, राम ने ‘मर्यादा पुरुषोत्तम’ का दर्जा तब नहीं हासिल किया जब वह बच्चे थे या जब वह राजा बनने वाले थे, बल्कि तब किया जब वह 14 वर्ष वन में रहे। और, वहां उन्होंने क्या किया? अपने कार्यों के माध्यम से, उन्होंने समाज के लिए संदेश छोड़ने की कोशिश की – सद्भाव से रहें, वसुधैव कुटुंबकम के रूप में रहें… एक और संदेश कुछ ऐसा बनाने की कोशिश करना था जो सभी के लिए हो।
‘सबके राम’ एक समुदाय या राजनीतिक दल के नहीं
यदि हम एकता की भावना से परिभाषित देश हैं, तो राम एक खास धर्म के देवता हो सकते हैं लेकिन ‘सबके राम’ एक समुदाय या राजनीतिक दल के नहीं हैं। ‘सबके राम’ का अर्थ राम होना है, जिसका अर्थ है अच्छा होना। राम, धार्मिक पहचान का प्रतीक होने से बहुत दूर, एक आदर्श इंसान के सामाजिक और भावनात्मक उपस्थिति का एक शक्तिशाली और ऐतिहासिक प्रकटीकरण बन जाता है।
हमने अयोध्या में नूर आलम के बारे में सुना जो हजारों भक्तों को आश्रय और भोजन प्रदान करने में व्यस्त हैं। एक मुस्लिम परिवार में, प्राण प्रतिष्ठा के दिन एक बच्चे का जन्म हुआ और उसका नाम राम-रहीम रखा गया। ये व्यक्तिगत उपाख्यान हो सकते हैं लेकिन ये एक बड़ी कहानी कहते हैं। यह कोई नई कहानी नहीं है, यह रामायण और महाभारत के पन्नों की पंक्तियों के बीच है। महर्षि वाल्मीकि और बाद में गोस्वामी तुलसीदास, दोनों ही अपने-अपने तरीके से सबके राम बनाने में सफल रहे।

दरअसल, रामायण में राम के अनुकरणीय गुण धार्मिक से अधिक सामाजिक, आध्यात्मिक और दार्शनिक हैं। राम कभी उपदेश नहीं देते बल्कि हमेशा मानवीय मूल्यों की भावना को स्पष्ट करते हैं। सबके राम सुनते हैं, सबके राम हमें सहानुभूति की शक्ति सिखाते हैं; सबके राम सभी के राम बन जाते हैं – क्योंकि दूसरों की बात सुनना ही नेतृत्व की पहचान है।
लोकतंत्र में क्या है सबसे महत्वपूर्ण?
लोकतंत्र में सबसे महत्वपूर्ण अपेक्षा आम आदमी की बात सुनना है, घर या संसद में अंतिम व्यक्ति की बात सहानुभूति के साथ सुनने की क्षमता का पोषण करना है। राम सबके हैं क्योंकि वे सभी प्रजातियों के लिए हैं। उन्होंने बंदरों, पक्षियों और जीवों की एक टीम का नेतृत्व किया। वह गिलहरी और गिद्ध, दोनों के प्रयास को पहचानने के लिए तैयार थे। जाति या लिंग कभी बाधा नहीं बनी: शबरी और केवट दोनों राम के करीबी थे। राम समुद्र, पहाड़ों का भी उतना ही सम्मान करते थे। धर्मग्रंथों के इतिहास में, राम जितना पूर्ण और आकर्षक कोई अन्य पात्र नहीं रहा। एक पल, राम सीता के लिए आशंकित हैं, दूसरे पल वह लक्ष्मण के लिए आंसू बहा रहे हैं। राम हम हैं, राम हर व्यक्ति है – सबके राम।

चुनाव एकतरफा जीतने का खेल होता है। हर जीत को बढ़-चढ़ कर उछाला जाता है, हार को पीछे कर दिया जाता है। चुनावी वाद-विवाद का उद्देश्य बहस जीतना, सीट जीतना और सत्ता प्राप्त करना होता है। राम इन बातों से ऊपर उठ जाते हैं। राम, लक्ष्मण को आदेश देते हैं कि वे अपने नैतिक विरोधी रावण के पास जाकर सीखें। आज, यह असंभव है। विजेता अपनी जीत का लाभ उठाकर, पराजित लोगों को और कुचलने और उनकी भावनाओं को ठेस पहुंचाने में लग जाता है।
सबके राम के लिए, मानवीय मर्यादा से बड़ी कोई जीत नहीं थी। राम सभी को सीखने के स्रोत के रूप में देखते थे। जीत कोई जीत नहीं है, अगर यह घृणा को जगाती है और अहंकार को बढ़ावा देती है। यह विनम्रता की जीत है। अयोध्या में प्रतिष्ठित राम की प्रतिमा हमें इस राम से प्रेम करने का आदेश देती है, जो हमें सीखना, विनम्र होना, किसी को भी अपना दुश्मन न मानकर एक साथी के रूप में देखना सिखाता है। यह राम हैं जो मेरे या आपके नहीं हैं-बल्कि हमारे हैं। जब हम मंदिर से बाहर निकले, तो मेरे परिवार और मेरे लिए ज़ोर से जय श्री राम का जाप करने की कोई ज़रूरत नहीं थी। मौन की आवाज़ ही पर्याप्त थी। मैं अपने परिवार के साथ अयोध्या से थोड़ा और आत्मिक रूप से जागरूक होकर निकला।
(नंदितेश निलय ‘बीइंग गुड’, ‘आइए इंसान बनें’ और ‘इथियोक्स’ जैसी किताबों के लेखक हैं। वह नैतिकता, मूल्यों और व्यवहार पर पाठ्यक्रम पढ़ाते हैं और गांधी अध्ययन में आईसीएसएसआर के डॉक्टरेट फेलो भी हैं। लेख में लिखे विचार उनके निजी हैं।)
