इस बार एक फरवरी रविवार को आम बजट पेश होने जा रहा है। भारतीय केंद्रीय बजट के इतिहास में पहली बार ऐसा होने जा रहा है। केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण संसद में बजट पेश करेंगी, उनका यह लगातार नौवां बजट होगा। हालांकि 27 फरवरी, 1999 को भी बजट रविवार को ही पेश किया गया था, लेकिन वह एक अंतरिम बजट था। बजट के कारण अवकाश के दौरान भी भारतीय शेयर बाजार ( राष्ट्रीय स्टाक एक्सचेंज/ बाम्बे स्टाक एक्सचेंज) खुले रहेंगे।
कारोबाजार के इस विशेष अंक में केंद्रीय बजट निर्माण में प्रयुक्त होने वाले वित्तीय शब्दों के बारे में जानकारी दी जा रही है, जिससे कि जब एक फरवरी को संसद में बजट पेश होगा, तो उसकी बारीकियों को समझने में मदद मिलेगी। दरअसल, आम बजट में कई ऐसे शब्दों का बहुत इस्तेमाल होता है, जिनके बारे में आम लोग कम ही जानते हैं। यदि आप इन शब्दों का अर्थ नहीं जानते हैं तो आपके लिए बजट को समझना आसान नहीं होगा।
बजट की बारिकियां
बजट फ्रांसीसी भाषा के शब्द ‘बजुएट‘ का प्रतिरूप है। जिसका मतलब होता है धन (राजस्व) की आमदनी और उसके व्यय की सूची। ‘माइक्रो इकोनोमिक्स’ में बजट एक महत्वपूर्ण अवधारणा (कांसेप्ट) है। बजट किसी देश का हो सकता है, किसी संस्था का हो सकता है, किसी परिवार का हो सकता है या व्यक्तिगत। किसी वित्त वर्ष के दौरान सरकार द्वारा विभिन्न करों से प्राप्त राजस्व और खर्च के आकलन को बजट लेखा-जोखा कहा जाता है।
सेंट्रल प्लान आउटले : यह बजटीय योजना का वह हिस्सा होता है, जिसके तहत सरकार के विभिन्न मंत्रालयों और अर्थव्यवस्था के विभिन्न क्षेत्रों के लिए संसाधनों का बंटवारा किया जाता है।
आम बजट और अंतरिम बजट : बजट सरकार के सालाना खर्च का ब्यौरा होता है। इसके जरिए सरकार की प्राप्तियों (आमदनी) और खर्च का लेखा-जोखा पेश किया जाता है। चुनाव वाले साल के दौरान अंतरिम बजट पेश किया जाता है, अन्यथा केंद्र सरकार हर साल आम बजट पेश करती है।
अनुदान मांग : विभिन्न मंत्रालयों व विभागों के प्रस्तावित बजट अनुमान से वास्तविक खर्च अधिक होने की स्थिति में अनुदान मांगों के रूप में सरकार से मंजूरी लेनी होती है। इसे लोकसभा में पारित करवाना होता है। अनुदान मांगों को विनियोग विधेयक के जरिए सदन में पेश होता है। मंजूरी के बाद अनुदान मांगों की स्वीकृत धनराशि को समेकित निधि से निकाला जाता है।
समेकित निधि : केंद्र सरकार द्वारा टैक्सों, कर्जों, बैंकों और सरकारी कंपनियों के लाभांशों से जुटाई जाने वाली धनराशि समेकित निधि में ही जमा की जाती है। संसद की मंजूरी के बिना इस निधि से एक पैसा भी खर्च नहीं किया जा सकता है।
लेखानुदान मांग : बजट को संसद में पारित कराने में लंबा समय लगता है और ऐसे में सरकार एक अप्रैल से पहले पूरा बजट पारित नहीं करा पाती। इस स्थिति में अगले वित्त वर्ष के शुरुआती दिनों के खर्च के लिए सरकार संसद की मंजूरी लेती है। इन मांगों को लेखानुदान मांगें कहते हैं।
योजनागत व्यय : सरकारी व्यय को दो हिस्सों में बांटा जाता है- योजनागत व्यय (प्लांड एक्सपेंडिचर) और गैर-योजनागत व्यय (नान प्लांड एक्सपेंडिचर)। इनमें से योजनागत व्यय की सूची विभिन्न मंत्रालयों और नीति आयोग द्वारा मिल कर बनाया जाता है। इसमें मोटे तौर पर वे सभी व्यय आते हैं, जो विभिन्न विभागों द्वारा चलाई जा रही योजनाओं पर किया जाता है।
गैर योजनागत व्यय : गैर योजनागत व्यय के दो हिस्से होते हैं- गैर योजनागत राजस्व व्यय और गैर योजनागत पूंजीगत व्यय। गैर योजनागत राजस्व व्यय में जो व्यय आते हैं, उनमें शामिल हैं- ब्याज की अदायगी, सब्सिडी, सरकारी कर्मचारियों को वेतन की अदायगी, राज्य सरकारों को अनुदान, विदेशी सरकारों को दिए जाने वाले अनुदान आदि। गैर योजनागत पूंजीगत व्यय में शामिल हैं- रक्षा, पब्लिक इंटरप्राइजेज को दिया जाने वाला कर्ज, राज्यों, केंद्रशासित प्रदेशों और विदेशी सरकारों को दिया जाने वाला कर्ज।
पूंजीगत व्यय : पूंजीगत व्यय (कैपिटल एक्सपेंडिचर या कैपेक्स) किसी सरकार द्वारा किया जाने वाला वह व्यय होता है, जो भविष्य के लिए लाभ का सृजन करता है। कैपेक्स का इस्तेमाल संपत्तियां या उपकरण आदि खरीदने के लिए किया जाता है। इसके अलावा विभिन्न उपकरणों के ‘अपग्रेडेशन’ के लिए भी इसका उपयोग होता है।
राजस्व आय : कर राजस्व और गैर-कर राजस्व से प्राप्त होने वाली धनराशि को राजस्व आय कहते हैं।
राजस्व व्यय : सरकार के राजस्व खाते से खर्च होने वाली राशि को राजस्व व्यय (रेवेन्यू एक्सपेंडिचर) कहा जाता है। इसमें सभी सरकारी खर्च शामिल होते हैं। सरकारी विभागों, सरकारी निकायों और सरकारी सेवाओं पर होने वाले खर्च की धनराशि, सबसिडी, सरकारी कर्ज पर ब्याज और राज्य सरकारों को अनुदान राजस्व खर्च कहलाते हैं। राजस्व खर्च का नकारात्मक पहलू यह है कि इतनी बड़ी राशि व्यय होने के बावजूद कोई राष्ट्रीय परिसंपत्ति निर्मित नहीं होती है।
कर राजस्व : कोई सरकार कर लगा कर जो राजस्व हासिल करती है, उसे कर राजस्व कहा जाता है। सरकार विभिन्न प्रकार के कर लगाती है, ताकि वह योजनागत और गैर योजनागत व्यय के लिए धन एकत्र कर सके। यह सरकार की आय का प्राथमिक और प्रमुख स्रोत है।
गैर-कर राजस्व : गैर-कर राजस्व वह राशि है, जो सरकार कर के अतिरिक्त अन्य साधनों से एकत्र करती है। इसमें सरकारी कंपनियों के विनिवेश से मिली राशि, सरकारी कंपनियों से मिले लाभांश और सरकार द्वारा चलाई जाने वाली विभिन्न आर्थिक सेवाओं के बदले मिली राशि शामिल होती है।
संशोधित लेखा-जोखा : बजट में किए गए आकलनों और मौजूदा आर्थिक परिस्थिति के मद्देनजर इनके वास्तविक आंकड़ों के बीच का अंतर संशोधित लेखा-जोखा कहलाता है। इसका जिक्र आने वाले बजट में किया जाता है।
वित्त विधेयक : नए कर लगाने, कर प्रस्तावों में परिवर्तन या मौजूदा कर ढांचे को जारी रखने के लिए संसद में प्रस्तुत विधेयक को वित्त विधेयक (फाइनेंस बिल) कहते हैं।
विनियोग विधेयक : सरकार द्वारा संचित निधि से रकम निकासी को मंजूरी दिलाने के लिए संसद में प्रस्तुत विधेयक विनियोग विधेयक कहलाता है।
पूंजीगत प्राप्तियां : केंद्र सरकार द्वारा आम जनता और रिजर्व बैंक से लिए जाने वाले कर्ज, विदेशी सरकारों व संस्थानों से मिलने वाले ऋण, विनिवेश के जरिये प्राप्त आमदनी और राज्यों द्वारा वापस की गई उधारी कैपिटल रिसीट (पूंजीगत प्राप्तियां) में शामिल हैं।
पूंजीगत भुगतान या खर्च : जमीन, मकान, मशीनरी आदि की खरीद पर सरकारी खर्च, राज्य सरकारों, केंद्र शासित प्रदेशों और सरकारी कंपनियों को दिए जाने वाले कर्ज पूंजीगत खर्च कहलाते हैं। इस तरह के खर्च को संपत्ति निर्माणगत व्यय माना जाता है।
सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी): एक वर्ष के दौरान निर्मित सभी उत्पादों और सेवाओं के सम्मिलित बाजार मूल्य को सकल घरेलू उत्पाद कहा जाता है। इसमें कृषि, उद्योग और सेवा – तीन क्षेत्र शामिल होते हैं।
सकल राष्ट्रीय उत्पाद (जीएनपी): एक वर्ष के दौरान तैयार सभी उत्पादों और सेवाओं के सम्मिलित बाजार मूल्य तथा स्थानीय नागरिकों द्वारा विदेशों में किए गए निवेश के जोड़ को, विदेशी नागरिकों द्वारा स्थानीय बाजार से अर्जित लाभ में घटाने से प्राप्त रकम को सकल राष्ट्रीय उत्पाद कहा जाता है।
राष्ट्रीय ऋण : केंद्र सरकार के राजकोष में शामिल कुल ऋण को राष्ट्रीय ऋण कहते हैं। वित्तीय बजट घाटों को पूरा करने के लिए सरकार यह ऋण लेती है।
संचित निधि (कोष) : सरकार को प्राप्त सभी राजस्व, बाजार से लिए गए ऋण और स्वीकृत ऋणों पर प्राप्त ब्याज संचित निधि में जमा होते हैं।
आकस्मिक निधि (कोष) : इस कोष का निर्माण इसलिए किया जाता है, ताकि जरूरत पड़ने पर आकस्मिक खर्चों के लिए संसद की स्वीकृति के बिना भी राशि निकाली जा सके।
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