कर्नाटक की सत्ता में ‘गुप्त समझौते’ का विवाद कांग्रेस को भीतर से हिला रहा है। इसी बीच राहुल गांधी की OBC रणनीति, SIR प्रक्रिया पर उठते सवाल, संजय सिंह की राजनीतिक मजबूरियां और प्रधानमंत्री मोदी का 2035 तक मैकाले मॉडल खत्म करने का लक्ष्य – देश की राजनीति को एक नए उफान की ओर धकेल रहे हैं।

गुप्त समझौता

कर्नाटक में जारी कांग्रेस के अंदरूनी सत्ता संघर्ष का अंजाम क्या होगा? इसे लेकर सियासी गलियारों में काफी उत्सुकता देखी जा रही है। मल्लिकार्जुन खरगे ने कहा है कि सोनिया गांधी, राहुल गांधी और वे तीनों बैठकर जल्द इस मुद्दे पर फैसला लेंगे। यह बात अलग है कि डीके शिवकुमार खेमा साबित करने में तुला है कि विधायकों का ज्यादा समर्थन उनके साथ है। शिवकुमार ने ‘सीक्रेट डील’ यानी गुप्त समझौते की बात भी कही है। समझौता यही कि उनके और सिद्धारमैया के बीच चार-पांच लोगों के सामने अढ़ाई-अढ़ाई साल सरकार का नेतृत्व करने पर सहमति हुई थी। सिद्धारमैया के अढ़ाई साल 20 नवंबर को पूरे हो गए। उसी समझौते के आधार पर शिवकुमार मुख्यमंत्री-पद मांग रहे हैं। इस तरह के समझौते पहले भी हो चुके हैं। बसपा और भाजपा के बीच उत्तर प्रदेश में 1996 में छह-छह महीने की और फिर जम्मू-कश्मीर में पीडीपी व कांग्रेस के बीच अढ़ाई-अढ़ाई साल की। पर कांग्रेस आलाकमान क्या सिद्धारमैया को इस्तीफे के लिए कहेगा? अभी तक के संकेत यही बताते हैं कि पार्टी इस समय यह जोखिम नहीं लेगी। इसका बड़ा कारण सिद्धारमैया का ओबीसी होना है। राहुल गांधी ओबीसी पर जोर दे रहे हैं। फिर दक्षिण के तीन राज्यों में विधानसभा चुनाव होने वाले हैं। इन राज्यों में ओबीसी ज्यादा हैं। ऊपर से कर्नाटक में जातीय गणना भी चल रही है

बुनियादी बदलाव

राहुल गांधी जातीय जनगणना पर जब जोर दे रहे थे तो भाजपा ने उनकी खिल्ली उड़ाई थी। लेकिन राहुल ने दलित तबके के मल्लिकार्जुन खरगे को पार्टी का राष्ट्रीय अध्यक्ष बनाकर विरोधियों की बोलती बंद कर दी। वे पार्टी में दलितों और पिछड़ों को सचमुच में तरजीह दे रहे हैं। अभी हिमाचल प्रदेश कांग्रेस का अध्यक्ष विनय कुमार को बना दिया, जो विधानसभा के उपाध्यक्ष थे। विनय कुमार को राजपूत वर्ग की प्रतिभा सिंह की जगह लाया गया है। हिमाचल की सियासत पर राजपूतों और ब्राह्मणों का वर्चस्व रहा है। बिहार में भी अगड़े अखिलेश प्रसाद सिंह को हटाकर राहुल ने दलित राजेश राम को पार्टी की कमान सौंपी थी। झारखंड में अगड़े राजेश ठाकुर की जगह पिछड़े केशव महतो कमलेश को पार्टी का अध्यक्ष नियुक्त किया था। हरियाणा में दलित उदयभान को पार्टी अध्यक्ष पद से हटाया तो पिछड़े राव नरेंद्र को बना दिया।

नेता जी के दर्जे पर ही संकट

मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआइआर) की प्रक्रिया में विपक्षी दलों के साथ आरोप-प्रत्यारोपइस बार भी जारी है। विपक्षी दल लगातार निर्वाचन आयोग व भारतीय जनता पार्टी पर हमला बोल रहे हैं और मामले में आयोग तक भी पहुंच रहे हैं। लेकिन हाल ही में एक ऐसे नेता भी आयोग तक पहुंचे हैं, जिन्हें संबंधित दलों की ओर से ही उनके नेता के तौर पर मंजूरी नहीं मिली है। जब पार्टी से उनके वैध नेताओं का नाम मांगा गया तो, उनका नाम ही सूची से गायब था। इस पर बड़ा हेरफेर यह कि ये नेता न सिर्फ अपने दल, बल्कि दूसरे दलों के नेताओं को भी लेकर पहुंच रहे हैं। इस वजह से आयोग की बैठकें भी आने वाले दिनों में सियासी मंच बनती नजर आ रही हैं।

‘संजय’ का संयोग

आम आदमी पार्टी के राज्यसभा सांसद संजय सिंह इन दिनों चिंतित बताए जा रहे हैं। वे दूसरी बार राज्यसभा में हैं। लेकिन राजनीतिक अस्तित्व बचाने के लिए तीसरी बार का जुगाड़ भी तो जरूरी है। संजय सिंह के संदर्भ में दिल्ली से तो अब यह मुमकिन लगता नहीं। शायद इसलिए अपने गृह राज्य उत्तर प्रदेश में सक्रियता बढ़ाई है। पिछले दिनों अयोध्या से पदयात्रा शुरू की। यह यात्रा 22 नवंबर को प्रयागराज में खत्म हुई। उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव में अब 15 महीने ही बचे हैं। यह पदयात्रा शायद उनकी अपनी योजना रही होगी, क्योंकि उनकी पार्टी का कोई बड़ा नेता इसमें नहीं पहुंचा। फिर भी संजय सिंह सोशल मीडिया में चल रहे एक ‘मीम’ को लेकर परेशान हैं। इसमें संजय नाम वालों पर तंज किया गया है कि महाराष्ट्र में संजय राउत ने उद्धव की लुटिया डुबोई थी। फिर संजय सिंह ने दिल्ली में अरविंद केजरीवाल का कबाड़ा किया और अब बिहार में संजय यादव ने तेजस्वी का बंटाधार कर दिया। बेचारे संजय सिंह चटखारे लेने वालों को कैसे सफाई दें कि केजरीवाल किसी की सलाह से नहीं चलते। वे तो खुद को सर्वज्ञ मानते हैं। यहां तक कि संजय सिंह की पदयात्रा के बारे में एक ट्वीट तक नहीं किया। भारतीय राजनीति में भले संजय नाम के साथ खास संयोग जोड़े जा रहे हैं, लेकिन संजय सिंह का दुख यह है कि यह संयोग उनके साथ कतई मेल नहीं खा रहा है। भला, अरविंद केजरीवाल का बुरा कोई दूसरा कैसा कर सकता है?

अपवित्र अध्याय के खिलाफ

अयोध्या में राम मंदिर के शिखर पर ध्वजारोहण के अवसर पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने दावा किया कि उनकी सरकार ने गुलामी के प्रतीकों और कानूनों को हटाने का प्रयास शुरू किया है। उन्होंने कहा कि लक्ष्य लोगों की मानसिकता बदलना है। गुलामी की मानसिकता से मुक्ति दिलाने की बात प्रधानमंत्री पहले से करते रहे हैं। इसलिए अयोध्या में भी वे इसे भूले नहीं। अलबत्ता उन्होंने लार्ड मैकाले का भी जिक्र किया। याद दिलाया कि मैकाले ने जो व्यवस्था बनाई थी उसका मकसद देश को मानसिक रूप से गुलाम बनाना था। गुलामी की मानसिकता के बीज मैकाले ने 190 साल पहले 1835 में रोपे थे। दस साल में उस अपवित्र अध्याय के 200 साल पूरे हो जाएंगे। उससे पहले ही भारत को गुलामी की मानसिकता से मुक्त कराना है। प्रधानमंत्री ने देश को 2047 तक विकसित राष्ट्र बनाने का लक्ष्य तो पहले से तय कर रखा था। अब नया लक्ष्य 2035 तक मैकाले माडल से देश को निजात दिलाने का तय किया है। जाहिर सी बात है कि अब सरकार इस लक्ष्य को लेकर पूरी तरह से जन-जागरूकता की मुहिम में गंभीरता से जुटेगी।