ईरान में विरोध प्रदर्शन जारी हैं और इनमें 2500 से ज्यादा लोगों की मौत हो चुकी है। ईरान के सुप्रीम लीडर अयातुल्लाह अली खामेनेई के प्रशासन ने इन विरोध प्रदर्शनों को कुचलने की कोशिश की है और पूरे देश में इंटरनेट और संचार सेवाओं को बंद कर दिया।

इस बीच, अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ‘मदद रास्ते में है’ का बयान दिया और अब इस बात की आशंका है कि ईरान को लेकर युद्ध छिड़ सकता है।

ऐसे में सवाल यह है कि अमेरिकी सरकार के पास क्या विकल्प हैं और अगर तनाव बढ़ता है तो भारत की कूटनीति पर इसका क्या असर पड़ेगा?

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ईरान के अफसरों को मुश्किल हालात के बीच दूसरे देशों से बातचीत करने को लेकर काफी समझदार माना जाता है। इसका उदाहरण तब देखने को मिला था जब बराक ओबामा प्रशासन के नेतृत्व में अमेरिका ने ईरान पर भारी प्रतिबंध लगाकर शिकंजा कसा था और फिर ईरान ने बातचीत कर JCPOA परमाणु समझौते पर बातचीत करने का फैसला किया।

ईरानी शासन को बचाने की कोशिश

ईरान की सत्ता में कई गुट हैं। एक तरफ नरमपंथी हैं जो बातचीत और कूटनीति के पक्ष में हैं, वहीं दूसरी तरफ कट्टरपंथी रूढ़िवादी हैं जो टकराव का रास्ता अपनाते हैं लेकिन ये सभी एक बात पर सहमत हैं कि सर्वोच्च नेता खामेनेई के नेतृत्व वाले ईरानी शासन का अस्तित्व बना रहना चाहिए। इसलिए, बातचीत के जरिए मुश्किल हालात से निकलना ईरानी शासन की प्रमुख ताकत में से एक रहा है।

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कैरोलिन लेविट ने क्या कहा?

ऐसा दिख रहा है कि अमेरिका भी कूटनीति पर ही जोर दे रहा है क्योंकि डोनाल्ड ट्रंप ने यह भी कहा था कि उसने ईरान के नेतृत्व से बातचीत के लिए संपर्क किया है। व्हाइट हाउस की प्रेस सचिव कैरोलिन लेविट ने कहा कि राष्ट्रपति के लिए कूटनीति हमेशा पहला विकल्प होती है। उन्होंने कहा था, ‘ईरान निजी तौर पर जो संदेश दे रहा है, वह शासन द्वारा सार्वजनिक रूप से कही जा रही बातों से काफी अलग है और मुझे लगता है कि राष्ट्रपति उन संदेशों का पता लगाने में रुचि रखते हैं।’

लेविट ने यह भी कहा कि अन्य सभी विकल्प खुले हैं। उन्होंने कहा कि राष्ट्रपति जरूरत पड़ने पर सैन्य विकल्पों का इस्तेमाल करने से नहीं डरते और यह बात ईरान से बेहतर कोई नहीं जानता।

अगर कूटनीतिक विकल्प विफल हो जाता है तो अमेरिका कुछ अन्य कदम उठाने पर विचार कर सकता है।

इजरायल के साथ मिलकर हमला करेगा अमेरिका?

विशेषज्ञों का कहना है कि ट्रंप प्रशासन इजरायल के साथ मिलकर ईरान को निशाना बना सकता है। इसमें ईरानी सेना और रिवोल्यूशनरी गार्ड्स का बुनियादी ढांचा, कमान और नियंत्रण केंद्र और सरकार तथा उसके मिलिशिया द्वारा इस्तेमाल किए जाने वाले हथियारों और आपूर्ति के गोदाम शामिल हो सकते हैं। इसके अलावा वह ईरान के शीर्ष नेताओं को भी निशाना बना सकते हैं। जैसा ट्रंप के पहले कार्यकाल में ईरानी कमांडर कासिम सुलेमानी की हत्या के समय हुआ था।

अमेरिकी राष्ट्रपति ने पिछले साल कहा था कि वह ईरान के सर्वोच्च नेता अयातुल्ला अली खामेनेई को भी निशाना बना सकते हैं।

ईरान के परमाणु ठिकानों को बनाया था निशाना

पिछले साल जून में जब ईरान को 12 दिनों तक जंग लड़नी पड़ी थी तो उसकी सैन्य कमजोरी सामने आ गई थी। अमेरिका और इजरायल के हवाई हमलों ने ईरान की एयर डिफेंस प्रणाली को काफी हद तक तबाह कर दिया था। इसके बाद अमेरिकी B-2 बमवर्षक विमानों ने जमीन के अंदर बने ईरान के परमाणु ठिकानों को निशाना बनाया था।

ब्रिटिश अखबार फाइनेंशियल टाइम्स के मुताबिक, अमेरिका की सेंट्रल कमांड ने पहले ही मध्य पूर्व क्षेत्र में छह नौसैनिक जहाज तैनात कर दिए हैं। इनमें से पांच जहाज अरब की खाड़ी में तैनात किए गए हैं। यह अमेरिका का ईरान के प्रति आक्रामक रुख है और ऐसा तब है जब अमेरिका को सऊदी अरब, यूएई और पाकिस्तान का समर्थन हासिल है।

इन सभी विकल्पों का मतलब यह है कि अमेरिका को ईरान की जमीन से बाहर रहकर ही कार्रवाई करनी होगी। आम तौर पर ऐसी धारणा है कि हवाई हमलों या जहाजों से गोलाबारी के दम पर ईरान के शासन को उखाड़ फेंकने की गारंटी नहीं दी जा सकती।

इसके बाद यही विकल्प बचता है कि अमेरिकी सैनिकों को जमीन पर तैनात किया जाए।

निकोलस मादुरो के खिलाफ अमेरिका का एक्शन

अमेरिकी सेना ने इस महीने की शुरुआत में वेनेजुएला के राष्ट्रपति निकोलस मादुरो को गिरफ्तार कर लिया। इस ऑपरेशन में अमेरिकी सेना को बहुत कम नुकसान हुआ। सवाल यह है कि क्या अमेरिका ईरान में भी ऐसी कार्रवाई कर सकता है? ईरान में रिवोल्यूशनरी गार्ड्स की मजबूत कमांड को देखते हुए अमेरिका के लिए ऐसा करना बेहद मुश्किल होगा।

अगर अमेरिका और ईरान की सेनाएं जमीन पर आमने-सामने आ जाती हैं और दोनों पक्षों को जानमाल का नुकसान होता है तो एक बड़ा युद्ध छिड़ सकता है। इसका डोनाल्ड ट्रंप के MAGA समर्थक विरोध कर सकते हैं क्योंकि वे इराक और अफगानिस्तान में सैन्य कार्रवाइयों का विरोध कर चुके हैं।

भरत का क्या रुख है?

अगर अमेरिका ईरान पर हमला करता है तो भारत पर इसका असर पड़ेगा। अगर ईरान के अंदर हवाई हमले और सैन्य कार्रवाई होती है तो भारत के लिए अमेरिका का समर्थन करना मुश्किल होगा।

आर्थिक लिहाज से देखें तो भारत ने ईरान से तेल आयात लगभग पूरी तरह से बंद कर दिया है। ट्रंप के पहले कार्यकाल में अमेरिकी प्रतिबंध लगाए गए थे और अब यह भारत के ऊर्जा बाजार में छोटा खिलाड़ी बनकर रह गया है।

पश्चिम एशिया में हालात बिगड़े तो…

एक और मुश्किल स्थिति तब बनेगी, जब ईरान अपना अस्तित्व बचाने के लिए सऊदी अरब, यूएई, कतर आदि देशों में स्थित अमेरिकी ठिकानों पर हमला कर देता है। ऐसे में, अगर पश्चिम एशिया में हालात बिगड़ते हैं तो भारत की चिंता बढ़ जाएगी क्योंकि यहां लगभग 80-90 लाख भारतीय रहते और काम करते हैं।

भारत अपनी ऊर्जा की जरूरतों के लिए भी इस क्षेत्र पर काफी हद तक निर्भर है। भारत अपनी करीब 60 प्रतिशत ऊर्जा जरूरतों के लिए इसी क्षेत्र पर निर्भर है। इसलिए इस क्षेत्र में किसी भी तरह की अस्थिरता होने से भारत की ऊर्जा सुरक्षा को खतरा पैदा होगा और यह देश में महंगाई बढ़ने की वजह बन सकती है।

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