राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप जब से दूसरी बार अमेरिका की सत्ता में काबिज हुए हैं, उनके कई मनमाने फैसलों ने पूरी दुनिया पर असर डाला है। चाहे बिना चेतावनी टैरिफ लगाने की बात हो, किसी देश पर हमला करने की धमकी, या फिर दुनिया के किसी भी कोने में युद्ध रोकने के दावे- ट्रंप लगातार सुर्खियों में बने रहते हैं। आज वह खुद को दुनिया के सबसे ताकतवर नेताओं में शामिल मानते हैं।
ऐसे में हर किसी के मन में यह सवाल उठता है कि आखिर राष्ट्रपति ट्रंप इतनी मनमानी कैसे कर पा रहे हैं? अमेरिका पूरी दुनिया का “सरदार” कैसे बना हुआ है? इतिहास में जरूर कुछ ऐसा हुआ होगा, जिसने पूरी ग्लोबल पॉलिटिक्स को बदल दिया। वही अमेरिका, जो कभी अंग्रेजों का उपनिवेश था, आज दुनिया की सबसे बड़ी और ताकतवर सुपरपावर कैसे बन गया-इस कहानी की जड़ में है अमेरिकी डॉलर।
अंग्रेजों का उपनिवेश था अमेरिका
यह बात उस समय की है, जब अमेरिका अंग्रेजों का उपनिवेश था। 1607 में इंग्लैंड ने जेम्सटाउन में अपनी पहली स्थायी कॉलोनी बनाई। धीरे-धीरे 13 ब्रिटिश कॉलोनियां बन गईं और इन पर ब्रिटिश राजा का शासन था। समय के साथ इंग्लैंड ने अमेरिका में अपनी पकड़ मजबूत कर ली।
इसी दौर में यूरोप के कई लोग, जो धार्मिक मतभेदों से परेशान थे, बेहतर जिंदगी की तलाश में अमेरिका पहुंचे। लेखक जेसन गुडविन अपनी किताब Greenback: The Almighty Dollar and the Invention of America में बताते हैं कि ये लोग अपने साथ सोना और इंग्लिश सिक्के लेकर आए थे। शुरुआत में इन्हीं सिक्कों से वे खाने-पीने और जानवरों की खाल जैसी चीजें खरीदते थे, लेकिन जैसे ही उनके सिक्के खत्म हुए, हालात मुश्किल हो गए।
पैसे की कमी के कारण बार्टर सिस्टम यानी एक चीज के बदले दूसरी चीज लेने का चलन शुरू हुआ, लेकिन यह हर बार काम नहीं करता था। इसके बाद इन लोगों को वैम्पम (Wampum) नाम की खास सीपियों के बारे में पता चला, जिनकी अमेरिकी मूल निवासियों में काफी अहमियत थी। अंग्रेज बसने वालों ने इन्हीं वैम्पम के बदले खाने-पीने की चीजें लेनी शुरू कर दीं। इनकी अहमियत इतनी बढ़ गई कि 1637 में मैसाचुसेट्स कॉलोनी ने वैम्पम को कानूनी मुद्रा घोषित कर दिया।
जैसे-जैसे व्यापार बढ़ा, वैम्पम के अलावा दूसरी चीजों का भी इस्तेमाल होने लगा। उत्तरी कॉलोनियों में मक्का और कॉड मछली, जबकि दक्षिणी कॉलोनियों में तंबाकू का ज्यादा चलन रहा। लेकिन हर चीज भरोसेमंद नहीं थी। तंबाकू की कीमत फसल पर निर्भर करती थी और समय के साथ उसके पत्ते सूखकर खराब हो जाते थे। लोग खराब पत्तों से भुगतान करने लगे, जिससे व्यापार में गड़बड़ी बढ़ गई।
आज़ादी की लड़ाई और आर्थिक संकट
इन सब परेशानियों के बीच ब्रिटिश सरकार की नीतियों को लेकर गुस्सा बढ़ता गया। आखिरकार 1776 में अमेरिका ने स्वतंत्रता की घोषणा की और एक लंबी जंग शुरू हुई। 1783 में अमेरिका अंग्रेजों से आज़ाद हो गया, लेकिन इस लड़ाई ने अमेरिका के 13 राज्यों की हालत खराब कर दी।
युद्ध इतना लंबा और महंगा था कि सरकार के पास सैनिकों को वेतन देने, हथियार और कपड़े देने के लिए पैसा तक नहीं बचा। मजबूरी में उस समय की कांग्रेस ने कागज़ के नोट छापने शुरू किए। इन नोटों के सहारे, बिना टैक्स लगाए, अमेरिका ने यूरोप की एक बड़ी ताकत से युद्ध लड़ा। इन नोटों को “कॉन्टिनेंटल” कहा गया, लेकिन युद्ध खत्म होते-होते ये लगभग बेकार हो गए।
डॉलर का जन्म
आजादी के बाद सबसे बड़ी चुनौती थी एक नई आर्थिक व्यवस्था खड़ी करना। 1785 में अमेरिका ने डॉलर को अपनी आधिकारिक मुद्रा घोषित किया। तय किया गया कि 1 डॉलर = 100 सेंट होगा। इसके बाद 1862, यानी गृहयुद्ध के दौरान पहली बार डॉलर के नोट छापे गए। आगे से काले और पीछे से हरे रंग के इन नोटों को बाद में ग्रीनबैक कहा गया। यहीं से डॉलर की ताकत बढ़नी शुरू हुई और धीरे-धीरे अमेरिका दुनिया की बड़ी आर्थिक ताकत बन गया।
पेट्रोडॉलर और अमेरिकी दबदबा
अमेरिका समझ चुका था कि डॉलर में बहुत ताकत है, लेकिन वह इसे सिर्फ अपने देश तक सीमित नहीं रखना चाहता था। लक्ष्य था कि दुनिया में हर बड़ा व्यापार डॉलर में हो। इसी सोच से जन्म हुआ पेट्रोडॉलर सिस्टम का।
पेट्रोडॉलर का मतलब है- तेल बेचकर कमाया गया डॉलर। 1970 के दशक से दुनिया में ज्यादातर तेल की खरीद-बिक्री डॉलर में होने लगी। इसका नतीजा यह हुआ कि हर देश को तेल खरीदने के लिए डॉलर की जरूरत पड़ने लगी और डॉलर की मांग कभी कम नहीं हुई। तेल बेचने वाले देशों के पास जमा डॉलर वापस अमेरिका के सरकारी बॉन्ड (US Treasury) में निवेश किए जाने लगे। इसे पेट्रोडॉलर रीसायक्लिंग कहा गया। इससे अमेरिका को सस्ता कर्ज मिला और उसकी अर्थव्यवस्था और मजबूत हुई।
सऊदी अरब से ऐतिहासिक डील
1974 में अमेरिकी विदेश मंत्री हेनरी किसिंजर ने सऊदी अरब के साथ एक अहम समझौता किया। तय हुआ कि दुनिया में बिकने वाला ज्यादातर तेल सिर्फ डॉलर में बेचा जाएगा और बदले में अमेरिका सऊदी अरब को सुरक्षा की गारंटी देगा। यही डील पेट्रोडॉलर सिस्टम की सबसे अहम कड़ी साबित हुई।
डॉलर को चुनौती देने वालों का हश्र
डॉलर की इस ताकत को चुनौती देने की कोशिश कई देशों ने की। 2018 में वेनेजुएला ने ऐलान किया कि वह अपना तेल डॉलर में नहीं, बल्कि युआन, यूरो और रूबल में बेचेगा। अमेरिका को डर था कि अगर वेनेजुएला सफल हुआ, तो दूसरे देश भी यही रास्ता अपनाएंगे।
इतिहास गवाह है कि ऐसी कोशिश करने वालों को अमेरिका ने सबक सिखाया। इराक के सद्दाम हुसैन ने यूरो में तेल बेचने की बात की, लेकिन 2003 में अमेरिका ने इराक पर हमला कर दिया और सद्दाम को फांसी दे दी गई। लीबिया के गद्दाफी ने गोल्ड आधारित मुद्रा “गोल्ड दीनार” का विचार रखा, लेकिन 2011 में नाटो हमले में उनकी मौत हो गई।
बदलती वैश्विक तस्वीर
हालांकि, अब हालात बदल रहे हैं। रूस-यूक्रेन युद्ध के बाद रूस ने तेल व्यापार में रूबल और युआन का इस्तेमाल बढ़ा दिया है। ईरान पहले से ही गैर-डॉलर करेंसी में तेल बेच रहा है। चीन ने अपना अलग पेमेंट सिस्टम तैयार कर लिया है, जो हजारों बैंकों से जुड़ा है।
आगे क्या?
आज भले ही डॉलर की ताकत और ट्रंप की मनमानी अमेरिका को दुनिया का सरदार बनाए हुए हो, लेकिन आने वाले सालों में तस्वीर बदल सकती है। अगर डॉलर का कोई मजबूत विकल्प खड़ा हो गया, तो वैश्विक राजनीति और अर्थव्यवस्था के समीकरण पूरी तरह बदल सकते हैं।
