कॉलेज में फाइनल ईयर में थी और लगभग मेरी पढ़ाई पूरी हो चुकी थी। एग्जाम से कुछ दिनों पहले मुझे कुछ नोट्स की जरूरत थी और मदद के लिए मैने अपनी क्लास के एक लड़के से हेल्प ली। उससे पहले तक मैं सिर्फ उसका नाम जानती थी उसके बारे में मुझे कोई जानकारी नहीं थी। लेकिन धीरे-धीरे ये जान-पहचान इतनी ज्यादा बढ़ गई कि रिश्ता बनाने के मुकाम तक पहुंच गई।
वो मुझसे कहता था तुम्हारे बिना मैं अधूरा हूं।
तुम में ही मेरी दुनिया बसी है,
धीरे-धीरे मैं उसकी दुनिया में दाखिल हो गई लेकिन एक साल साथ रहने के बाद ही ये प्यार मेरी सांसों पर भारी पड़ने लगा। मेरी जिंदगी में प्यार से बना ये रिश्ता मेरे लिए ज़हर की तरह कड़वाहट घोलने लगा। मेरा रिश्ता एक टॉक्सिक रिश्ता बनता जा रहा था और इस ज़हर की एक-एक घूंट को मैं रोज पी रही थी।
टॉक्सिक रिलेशन किसे कहते हैं?
प्यार का अहसास किसी ठंडी छांव या सुकून भरी नींद जैसा होना चाहिए, जहां आप बिना किसी डर के खुद को महफूज़ समझ सकें। लेकिन कभी-कभी, जिसे हम मोहब्बत समझकर गले लगाते हैं, वह धीरे-धीरे एक खौफनाक बेड़ी में तब्दील होने लगता है। जब पार्टनर की मौजूदगी चेहरे पर मुस्कान के बजाय दिल में धड़कनें बढ़ा दे, घर का दरवाजा खुलते ही सुरक्षा नहीं बल्कि ‘अब क्या होगा’ वाला खौफ महसूस होने लगे तो समझ लीजिए कि आप प्यार की छांव में नहीं, बल्कि एक टॉक्सिक रिलेशनशिप (Toxic Relationship) की तपिश में झुलस रहे हैं।
टॉक्सिक रिलेशनशिप मनोविज्ञान क्या कहता है?
मनोविज्ञान के मुताबिक एक जहरीला रिश्ता अचानक अपनी असलियत नहीं दिखाता, ये किसी धीमे ज़हर की तरह आपके आत्मसम्मान (Self-esteem) और पहचान को किस्तों में खत्म कर देता है। इसमें कभी ‘गैसलाइटिंग’ के जरिए आपको मानसिक रूप से कमजोर किया जाता है, तो कभी ‘ट्रॉमा बॉन्डिंग’ के जरिए आपको अपनी ही कैद से मोहब्बत करना सिखा दिया जाता है। यही वजह है कि पढ़ा-लिखा, समझदार इंसान भी लंबे समय तक इस डर को अपनी नियति मानकर जीता रहता है। आखिर क्या है उस रिश्ते की साइकोलॉजी जो हमें अंदर से खोखला कर देती है? और क्यों एक पढ़ा-लिखा समझदार इंसान भी प्यार के नाम पर मिलने वाले इस डर को अपनी नियति मान बैठता है?
टॉक्सिक रिलेशन के साइन
हम टॉक्सिक रिलेशनशिप में जीते रहते हैं लेकिन उनके लक्षणों को अक्सर समझने में देरी कर देते हैं। टॉक्सिक रिलेशनशिप की सबसे खतरनाक बात यह है कि उसके संकेत बहुत मामूली लगते हैं। शुरुआत में पार्टनर इन सब वाक्यो से दिलासा देता है जैसे
मैं ये तुम्हारी भलाई के लिए कह रहा हूं।
तुम बहुत ज़्यादा सोचती हो।
तुम्हारे दोस्त तुम्हें मेरे खिलाफ भड़का रहे हैं।
धीरे-धीरे ये केयर, कंट्रोल में बदल जाती है। एक औरत अपनी जिंदगी दूसरे के इशारों पर जीती है।
Gaslighting के जरिये महिला को यह यकीन दिलाया जाता है कि समस्या रिश्ते में नहीं, उसी में है। जब इंसान खुद पर शक करने लगे, वहीं से मानसिक टूटने की शुरुआत होती है।’गैसलाइटिंग’ शब्द 1938 के एक नाटक से आया है, लेकिन मनोविज्ञान में यह एक गंभीर रिसर्च का मुद्दा है। ये एक मनोवैज्ञानिक युक्ति है जिसमें पार्टनर आपकी याददाश्त और आपकी मानसिक स्थिति पर ही सवाल उठाने लगता है। कई रिसर्च में ये बात साबित हो चुकी है कि लंबे समय तक गैसलाइटिंग झेलने वाले लोगों का सेल्फ-कॉन्फिडेंस पूरी तरह खत्म हो जाता है और वो अपनी ही सच्चाई पर शक करने लगता है। एक हेल्दी रिश्ता आपको खुद का बेहतर वर्जन बनने में मदद करता है, जबकि एक टॉक्सिक रिश्ता आपकी पहचान (Identity) को ही मिटा देता है।
जब रिश्ता दिमाग पर पड़ने लगता है भारी
मनोविज्ञान में टॉक्सिक रिलेशनशिप सिर्फ भावनात्मक दर्द नहीं देता, ये रिश्ता मानसिक हेल्थ पर भी अपनी गहरी छाप छोड़ने लगता है। कुछ महिलाएं जो टॉक्सिक रिलेशन में जी रही होती हैं उन्हें कई तरह की परेशानियां जैसे लगातार घबराहट (Anxiety) होना, नींद नहीं आना, Flashbacks में रहना, हर बात के लिए खुद को दोषी ठहराना, Low Self-Esteem जैसी समस्याएं होने लगती हैं।
क्लिनिकल साइकोलॉजिस्ट्स के मुताबिक, लंबे समय तक चलने वाला Emotional Abuse PTSD जैसी स्थिति भी पैदा कर सकता है। भले ही शरीर पर कोई चोट के निशान न हों लेकिन दिल और दिमाग इस रिश्ते से जख्मी होने लगता है।
प्यार कैसे ट्रॉमा बॉन्डिंग का ले लेता है रूप
ट्रॉमा बॉन्डिंग (Trauma Bonding) यानी कि पार्टनर से बिछड़ना मुश्किल क्यों हैं? दुनिया में ऐसे लाखों और करोड़ों रिश्ते हैं जिसमें इंसान दुखी होकर भी रिश्ता नहीं छोड़ता? मनोवैज्ञानिक डॉ. पैट्रिक कार्नेस द्वारा विकसित ‘ट्रॉमा बॉन्डिंग’ की थ्योरी बताती है कि जब एक पार्टनर बारी-बारी से बहुत ज्यादा सजा (Abuse) और फिर बहुत ज्यादा इनाम (Love-bombing) देता है, तो पीड़ित के दिमाग में डोपामाइन (Dopamine) का एक शक्तिशाली चक्र बन जाता है।
रिसर्च के मुताबिक ये बिल्कुल जुए या ड्रग्स की लत जैसा है। दिमाग को उम्मीद रहती है कि शायद अब सब ठीक हो जाएगा और यही उम्मीद पीड़ित को जहरीले रिश्ते में बांधे रखती है। मनोवैज्ञानिकों का मानना है कि अगर रिश्ता काम बन गया है, तो समझ लीजिए कि मरम्मत की नहीं, विदा लेने की जरूरत है।
टॉक्सिक रिश्ते से कैसे बाहर आएं, रिसर्च बेस्ड तरीका
जिंदगी पर बोझ बन चुके टॉक्सिक रिश्ते से बाहर निकलना सिर्फ एक भावनात्मक निर्णय नहीं है, बल्कि ये एक मनोवैज्ञानिक पुनर्गठन (Psychological Restructuring) की प्रक्रिया है। जर्नल ऑफ सोशल एंड पर्सनल रिलेशनशिप्स और मनोवैज्ञानिक विशेषज्ञों के अनुसार इस परेशानी से बाहर आने के लिए एक रणनीतिक दृष्टिकोण की आवश्यकता होती है।
सच्चाई से रूह बा रूह रहें
रिसर्च बताती है कि लोग अक्सर ये सोचकर रिश्ता निभाते रहते हैं कि आज नहीं तो कल हालात बेहतर हो जाएंगे और उनका पार्टनर भी ठीक हो जाएगा। इस मोह में टॉक्सिक रिश्ते के बोझ को ढोहते रहते हैं। एक्सपर्ट की सलाह है कि टॉक्सिक रिलेशन में आप पार्टनर के शब्दों पर नहीं, उनके व्यवहार के पैटर्न पर ध्यान दें। एक डायरी लिखें जिसमें केवल कड़वे सच हों। जब भी आप कमजोर पड़ें अपनी डायरी को ढ़ें। यह ‘कॉग्निटिव डिसोनेंस’ यानी दिमाग के भ्रम को खत्म करने में मदद करता है।
‘नो कॉन्टैक्ट’ रूल का पालन करें (The No-Contact Rule)
न्यूरोसाइंस के अनुसार टॉक्सिक पार्टनर की लत ड्रग्स की लत जैसी होती है। उनकी एक कॉल या मैसेज आपके दिमाग में फिर से डोपामाइन स्पाइक पैदा कर सकता है। ऐसे में आप इस रिलेशनशिप से अपने दिमाग को उभारना चाहते हैं तो आप कम से कम 30 से 90 दिनों तक पूरी तरह अपने टॉक्सिक पार्टनर से संपर्क काट दें। उसका नंबर ब्लॉक करें और कॉमन दोस्तों से बात न करें। यह आपके मस्तिष्क के ‘रिवॉर्ड सिस्टम’ को रिबूट करने के लिए आवश्यक है।
सोशल सपोर्ट लें
टॉक्सिक पार्टनर अक्सर आपको अपनों से अलग कर देते हैं। अमेरिकन साइकोलॉजिकल एसोसिएशन के अनुसार सोशल नेटवर्किंग आपकी रिकवरी की गति को 50% तक बढ़ा देता है। आप टॉक्सिक रिलेशन से उभरने के लिए उन पुराने दोस्तों और परिवार के सदस्यों से जुड़ें जो आपकी कद्र करते हैं। एक सेफ्टी नेट बनाएं जो आपकी भावनाओं को बिना जज किए सुन सके।
ट्रॉमा बॉन्डिंग को समझें और थेरेपी लें
टॉक्सिक रिश्तों के बाद अक्सर C-PTSD (Complex Post-Traumatic Stress Disorder) के लक्षण देखे जाते हैं। ऐसे में इस ट्रॉमा से उभरने के लिए आप एक प्रोफेशनल थेरेपिस्ट से बात करें। थेरेपी आपको यह समझने में मदद करेगी कि आप इस रिश्ते में क्यों फंसे थे। ये भविष्य में दोबारा ऐसे रिश्तों में पड़ने से रोकता है।
खुद को दोषी ठहराना बंद करें
कई रिसर्च में ये बात साबित हो चुकी है कि टॉक्सिक रिश्ते से निकले लोगों का ‘सेल्फ-लव’ न्यूनतम स्तर पर होता है। आप खुद को दोषी ठहराना बंद करें। छोटी-छोटी जीत का जश्न मनाएं।
डिस्क्लेमर
यह स्टोरी मानसिक स्वास्थ्य और रिश्तों से जुड़ी जागरूकता के उद्देश्य से तैयार की गई है। इसमें दी गई जानकारी सामान्य मनोवैज्ञानिक रिसर्च, विशेषज्ञों की राय और रिपोर्टेड अनुभवों पर आधारित है। यह किसी भी तरह की चिकित्सकीय या मनोचिकित्सकीय सलाह का विकल्प नहीं है। यदि आप या आपके आसपास कोई व्यक्ति मानसिक तनाव, भावनात्मक हिंसा या टॉक्सिक रिलेशनशिप का सामना कर रहा है, तो किसी योग्य मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञ से सलाह लें।
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