सरहद पर तैनात एक जवान अपनी दो मांओं की चिंता करता है, एक उसकी मातृभूमि और दूसरी उसकी जन्म देने वाली मां। मातृभूमि की रक्षा तो वो जवान अपने लहू से कर लेता है, लेकिन अपनी जन्म देने वाली मां को वो सिर्फ एक उम्मीद, एक दिलासा और एक तारीख दे पाता है। एक संदेश, एक चिट्ठी ही वो कागज है जिसके जरिए वो अपनी खामोशी, अपना दर्द, अपनी खुशी सब साझा करता है। ऐसे ही तो होते हैं ये संदेशे जो सच में आते हैं, तड़पाते हैं। हड्डियां जमा देने वाली ठंड के बीच जब पहाड़ों की ऊंची चोटियों से अपनों को संदेशे लिखे जाते हैं, तो लिखावट मायने नहीं रखती, टूटे अक्षर परेशान नहीं करते, बस एक आस होती है ये पढ़ने की- मैं ठीक हूं, आप चिंता मत करना।

कारगिल के युद्ध में भारत की सेना ने पाकिस्तान को बुरी तरह परास्त किया था। ऑपरेशन विजय ने इतिहास में अपना नाम दर्ज करवाया। लेकिन जीत का जश्न मनाने वाले शायद उन परवानों की चिट्ठियों को भूल चुके हैं जहां जीने की आस थी, दुश्मनों को परास्त करने का जज्बा था और घर वापस जाने की एक बड़ी उम्मीद। कारगिल युद्ध के दौरान संदेशे पहाड़ों की ऊंची चोटियों तक आते थे, फिर वहां से वापस जवाब भी जाते थे। दीक्षा द्विवेदी की किताब ‘लेटर्स फ्रॉम कारगिल: द कारगिल वॉर थ्रू आवर सोल्जर्स आइज़’ एक ऐसा अजूबा है जिसने उन चिट्ठियों को संजोकर रखा है जो हमारे बहादुर जवानों ने सरहद से अपने परिवार को लिखी थीं। नीचे कुछ ऐसी ही चिट्ठियों को पढ़ते हैं और उन वीर सपूतों को अपनी श्रद्धांजलि देते हैं-

अब चिट्ठियों में लिखे शब्द आज भी यही कहते हैं- सरहद पर लड़ने वाले हाथों में बंदूक ज़रूर थमी रहती है, लेकिन उनका दिल अब भी घर के पते ढूंढता है। ये चिट्ठियां उसी एहसास का नाम हैं। सोचने वाली बात यह है कि सरहद पर लड़ने वाला जवान गोलियों की तड़तड़ाहट को भी सुहावना मौसम बताता है, खराब लिखावट के लिए खून से सनी उंगलियों का दर्द छिपाता है और हड्डियां जमा देने वाली ठंड को बस एक बहाना बना देता है। यही है एक सैनिक की कहानी और यही है ‘संदेशे आते हैं’ वाला अहसास।

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