इंदौर के भागीरथपुरा इलाके में जहरीले पानी ने कई लोगों की जान ले ली है। अस्पतालों में भर्ती मरीजों की संख्या लगातार बढ़ती जा रही है। प्रशासन की नींद अब जाकर टूटी है, लेकिन सवाल अब भी कायम हैं। आखिर कब तक प्रशासनिक लापरवाही का खामियाजा आम जनता को भुगतना पड़ेगा?
यह सवाल इसलिए भी जरूरी है, क्योंकि भारत आज दुनिया की चौथी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन चुका है। यह उपलब्धि गर्व का विषय हो सकती है, लेकिन इसी गौरवशाली देश में पानी को लेकर चल रहा संघर्ष उसकी साख पर सवाल खड़े करता है। चाहे बात दूषित पानी की हो, पानी की कमी की हो या फिर पानी की बर्बादी की- हर मोर्चे पर भारत गंभीर संकट से गुजर रहा है। आंकड़े साफ बताते हैं कि देश भीषण जल संकट की गिरफ्त में है। सिर्फ राज्य बदलते हैं, समस्याओं का स्वरूप अलग होता है, लेकिन पानी का मुद्दा सुलझने के बजाय और उलझता जा रहा है।
गंदा पानी पीने को मजबूर भारतीय
सबसे पहले बात दूषित पानी की। भारत में यह समस्या अब केवल ग्रामीण इलाकों तक सीमित नहीं रही, बल्कि शहर-दर-शहर और कस्बों तक फैल चुकी है। नीति आयोग की 2018 की कंपोजिट वॉटर मैनेजमेंट इंडेक्स रिपोर्ट बताती है कि भारत गंभीर जल संकट से जूझ रहा है। देश के करीब 60 करोड़ लोग ‘एक्सट्रीम वॉटर स्ट्रेस’ की स्थिति में रह रहे हैं। साफ पानी की कमी के कारण हर साल करीब दो लाख लोगों की मौत हो रही है।
येल यूनिवर्सिटी की 2022 की एनवायरनमेंटल परफॉर्मेंस इंडेक्स रिपोर्ट के मुताबिक, अनसेफ ड्रिंकिंग वॉटर इंडेक्स में भारत की स्थिति बेहद खराब है। 180 देशों की सूची में भारत 141वें स्थान पर है। अनुमान है कि भारत का करीब 70 प्रतिशत पानी किसी न किसी रूप में प्रदूषित है। वहीं इंटरकनेक्टेड डिजास्टर रिस्क्स रिपोर्ट के अनुसार, वर्ष 2030 तक भारत में पानी की मांग उपलब्धता से दोगुनी हो जाएगी। इसका सीधा मतलब यह है कि देश की एक बड़ी आबादी को पानी के लिए संघर्ष करना पड़ेगा और इसका असर अर्थव्यवस्था पर भी पड़ेगा।
प्रदूषित नदियां बड़ी चुनौती
भारत इस समय सिर्फ जल संकट से ही नहीं, बल्कि जल प्रदूषण से भी गंभीर रूप से प्रभावित है। देश की नदियों में प्रदूषण का स्तर खतरनाक सीमा तक पहुंच चुका है। इंडिया वॉटर पोर्टल की रिपोर्ट के अनुसार, भारत की 323 नदियों के 351 नदी खंडों में जल गुणवत्ता मानकों से नीचे पाई गई है। इन प्रदूषित नदियों के कारण जलजनित बीमारियां तेजी से फैल रही हैं।
| नदी | स्थान / प्रवाह क्षेत्र | प्रमुख प्रदूषक / संकेतक | मापा गया स्तर (लगभग) | स्वीकार्य मानक (CPCB / BIS के अनुसार) |
| कूम नदी | अवडी → सत्य नगर, तमिलनाडु</td> | बीओडी, कोलीफॉर्म, भारी धातुएं | बीओडी ≈ 345 mg/L | बीओडी ≤ 3 mg/L; घुलित ऑक्सीजन (DO) ≥ 6 mg/L |
| साबरमती नदी | रायसन → वौथा, गुजरात | बीओडी, भारी धातुएं, नाइट्रेट | बीओडी ≈ 292 mg/L | बीओडी ≤ 3 mg/L |
| बहेड़ा नदी | टांडा, उत्तर प्रदेश</td> | बीओडी, कोलीफॉर्म बैक्टीरिया | बीओडी ≈ 287 mg/L | बीओडी ≤ 3 mg/L |
| यमुना नदी | पल्ला → असगरपुर (दिल्ली क्षेत्र) | बीओडी, घुलित ऑक्सीजन (DO), मल-कोलीफॉर्म | बीओडी: 30–90 mg/L, एफसी: >1,00,000 MPN/100 ml | बीओडी ≤ 3 mg/L; एफसी ≤ 500 MPN/100 ml |
| मीठी नदी | मुंबई, महाराष्ट्र | अमोनिया, बीओडी, निलंबित ठोस पदार्थ | बीओडी ≈ 250 mg/L | बीओडी ≤ 3 mg/L |
| मुसिकुंड नदी | जाजमऊ के पास, कानपुर</td> | क्रोमियम, बीओडी | बीओडी ≈ 240 mg/L, क्रोमियम: 5 mg/L | क्रोमियम ≤ 0.05 mg/L |
| गोदावरी नदी | नासिक क्षेत्र | बीओडी, कोलीफॉर्म | बीओडी ≈ 180 mg/L | बीओडी ≤ 3 mg/L |
| गंगा नदी (कानपुर–वाराणसी खंड) | उत्तर प्रदेश | बीओडी, मल-कोलीफॉर्म, प्लास्टिक | बीओडी ≈ 120 mg/L (स्थानीय हॉटस्पॉट) | बीओडी ≤ 3 mg/L |
| कावेरी नदी | तिरुचिरापल्ली, तमिलनाडु | नाइट्रेट, फॉस्फेट, बीओडी | बीओडी ≈ 90 mg/L | बीओडी ≤ 3 mg/L |
| मूसी नदी | हैदराबाद, तेलंगाना | नाइट्रेट, बीओडी, मल-कोलीफॉर्म | बीओडी ≈ 80 mg/L | बीओडी ≤ 3 mg/L |
लोग मर रहे, आर्थिक नुकसान अलग
आंकड़े बताते हैं कि भारत में हर साल करीब 3.77 करोड़ लोग पानी से फैलने वाली बीमारियों का शिकार होते हैं। अकेले डायरिया की वजह से लाखों बच्चों की जान चली जाती है। इंडिया वॉटर पोर्टल के मुताबिक, जलजनित बीमारियों के कारण भारत को हर साल करीब 600 मिलियन डॉलर का आर्थिक नुकसान उठाना पड़ता है। अगर कॉलरा, एक्यूट डायरियल डिजीज और टाइफाइड को भी जोड़ दिया जाए, तो पिछले पांच वर्षों में 10 हजार से ज्यादा मौतें दर्ज की गई हैं। विशेषज्ञों के अनुसार, इन मौतों का सबसे बड़ा कारण पानी में जैविक प्रदूषण, बिना ट्रीटमेंट का सीवेज, औद्योगिक अपशिष्ट और कृषि क्षेत्र से बहकर आने वाला रसायन है।
विश्व बैंक के मुताबिक, जल प्रदूषण के कारण भारत की जीडीपी को करीब तीन प्रतिशत तक का नुकसान हो रहा है। स्वास्थ्य सेवाओं पर खर्च बढ़ रहा है, कृषि उत्पादकता घट रही है और मत्स्य पालन व पर्यटन जैसे क्षेत्रों पर भी इसका नकारात्मक असर पड़ा है।
ग्राउंड वॉटर हो रहा खत्म
जहां एक ओर भारत दूषित पानी से जूझ रहा है, वहीं दूसरी ओर पानी की कमी भी बड़ी चुनौती बन चुकी है। भारत दुनिया में सबसे ज्यादा भूजल दोहन करने वाले देशों में शामिल है। पंजाब की स्थिति सबसे ज्यादा चिंताजनक है। सेंट्रल ग्राउंड वॉटर बोर्ड की नेशनल कंपाइलेशन ऑन डायनामिक ग्राउंड वॉटर रिसोर्सेज ऑफ इंडिया 2025 रिपोर्ट के अनुसार, पंजाब में भूजल का दोहन सबसे अधिक है। अगर यही स्थिति बनी रही, तो आने वाले वर्षों में राज्य में गंभीर जल संकट पैदा हो सकता है।
राजस्थान इस मामले में दूसरे स्थान पर है, जहां भूजल दोहन का स्तर 147 प्रतिशत से अधिक दर्ज किया गया है। हरियाणा तीसरे स्थान पर है, जहां यह आंकड़ा करीब 133 प्रतिशत तक पहुंच चुका है। उत्तर प्रदेश के पश्चिमी इलाकों में भी हालात बेहद चिंताजनक हैं। कई क्षेत्रों में भूजल स्तर 20 मीटर से भी नीचे चला गया है। दक्षिण भारत चले जाएं तो बेंगलुरु में हालात गंभीर बने हुए हैं। पिछले कई सालों से लगातार बेंगलुरु भयंकर जल संकट से जूझ रहा है, ना पीने का पानी मिल पाता है और ना ही दूसरे जरूरतें पूरी होती हैं।
बेंगलुरु पर संकट है बड़ा
असल में बेंगलुरु को 145 लीटर करोड़ पानी कावेरी नदी से मिलता है, 60 करोड़ लीटर बानी बोरवेल से आता है। अब ये दोनों ही स्त्रोत सूख रहे हैं और आईटी हब में हाहाकार मच चुका है। मौसम विभाग का जो अनुमान है, वो भी बेंगलुरु में आए इस महा संकट की तस्दीक करता है। कहा जा रहा है कि कर्नाटक का ये शहर ज्यादा गर्म होता जा रहा है, तापमान असामान्य रूप से बढ़ रहा है।
जल संकट कैसे बिगाड़ेगा आर्थिक सेहत?
अब भारत की जैसी हालत चल रही है और जल का संकट लगातार बढ़ता जा रहा है, हर बड़ी एजेंसी मानकर चल रही है कि आर्थिक तौर पर भी ये देश को काफी नुकसान पहुंचाने वाला है। सपने जरूर विकसित भारत के देखे जा रहे हैं, लेकिन उसमें एक बड़ी अड़चन से पानी का संकट ही बनता दिख रहा है। वर्ल्ड बैंक के मुताबिक 2050 तक भारत की जीडीपी 6 फीसदी तक कम हो जाएगी। इसके ऊपर पानी की कमी की वजह से किसानों के लिए खेतीवाडी करना भी मुश्किल होगा जिससे आके चलकर फूड प्रोडक्शन पर असर पड़ेगा। समझने वाली बात तो ये भी है कि टेक्सटाइल, थर्मल पावर कुछ ऐसी इंडस्ट्री हैं जहां पर पानी की जरूरत पड़ती है, ऐसे में उनके काम पर भी बड़े स्तर पर असर होने वाला है।
वैसे सरकार इन सभी संकटों से अवगत है, उसे पता है कि पानी की कमी और कम होता जल स्तर पर आने वाले समय में स्थिति को और ज्यादा बिगाड़ने वाला है। इसी वजह से कई परियोजनाएं केंद्र स्तर पर शुरू की गई हैं। उदाहरण के लिए जल शक्ति अभियान, जल जीवन मिशन, अटल भूजल योजना, अमृत सरोवर, नल से जल स्कीम, नमामी गंगे प्रोग्राम, नेशनल वॉटर पॉलिसी शुरू की जा चुकी हैं।
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