ईरान में चल रही अशांति और उसके खिलाफ अमेरिका के संभावित सैन्य हमलों को लेकर पश्चिम एशिया के अन्य देश चिंतित हैं। सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात, कतर और ओमान को डर है कि अगर हालात बिगड़े तो इसका असर पूरे क्षेत्र की शांति और सुरक्षा पर पड़ सकता है।
अंतर्राष्ट्रीय मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, कई खाड़ी देशों के ईरान के साथ संबंध काफी तनावपूर्ण रहे हैं, लेकिन वे तेहरान में शासन को उखाड़ फेंकने वाली अमेरिकी सैन्य कार्रवाई को रोकने के प्रयास में डोनाल्ड ट्रंप प्रशासन के साथ सक्रिय रूप से काम कर रहे हैं।
अभी तक ये कोशिशें असरदार लग रही हैं, लेकिन हालात अभी भी बेहद तनावपूर्ण और नाज़ुक हैं। अमेरिका के हस्तक्षेप की संभावना पूरी तरह खत्म नहीं हुई है। हाल ही में ट्रंप ने कहा कि अमेरिकी नौसेना का एक बेड़ा इस क्षेत्र की ओर बढ़ रहा है, हालांकि उन्होंने यह भी जोड़ा कि वे किसी तरह का टकराव नहीं चाहते और अमेरिका ईरान की स्थिति पर करीबी नजर रखे हुए है।
पिछले हफ्ते के अंत में दावोस में हुए विश्व आर्थिक मंच से लौटते समय ट्रंप ने एयर फोर्स वन में पत्रकारों से कहा कि शायद हमें इन जहाजों का इस्तेमाल न करना पड़े। उन्होंने बताया कि एहतियात के तौर पर कई जहाज उस दिशा में भेजे जा रहे हैं, जिनमें एक बड़ा बेड़ा भी शामिल है। ट्रंप ने कहा था कि हम देखेंगे कि आगे क्या होता है।
पश्चिम एशिया के बड़े और ताकतवर देशों की राजधानियां तनाव कम करने की कोशिश इसलिए कर रही हैं ताकि क्षेत्र में संतुलन बना रहे और उनके अपने आर्थिक व रणनीतिक हित सुरक्षित रहें। उनका मानना है कि अगर ईरान अस्थिर हुआ, तो यह उनके लिए मौजूदा ईरानी सरकार से भी ज्यादा बड़ा खतरा बन सकता है। इन देशों का तटस्थ रुख और तनाव घटाने की कोशिशों की एक बड़ी वजह तेल और गैस है। इसके अलावा, इस क्षेत्र से जुड़ा एक अहम आपूर्ति मार्ग भी है, जिसके बाधित होने से पूरी दुनिया की ऊर्जा आपूर्ति प्रभावित हो सकती है।
होर्मुज जलडमरूमध्य: अंतर्राष्ट्रीय तेल और गैस आपूर्ति के लिए महत्वपूर्ण क्षेत्र
होर्मुज जलडमरूमध्य ईरान और ओमान के बीच एक संकरा जलमार्ग है। यह फारस की खाड़ी को ओमान की खाड़ी और अरब सागर से जोड़ता है। अमेरिकी ऊर्जा सूचना प्रशासन (ईआईए) इसे “विश्व का सबसे महत्वपूर्ण तेल पारगमन चोकपॉइंट” कहता है, क्योंकि वैश्विक तरल पेट्रोलियम ईंधन खपत और वैश्विक द्रवीकृत प्राकृतिक गैस (एलएनजी) व्यापार का लगभग पांचवां हिस्सा इसी जलडमरूमध्य से होकर गुजरता है।
वैश्विक रीयल-टाइम डेटा और विश्लेषण देने वाली कंपनी केप्लर के अनुसार, पश्चिम एशिया के तेल उत्पादक देश होर्मुज जलडमरूमध्य में किसी भी रुकावट को लेकर खास तौर पर चिंतित रहते हैं। इसकी वजह यह है कि प्रतिदिन लगभग 15 मिलियन बैरल (बीपीडी) कच्चा तेल इसी समुद्री मार्ग से भेजा जाता है। इसके अलावा, दुनिया की कुल एलएनजी सप्लाई का लगभग 20 प्रतिशत भी इसी अहम मार्ग से होकर गुजरता है।
ईरान ने बार-बार जलडमरूमध्य की नाकाबंदी और इससे गुजरने वाले टैंकरों पर हमले की धमकी दी है। इसके अलावा, यमन में ईरान के समर्थकों द्वारा बाब अल-मंडेब जलडमरूमध्य से गुजरने वाले टैंकरों पर हमले का खतरा भी मंडरा रहा है। बाब अल-मंडेब जलडमरूमध्य लाल सागर को अदन की खाड़ी और अरब सागर से जोड़ता है और स्वेज नहर से गुजरने वाले वैश्विक ऊर्जा प्रवाह के लिए एक महत्वपूर्ण मार्ग है।
केप्लर में कच्चे तेल के विश्लेषण प्रमुख होमायून फलाकशाही ने हाल ही में एक नोट में कहा कि अगर हालात बिगड़ते हैं, तो सीधे बुनियादी ढांचे पर हमलों के अलावा और भी तरीके अपनाए जा सकते हैं। इनमें होर्मुज जलडमरूमध्य को बाधित करना या कुछ समय के लिए बंद करना, और दूसरे अहम समुद्री रास्तों- खासकर बाब अल-मंडेब के आसपास तनाव बढ़ाना शामिल है। इससे लाल सागर के व्यापार मार्गों और तेल टैंकरों की आवाजाही खतरे में पड़ सकती है।
उन्होंने यह भी कहा कि अधिकारियों को कथित तौर पर आशंका थी कि ईरानी ठिकानों पर अमेरिकी हमले खाड़ी के तेल और गैस अवसंरचनाओं, जिनमें अपतटीय प्लेटफार्म, प्रसंस्करण सुविधाएं और निर्यात टर्मिनल शामिल हैं। यह ईरान की जवाबी कार्रवाई को भड़का सकते हैं। संभवतः यही कारण है कि रियाद और दोहा ने कथित तौर पर अमेरिकी लड़ाकू विमानों को अपने हवाई क्षेत्र का उपयोग करने की अनुमति नहीं देने पर जोर दिया। फलकशाही ने कहा कि जिन्होंने होर्मुज जलडमरूमध्य को क्षेत्र की रणनीतिक कमजोरी बताया।
पश्चिम एशिया के बड़े देश अपनी अर्थव्यवस्था के लिए तेल और गैस से होने वाली कमाई पर बहुत ज्यादा निर्भर हैं। इसलिए वे ऐसा कोई सैन्य टकराव नहीं चाहते, जिससे उनके ऊर्जा निर्यात में रुकावट आ सकती है, क्योंकि इससे उनकी राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था को गंभीर नुकसान होगा। यह सब ऐसे समय में हो सकता है, जब दुनिया की अर्थव्यवस्था पहले से ही नाज़ुक दौर से गुजर रही है और इनमें से कई देश बड़े और लंबे समय के बदलाव वाले प्रोजेक्ट्स पर काम कर रहे हैं। अगर सच में जलडमरूमध्य बंद होता है, तो तेल और गैस की कीमतें तेज़ी से बढ़ेंगी। इससे वैश्विक अर्थव्यवस्था को झटका लगेगा और भारत जैसे ऊर्जा आयात पर निर्भर देशों के लिए हालात और भी मुश्किल हो जाएंगे।
टैंकर डेटा के अनुसार, भारतीय रिफाइनरियों द्वारा आयातित कच्चे तेल का 40% से अधिक हिस्सा पश्चिम एशिया के विभिन्न तेल उत्पादक देशों से होर्मुज जलडमरूमध्य के रास्ते परिवहन किया जाता है। भारत की ऊर्जा आपूर्ति और सुरक्षा के लिए इस महत्वपूर्ण मार्ग का महत्व कम नहीं आंका जा सकता, क्योंकि देश कच्चे तेल का विश्व का तीसरा सबसे बड़ा उपभोक्ता है और अपनी 88% से अधिक आवश्यकता को पूरा करने के लिए आयात पर निर्भर है।
हालांकि, पश्चिम एशिया के तेल निर्यातक देशों के पास कुछ पाइपलाइनें हैं, जिनके ज़रिए होर्मुज जलडमरूमध्य से बचकर तेल भेजा जा सकता है, लेकिन यह व्यवस्था सीमित है। यानी वे पूरी तरह इस रास्ते पर निर्भरता खत्म नहीं कर सकते। विशेषज्ञों का कहना है कि अगर इन सभी वैकल्पिक पाइपलाइनों का पूरा इस्तेमाल भी कर लिया जाए, तब भी बड़े स्तर पर तनाव या टकराव होने पर रोज़ाना करीब 9 मिलियन बैरल कच्चे तेल की आपूर्ति खतरे में रहेगी। यह मात्रा दुनिया की कुल तेल मांग का लगभग 9 प्रतिशत है।
फलकशाही ने कहा कि इसी वजह से ईरान पर किसी हमले का बाजार पर असर, वेनेजुएला जैसे अन्य देशों पर बनाए गए दबाव से बिल्कुल अलग होगा। उन्होंने बताया कि मध्य पूर्व की खाड़ी से होने वाला तेल निर्यात वैश्विक व्यवस्था से गहराई से जुड़ा है और इसे दूसरे रास्तों पर आसानी से नहीं मोड़ा जा सकता। होर्मुज़ नाकाबंदी की संभावना कम है, लेकिन इसे पूरी तरह से खारिज करना जोखिम भरा है।
हालांकि ईरान ने अतीत में कई बार जलडमरूमध्य को बंद करने की धमकी दी है, लेकिन उसने वास्तव में ऐसा कभी नहीं किया, यहां तक कि अपने कुछ सबसे भीषण युद्धों के दौरान भी नहीं। ऊर्जा क्षेत्र के कई विशेषज्ञ और विश्लेषक जलडमरूमध्य को बंद करने की किसी भी धमकी को चिंता की दृष्टि से देखते हुए मानते हैं कि इसकी संभावना काफी कम है, मुख्य रूप से इसलिए क्योंकि ऐसा कदम उठाने से ईरान को भारी कीमत चुकानी पड़ेगी, जो देश को मिलने वाले किसी भी लाभ से कहीं अधिक होगी।
केप्लर का कहना है कि ये चिंताएं अब भी बनी हुई हैं। भले ही इस बार ईरान ने खुलकर होर्मुज जलडमरूमध्य बंद करने की धमकी नहीं दी है, जबकि वह दबाव बढ़ने पर वह अक्सर ऐसी धमकी देता है। हकीकत में, इस रास्ते को पूरी तरह बंद करना ईरान के लिए राजनीतिक तौर पर खुद को नुकसान पहुंचाने जैसा होगा। इसकी बड़ी वजह चीन है। चीन के समुद्री रास्ते से होने वाले तेल आयात का करीब 40 प्रतिशत होर्मुज जलडमरूमध्य से होकर आता है। ऐसे में अगर लंबे समय तक यहां रुकावट आती है, तो इससे न सिर्फ खाड़ी के पड़ोसी देश नाराज़ होंगे, बल्कि ईरान के सबसे बड़े तेल खरीदार और अहम राजनीतिक समर्थक चीन को भी नुकसान पहुंच सकता है।
ईरान काफी हद तक होर्मुज जलडमरूमध्य पर निर्भर है। भले ही फारस की खाड़ी के बाहर उसका एक तेल निर्यात टर्मिनल मौजूद है, लेकिन उसकी क्षमता बहुत सीमित है और वह ईरान के ज़्यादातर तेल निर्यात का विकल्प नहीं बन सकता। अगर ईरान होर्मुज जलडमरूमध्य को बंद करने या वहां से गुजरने वाले तेल जहाजों पर हमला करने की कोशिश करता है, तो उसे अंतरराष्ट्रीय सैन्य कार्रवाई का सामना करना पड़ेगा।
विश्लेषकों का कहना है कि किसी भी प्रकार की संधि से ओमान के समुद्री क्षेत्र का उल्लंघन होगा, जिससे ईरान के अपने पड़ोसी देश के साथ संबंध खराब होंगे। यह स्थिति ईरान के लिए प्रतिकूल साबित होगी, क्योंकि उसके पड़ोस में ईरान के बहुत ज्यादा मित्र और सहयोगी नहीं हैं। ईरान अमेरिका के साथ गुप्त कूटनीति के लिए ओमान पर निर्भर है और मस्कट को नाराज करने से ईरान के कूटनीतिक विकल्प काफी सीमित हो सकते हैं।
गौर करने वाली बात यह है कि पिछले साल जून में इज़राइल के साथ सैन्य टकराव के दौरान ईरान ने होर्मुज जलडमरूमध्य बंद करने की धमकी तो दी थी, लेकिन उसे लागू नहीं किया। यह सब उस समय हुआ, जब अमेरिका ने संघर्ष के दौरान ईरान के परमाणु ठिकानों पर हमले किए थे। हालांकि, विश्लेषकों का मानना है कि अगर तेहरान की सरकार खुद को चारों ओर से घिरा हुआ और सत्ता के पतन के खतरे में महसूस करती है, तो संघर्ष के होर्मुज जलडमरूमध्य और पूरे पश्चिम एशिया में फैलने की आशंका काफी बढ़ सकती है और खाड़ी के बाकी देश ऐसा बिल्कुल नहीं चाहते।
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