देश में गुर्दे की बीमारी और इसके इलाज के लिए डायलिसिस कराने वाले मरीजों की संख्या में बढ़ोतरी हो रही है। विशेषज्ञों का मानना है कि समय रहते जांच कराना ही इस बीमारी का एकमात्र इलाज है क्योंकि एक बार यह बीमारी होे जाए तो इलाज व प्रबंधन काफी जटिल व चुनौती भरा हो जाता है, जिससे मरीज ही नहीं पूरा परिवार बर्बादी की कगार पर पहुंच जाता है।  इंडियन मेडिकल एसोसिएशन (आइएमए) के अध्यक्ष डॉ केके अग्रवाल ने कहा कि गुर्दे की बीमारी धीरे-धीरे बढ़ती है। इस रोग का पता तब चलता है जब यह तेजी से बढ़ने लगता है। एक बार गुर्दे खराब हो जाने के बाद उन्हें ठीक कर पाना संभव नहीं है। बीमारी बढ़ने पर शरीर के अंदर बार-बार विषाक्त कचरा इकट्ठा होने लगता है। जिन्हें भी इस रोग का जरा सा भी खतरा हो उन्हें अपने गुर्दों की जांच कराते रहना चाहिए, ताकि समय रहते इसका इलाज हो सके। जिन लोगों के गुर्दे पूरी तरह से खराब हो चुके हैं उनके शरीर से विषाक्त पदार्थ अपने आप बाहर नहीं आ पाते। उन्हें जिंदा रखने के लिए डायलिसिस या गुर्दा प्रत्यारोपण का ही विकल्प है।

क्या कहते हैं आंकड़े
आंकड़ों के मुताबिक, पिछले 15 सालों में देश में गुर्दे की बीमारी वाले मरीजों की संख्या बढ़कर दोगुनी हो गई है। देश में डायलिसिस करवाने वाले मरीजों की संख्या में भी 10 से 15 फीसद बढ़ोतरी हुई है और इससे भी अधिक चिंता की बात यह है कि इन मरीजों में काफी अधिक संख्या बच्चों की भी है। आइएमए के मुताबिक, भारत में किडनी की बीमारियों पर अभी भी ध्यान नहीं दिया जाता है, यही कारण है कि इस रोग की ठीक से जांच तक नहीं हो पाती। बीमारी गंभीर होने पर कुछ सालों में धीरे-धीरे गुर्दों की कार्यप्रणाली मंद होने लगती है और अंतत: वे एकदम से काम करना बंद कर देते हैं। इस रोग की अक्सर जांच नहीं हो पाती और लोग तब जागते हैं जब उनके गुर्दे 25 फीसद तक खराब हो चुके होते हैं।

बीमारी के कारण
आइएमए के मानद महासचिव डॉ आरएन टंडन ने कहा कि गुर्दे खराब होने के कई कारण हो सकते हैं जैसे- धूम्रपान, अल्कोहल का अधिक सेवन, अनुचित खानपान, एक ही जगह बैठे रहने वालाी जीवनशैली, डायबिटीज मैलिटस और उच्च रक्तचाप आदि। कई बार यह कुछ दवाइयों के साइड इफेक्ट से भी हो सकता है।