पणजी (गोवा) में बुधवार की रात भारत के 49वें अंतरराष्ट्रीय फिल्म समारोह (आइएफएफआइ 2018) का समापन समारोह श्यामा प्रसाद मुखर्जी सभागार में हुआ। इस मौके पर गोवा की राज्यपाल मृदुला सिन्हा, अभिनेता अनिल कपूर, कबीर बेदी, जिम सरब, मनोज तिवारी, अरबाज खान, डायना पेंटी, सोफी चौधरी, राकेश ओमप्रकाश मेहरा, राहुल रवैल और राकुलप्रीत उपस्थित रहे। सोफी चौधरी और अर्जन बाजवा ने समापन समारोह की मेजबानी की। समारोह की समापन फिल्म जर्मन फिल्म सील्ड लिप्स रही। विशेष इफ्फी अवॉर्ड जाने-माने फिल्म लेखक सलीम खान को मिला। सलीम खान की गैर मौजूदगी में यह सम्मान उनके बेटे अरबाज खान ने ग्रहण किया। आइसीएफटी गांधी मेमोरियल मेडल के सम्मान से फिल्म वाकिंग विद द विंड को सम्मानित किया। इस फिल्म को इसी साल तीन अलग-अलग राष्ट्रीय पुरस्कार भी मिले हैं।
भारतीय पैनोरमा में दिखाई गई जैनेंद्र कुमार दोस्त और शिल्पी गुलाटी की भोजपुरी फिल्म नाच भिखारी नाच भोजपुरी के शेक्सपीयर कहे जानेवाले महान लोक कलाकार-नाटककार भिखारी ठाकुर (18 दिसंबर 1887-10 जुलाई 1971) को उनके जीवित बचे चार कलाकारों के माध्यम से एक सिनेमाई श्रद्धांजलि है। इन्हीं में से एक रामचंदर माझी (बड़े) को हाल ही में संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार मिला है। 92 साल की उम्र में रामचंदर माझी का लौंडा नाच कई नए मिथक गढ़ता है। शिवलाल बारी (75), लखीचंद माझी(80 )और रामचंदर माझी छोटे (70) ने दशकों भिखारी ठाकुर की नाच मंडली मे काम किया। फिल्म इन चार कलाकारों की यादों, उनका वर्तमान जीवन और भिखारी ठाकुर के नाटकों की ठेठ प्रस्तुतियों पर आधारित है।
जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के स्कूल आॅफ आर्ट्स एंड एस्थेटिक्स में पांच साल के सघन शोध के बाद जैनेंद्र कुमार दोस्त यह फिल्म बना सके हैं। वे अपने सिनेमैटोग्राफर उदित खुराना के साथ इन चार कलाकारों के गांवों और भिखारी ठाकुर के नाटकों के लोकेल में गए। कैमरा आमतौर पर साइड एंगल्स शॉट लेता रहा इसलिए सामने से कोई चीज सीधी नहीं दिखाई देती। बहुत सारी कहानियां और इतिहास क्लोज अप शॉट्स कह देते हैं। 1920 से शुरू होकर आजतक की ये दास्तानें कई पीढ़ियों से गुजारती है। यह भी पता चलता है कि इन कलाकारों का अपना भरा पूरा परिवार है पर इनकी पत्नियों और बच्चों में कभी इनका नाच नहीं देखा। भिखारी ठाकुर के सबसे अधिक खेले गए नाटक बिदेसिया, बेटी बेचवा और गबर घिचोर को आज भी कई मंडलियां खेल रही हैं पर उनमें औरतों का चरित्र अब पुरुष नहीं निभाते।
शिवलाल बारी 75 साल की उम्र में भी नाटक कर रहे हैं। फिल्म में वे कहते हैं कि उन्होंने बिहार के मुजफ्फरपुर में अपनी आंखों से शादी के लिए बच्चियों (बेटियों) की मंडियाँ सजते देखी हैं जिसपर भिखारी ठाकुर ने बेटी बेचवा नाटक लिखा। इसमें पशुओं की मंडी की तरह पिता ज्यादा पैसा देने वाले अधेड़-बूढ़े को शादी के लिए अपनी बेटी दे देता था। भिखारी ठाकुर को ऊंची जातिवालों का भी विरोध सहना पड़ा था। दिल्ली में जब रामचंदर माझी बड़े 92 साल मे लौंडा नाच करते है तो उनकी तुलना श्रीदेवी और अमिताभ बच्चन से की जाती है। वे मंच से शरमाते हुए लालू प्रसाद यादव का नाम लेते हैं जिन्होंने उनकी सदा मदद की।
दरअसल भिखारी ठाकुर की नाट्य प्रस्तुतियों की रिकार्डिंग दुर्लभ है। जो कुछ बचा है वह उनके कलाकारों ने बचाया है। यह फिल्म एक विलुप्त होती लोक कला को बचाने की कोशिश भी है। भिखारी ठाकुर पर ह्रषिकेश सुलभ का नाटक बटोही और संजीव का उपन्यास सूत्रधार हिंदी साहित्य जगत में काफी लोकप्रिय है, पर एक मुकम्मल फीचर फिल्म की जरूरत अभी भी बनी हुई है ।
