बेमिसाल शायर गुलजार आज यानि 18 अगस्त को 82 साल के हो गए हैं। बॉलीवुड को बेहतरीन नगमे देने वाले गुलजार मिर्जा गालिब के बड़े मुरीद हैं। गालिब के लिए उनके मन में इतनी इज्जत है कि वो खुद को गालिब का एक नौकर ही मानते हैं। वो गालिब से इतने प्रभावित थे कि उनकी जिंदगी पर एक फिल्म बनाना चाहते थे। इस फिल्म में पहले वो संजीव कुमार को लेना चाहते थे। लेकिन किसी ना किसी वजह से ये प्रोजेक्ट टलता गया और आखिर में इस प्रोजेक्ट में गालिब बनने का मौका नसीरुद्दीन शाह को मिला। वो तब तक जमाना था जब दूर दर्शन बढ़ रहा था। ज्यादा से ज्यादा दर्शकों तक पहुंचने के लिए फिल्म मेकर्स दूरदर्शन की तरफ बढ़ने लगे थे। ऐसे में गुलजार ने भी अपने इस ड्रीम प्रोजेक्ट के लिए दूरदर्शन को चुना और फिल्म की जगह एक टीवी सीरियल की शुरुआत की। इस वक्त तक नसीर इंडस्ट्री में अच्छी पहचान बना चुके थे। इस रोल के लिए गुलजार ने नसीर को चुना था। इसके साथ ही गुलजार और नसीर दोनों का एक पुराना सपना सच हुआ। बता दें कि जब पहले गुलजार ने गालिब के रोल के लिए संजीव को चुना था तो नसीर ने उनके इस फैसले पर सवाल उठाते हुए एक चिट्ठी लिखी थी। वो चिट्ठी तो गुलजार साहब तक नहीं पहुंची थी। लेकिन कुदरती कुछ ऐसे हालात बनते गए कि यह फिल्म एक सीरियल बन गई, नसीर को उनका पसंदीदा कैरेक्टर मिला और गुलजार के लिए उनका सपना सच हो गया था।

संपूरन सिंह कालरा यानि गुलजार के घर वाले उनकी लिखने की आदत से खुश नहीं थे। वो अकसर ही उन्हें कहते थे कि वो ये सब कर अपना टाइम खराब कर रहे हैं। इसलिए संपूरन ने गुलजार दीनवी के नाम से लिखना शुरू किया। बाद में उन्होंने इस नाम को और छोटा कर गुलजार कर लिया। भले ही शुरुआत में गुलजार के पिता और घर वालों ने लिखने के लिए उनकी कभी तारीफ नहीं की थी। लेकिन उन्होंने गुलजार की मेहनत और उनके संघर्ष को हमेशा सराहा। यही वजह थी कि जब गुलजार के पिता की मृत्यु हुई तो उन्हें खबर तक नहीं की गई। ये घटना उस वक्त की है जब काफी मेहनत के बाद गुलजार साहब विमल रॉय के असिस्टेंट बन गए थे। इसी दौरान उनके पिता की मृत्यु हो गई। अब उनके परिवार ने सोचा कि अगर इस समय उन्हें ये खबर दी गई तो वह सब काम छोड़ दिल्ली चले आएंगे। इतनी मुश्किल से उन्हें ये काम मिला है। तो ये मौका उनके हाथ से कैसे जाने दिया जाए। ये सब सोचकर उनके परिवार ने उन्हें ये खबर नहीं दी। गुलजार साहब के बड़े भाई जो मुंबई में रहते थे। वो दिल्ली पहुंचे और पिता की अंतिम क्रिया में शामिल हुए। कुछ दिनों बाद दिल्ली के एक पड़ोसी ने गुलजार साहब को इस सब के बारे में बताया। खबर सुनकर वह घर पहुंचे, वहां सारे क्रियाक्रम निपट चुके थे। पिता के अंतिम क्रियाक्रम में शामिल ना हो पाने पर गुलजार साहब बेहद दुखी थे। इसकी टीस हमेशा उनके मन में रहती थी। उन्हें लगता था कि वो आखिरी दिनों में पिता की सेवा नहीं कर पाए। इसलिए विमल रॉय जिन्हें वो अपना गुरू मानते थे उनके अंतिम दिनों में वो उनके साथ रहे। उनका खयाल रखते थे। जिस दिन विमल रॉय ने अंतिम सांस ली गुलजार साहब उनके अंतिम क्रिया क्रम में शामिल हुए और साथ साथ अपने पिता की भी अंतिम क्रिया की। गुलजार साहब की जिंदगी की इस घटना का जिक्र जिया उल सलाम की किताब हाउसफुल ‘द गोल्ड ईयर्ज ऑफ बॉलीवुड’ में है।
दिल छू लेने वाली शायरी लिखने वाले गुलजार एक्ट्रेस राखी के साथ प्यार में पड़े थे। दोनों ने शादी भी की लेकिन रिश्ते को दिया गया यह नाम दोनों के लिए लकी नहीं रहा। बेटी मेघना गुलजार के पैदा होने के एक साल बाद 1974 में दोनों अलग-अलग हो गए। दोनों में अभी तक तलाक नहीं हुआ है। ना ही कभी किसी अफेयर की खबर आई लेकिन दोनों ने साथ रहना छोड़ दिया। एक तरफ जहां दोनों सालों से अलग थे। वहीं एक अवॉर्ड फंक्शन में गुलजार साहब के राखी को अजी सुनती हो कहने पर वहां मौजूद सभी लोग जोर से हंस पड़े थे। ये घटना 1990 में हुए 35वें फिल्म फेयर अवॉर्ड की है। गुलजार साहब को बेस्ट एक्टर इन सपोर्टिंग रोल का अवॉर्ड देने के लिए स्टेज पर बुलाया गया। गुलजार साहब ने जैसे ही अवॉर्ड विनर के तौर पर राखी का नाम देखा तो बोल पड़े, इसमें वो नाम है जिस नाम को मैं कुछ अलग अंदाज में बुलाउंगा, अजी सुनती हो। ये सुनकर वहां मौजूद हर व्यक्ति जोर से हंस पड़ा। गुलजार के राखी को इस तरह पुकारने पर लोगों में हैरानी भी थी। क्योंकि सालों पहले दोनों अलग हो चुके थे। इसी के बाद से राखी ने पर्दे पर वापसी की थी।