अशोक बंसल
कालजयी साहित्यिक कृतियों (कविता, कहानी, उपन्यास आदि) के जन्म की कहानी बेहद रोचक होती है। गीतकार शैलेंद्र के तीन फिल्मी गीतों के जन्म के किस्से बेहद रोचक हैं। इस बारे में किस्से शैलेंद्र के बेटे दिनेश और बेटी अमला ने मथुरा में सुनाए थे। जब दिनेश से एक प्रशंसक ने पूछा ‘शैलेंद्र जी इतने सुंदर गानों की रचना कैसे कर पाते थे?’ दिनेश ने बताया कि उनके बहुत से गीत ऐसे हैं जिनके मुखड़े बातचीत करते, सड़क पर चलते अधरों से यूं ही फिसल जाते थे। बाद में मुखड़े को आगे बढाकर गीत पूरा करते थे । जैसे -फिल्म ‘सपनों के सौदागर’ के प्रोड्यूसर बी अनंथा स्वामी ने शैलेंद्र को इस फिल्म के लिए एक गाना लिखने को दिया था। बाबा (शैलेंद्र) का गीत लिखने का मूड ही नहीं बनता था। एक दिन अनंथा स्वामी और बाबा का आमना-सामना हो गया। अनंथा स्वामी को नाराज देखकर बाबा के मुंह से निकल पड़ा -‘तुम प्यार से देखो, हम प्यार से देखें, जीवन की राहों में बिखर जाएगा उजाला।’ यह लाइन सुनकर स्वामी की नाराजगी उड़नछू हो गई और बोले- ’आप इसी लाइन को आगे बढ़ाइए।’ इस तरह सपनों के सौदागर फिल्म के इस गाने का जन्म हुआ।
इसी तरह 1955 में आई फिल्म श्री 420 के गाने मुड़ मुड़ के न देख मुड़ मुड़ के… के जन्म की कहानी है। बाबा ने नई कार ली थी। अपने दोस्तों (मुकेश, शंकर, राजकपूर) को लेकर बाबा सैर पर निकले। लाल बत्ती पर कार रुकी। एक लड़की कार के पास आकर खड़ी हो गई। सभी उस लड़की को कनखियों से निहारने लगे। अचानक बत्ती हरी हुई तो कार चल पड़ी। शंकर उस लड़की को गर्दन घुमा कर देखने लगे। बाबा ने चुटकी ली ‘मुड़ मुड़ के न देख मुड़ मुड़ के’। फिर पूरे गाने का जन्म कार में हो गया ।
दिनेश ने बताया एक बार ख्वाजा अहमद अब्बास ने राजकपूर को एक कहानी सुनाने को बुलाया। राजकपूर शैलेंद्र को भी ले गए। कहानी खत्म हुई तो अब्बास ने राजकपूर से पूछा कहानी कैसी लगी? राज कपूर ने शैलेंद्र की तरफ देखा। शैलेंद्र ने कवि के अंदाज में कहा-आवारा हूं या गर्दिश में हूं आसमान का तारा हूं।
शैलेंद्र के इस अंदाज पर अब्बास की आंखें फटी की फटी रह गईं। कहानी पर आवारा फिल्म बनी और यह गाना फिल्म का टाइटिल गाना बना।
बल्कि बेहद लोकप्रिय हुआ। दिनेश का कहना है कि यह डायरी वे शीघ्र ही प्रकाशित करेंगे।
