जावेद अख्तर का जन्म 17 जनवरी 1945 को मध्य प्रदेश के ग्वालियर में हुआ था। उनके जन्म के समय परिवार की आर्थिक स्थिति बहुत कमजोर थी। खुद जावेद अख्तर ने कई बार बताया है कि उनके पैदा होने पर घर में इतनी तंगी थी कि मिठाई बांटने तक के पैसे नहीं थे और नवजात बच्चे के लिए कपड़े भी उधार लेने पड़े थे। उनके पिता जान निसार अख्तर उस दौर के मशहूर उर्दू शायर थे, लेकिन साहित्यिक पहचान के बावजूद आमदनी सीमित थी। मगर उनके पिता बेटे के जन्म से बहुत खुश थे, इतना खुश कि उन्होंने तुरंत उनका नाम भी रख दिया।

जान निसार अस्पताल पहुंचे, अस्पताल में उनके दोस्तों ने उन्हें वह सुंदर कविता याद दिलाई जो उन्होंने अपनी दुल्हन के लिए लिखी थी, जिसमें वे कहते हैं कि उनकी शादी के बाद हर पल किसी न किसी जादू की कहानी होगी। ‘लम्हा लम्हा किसी जादू का फसाना होगा…’ उन्हें उस समय जावेद का जन्म किसी जादू जैसा लगा था और जान निसार ने बिना सोचे समझे अपने पहले बेटे का नाम जादू रख दिया। मगर बाद में उन्हें ये नाम बदलना पड़ा।

इसके साथ ही कुछ और भी खास हुआ। जिस दिन जावेद का जन्म हुआ, उस दिन जान निसार को नवजात बच्चे के कान में अजान सुनाने की परंपरा निभाने के लिए कहा गया। लेकिन निसार की मान्यताएं अलग थीं। उनके हाथ में कम्युनिस्ट पार्टी का घोषणापत्र था, जिसे उन्होंने जावेद अख्तर के कान में सुनाया। उनका मानना था कि बचपन से ही उनके भीतर तर्क, इंसाफ और बराबरी के मूल्य बैठ जाएं। यह कोई धार्मिक रस्म नहीं थी, बल्कि एक वैचारिक कदम था।

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जावेद अख्तर खुद बताते हैं कि उनके पिता कट्टर रूप से प्रगतिशील, धर्मनिरपेक्ष और वामपंथी सोच के इंसान थे। वे मानते थे कि बच्चे के जीवन की शुरुआत धर्म या कर्मकांड से नहीं, बल्कि विचार और चेतना से होनी चाहिए। इसी सोच के तहत उन्होंने बेटे के कान में किसी धार्मिक मंत्र या अजान की जगह कम्युनिस्ट पार्टी का घोषणा-पत्र सुनाया। उनका उद्देश्य यह था कि उनका बेटा बड़ा होकर अंधविश्वास से दूर रहे, सवाल करना सीखे और समाज में बराबरी, इंसाफ और इंसानियत के पक्ष में खड़ा हो।

स्कूल के लिए बदला नाम

जन्म के वक्त तो निसार को अपना बेटा एक जादू जैसा लगा, लेकिन जब उनका स्कूल में दाखिला कराने गए तो ये नाम ठीक नहीं लगा। इसलिए उसका नाम बदलकर जावेद रख दिया गया, जिसका अर्थ है शाश्वत। अख्तर का अर्थ तारा होता है।

जादूनामा: जावेद एक सफर

ये नाम है जावेद अख्तर की किताब का, जिसमें उन्होंने अपने बचपन से बड़े होने तक के बारे में बहुत कुछ बताया है। उनके पिता की विचारधारा के कारण ही आज जावेद अख्तर धर्मनिरपेक्ष सोच रखते हैं और हर मुद्दे पर खुलकर अपने विचार भी रखते हैं। किताब में भी कुछ ऐसा ही जिक्र किया गया है।

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किताब में लिखा है, “मेरा नाम जावेद अख्तर है। मेरा कोई धार्मिक विश्वास नहीं है। न ही मुझे आध्यात्मिकता में कोई आस्था है… आज इतने वर्षों बाद जब मैं अपने जीवन पर पीछे मुड़कर देखता हूं, तो ऐसा लगता है जैसे पहाड़ों से झरने की तरह बहती, चट्टानों से टकराती, पत्थरों के बीच से अपना रास्ता बनाती, कलकल करती, मुड़ती-घुमाव करती, रास्ते में कई भंवर बनाती, तेजी से बहती और कभी-कभी अपने किनारों को काटती हुई यह नदी मैदानों में आ गई है और गहरी और शांत हो गई है। तब मुझे यह ख्याल आता है कि मैंने अपनी क्षमता का एक चौथाई भी नहीं किया है। और फिर इस विचार से पैदा हुई बेचैनी मुझे छोड़ती ही नहीं।”

बता दें कि जावेद अख्तर को अक्सर मुस्लिम होने के चलते काफी ट्रोल करने की कोशिश की जाती है। मगर वो ऐसा करने वालों को लताड़ लगाने से चूकते नहीं। पिछले साल सोशल मीडिया पर उन्हें 14 अगस्त को स्वतंत्रता दिवस मनाने की सलाह दी गई थी। ये सलाह देने वाले को उन्होंने जमकर खरी खोटी सुनाई थी। पूरी खबर पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें…