डायरेक्टर: श्रीराम राघवन
कास्ट: अगस्त्य नंदा, धर्मेंद्र, जयदीप अहलावत, सिमर भाटिया
ड्यूरेशन: 143 मिनट
रेटिंग: 3.5 स्टार
राइटर: श्रीराम राघवन, अरिजीत बिस्वास, पूजा लाडा सर्टी
हिंदी सिनेमा में युद्ध पर बहुत से फिल्में बनी हैं, जिसमें कभी भारत-पाकिस्तान के साथ हुई लड़ाई को दिखाया गया, तो कभी चीन के साथ हुई लड़ाई को। इसमें ‘बॉर्डर’, ‘एलओसी’, ‘कारगिल’ और ‘शेरशाह’ जैसी कई फिल्में शामिल थी और लगभग सभी को दर्शकों ने काफी पसंद किया। इन सभी फिल्मों में अगल-अलग नायकों की कहानी निकलकर लोगों के सामने आई। अब डायरेक्टर श्रीराम राघवन भी एक ऐसी फिल्म लेकर आए हैं, जिसमें 1971 के युद्ध की कहानी दिखाई गई और उस मूवी का नाम ‘इक्कीस’ है।
‘इक्कीस’ एक ऐसी वॉर फिल्म है, जो शोर नहीं करती, बल्कि चुपचाप दिल में उतर जाती है। ‘इक्कीस’ शहादत, यादों, रिश्तों और जंग के बाद बचे खालीपन की कहानी कहती है। फिल्म हमें यह महसूस कराती है कि युद्ध सिर्फ मैदान में नहीं लड़ा जाता, बल्कि उसके निशान जिंदगी भर दिल और दिमाग में रह जाते हैं। ऐसे में अगर आप भी फिल्म देखने का प्लान बना रहे है, तो चलिए आपको इसकी कहानी, डायरेक्शन, स्टार्स का अभिनय, वीएफएक्स सभी के बारे में बताते हैं।
क्या है फिल्म ‘इक्कीस’ की कहानी?
फिल्म ‘इक्कीस’ की कहानी दो समय के बीच चलती है, जिसमें सबसे पहले दिसंबर 1971 का बसंतर युद्ध देखने को मिलता है, जहां 21 साल का अरुण खेत्रपाल (अगस्त्य नंदा) अपनी टैंक रेजिमेंट के साथ दुश्मन का सामना करते हैं। फिल्म जंग को बड़े शोर-शराबे या जोशीले नारों की तरह नहीं दिखाती, बल्कि उस डर, उलझन और अचानक आ गई जिम्मेदारी को सामने लाती है, जो एक युवा अफसर पर होती है। हर पल एक फैसला है, जो जिंदगी और देश दोनों से जुड़ा है और यही तनाव कहानी को लगातार मजबूत बनाए रखता है।
इसके बाद फिल्म का दूसरा भाग साल 2021 में चलता है, जहां भरपूर इमोशन देखने को मिलता है। इस समय में धर्मेंद्र स्क्रीन पर आते हैं, जो अरुण के पिता ब्रिगेडियर एम. एल. खेत्रपाल का किरदार निभा रहे होते हैं। वह जंग से दूर हैं, लेकिन बेटे की यादें हर पल उनके साथ रहती हैं। इसी दौरान उनकी मुलाकात ब्रिगेडियर ख़्वाजा मोहम्मद नासिर से होती है, जिसे जयदीप अहलावत ने बेहद शानदार तरीके से निभाया है।
कैसा है स्टार्स का अभिनय
स्टार्स के अभिनय की बात करें, तो अरुण खेत्रपाल के रोल में अगस्त्य नंदा बेहद शानदार और भरोसेमंद लगते हैं। वह किसी हीरो की तरह नहीं, बल्कि एक आम इंसान जैसे दिखते हैं, जो अपने फर्ज को ईमानदारी से निभाना चाहता है। जयदीप अहलावत अपने किरदार में काफी ठहरे हुए नजर आते हैं। वह ऐसे इंसान को दिखाते हैं जिसने जंग देखी है और उसकी कीमत भी समझी है। धर्मेंद्र के साथ उनके सीन फिल्म को एक अलग ही स्तर पर ले जाते हैं।
वहीं, धर्मेंद्र कम बोलते हैं, लेकिन उनकी आंखें और खामोशी बहुत कुछ कह जाती हैं, जिसमें दर्द, गर्व और बरसों से दिल में दबी यादें साफ झलकती हैं। इसके अलावा सिमर भाटिया भी कम स्क्रीन टाइम के बावजूद असर छोड़ जाती हैं। किरण के किरदार में वह उस लाइफ की झलक दिखाती हैं, जो अरुण कभी जी सकते थे।
VFX है मूवी की जान
‘इक्कीस’ में VFX का इस्तेमाल बहुत समझदारी से किया गया है। यह सिर्फ दिखाने के लिए नहीं, बल्कि सीन को असली और जानदार बनाने के लिए है। टैंक से की गई लड़ाई के सीन इतने असल लगते हैं कि जंग का डर और तनाव दर्शकों तक सीधे पहुंचता है। हर हलचल, धमाका कहानी को आगे लेकर चलता है और फिल्म में जंग का माहौल पूरी तरह महसूस होता है। इन सबके अलावा फिल्म का म्यूजिक, डायरेक्शन को काफी बेहतर तरीके से दिखाया गया है।
