इस साल की बहुचर्चित फिल्म ‘बॉर्डर 2’ कल यानी 23 जनवरी को रिलीज हो रही है। ये साल 1997 में आई ‘बॉर्डर’ का सीक्वल है, जिसे 28 साल के लंबे अंतराल के बाद रिलीज किया जा रहा है। भले ही पहले पार्ट को आए इतने साल बीत चुके हैं, लेकिन उसकी छाप लोगों के दिल पर अब तक है। ऐसे में इस दूसरे पार्ट से पहले पार्ट की तुलना होना जायज सी बात है। फिल्म के टीजर रिलीज होने से ट्रेलर तक, दर्शकों ने कुछ कमियां नजर आईं। सबसे पहली चीज जो थी वो थे इमोशन, जो ‘बॉर्डर’ की अपेक्षा काफी कम लगे। इसके साथ ही एक्टर्स को लेकर भी दर्शकों का क्रेज कम दिखा। आइये पढ़ते हैं पहले पार्ट में क्या खास था, जो दर्शक ‘बॉर्डर 2’ में देखने की उम्मीद कर रहे हैं।

‘बॉर्डर 1’ रिव्यू

13 जून, 1997 को आई ‘बॉर्डर’ इंडियन वॉर सिनेमा में एक मील का पत्थर बनी हुई है। आज भी, जब ‘बॉर्डर 2’ पर चर्चा हो रही है और लोग बेसब्री से इसका इंतजार कर रहे हैं, लेकिन तब भी इसका पहला भाग दर्शकों के दिलों में छाया हुआ है। इसके पीछे ठोस कारण हैं।

रियल इमोशन

बॉर्डर‘ की सबसे बड़ी ताकत इसमें दिखाए गए इमोशन हैं। जे.पी. दत्ता ने फिल्म में वॉर को महज एक्शन या दमदार सीन नहीं माना। इसके बजाय, उन्होंने सीमा पर जवानों के असली संघर्ष को समझा और उसे कैमरे में उतारने की पूरी कोशिश की थी। एक युवा सैनिक की आंखों में कैसा डर होता है, एक कमांडिंग ऑफिसर की चुप्पी के पीछे का साहस और घर पर इंतजार कर रहे परिवारों का दर्द, सब कुछ पार्ट 1 में बखूबी दिखाया गया।

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पहले पार्ट की तुलना में, ‘बॉर्डर 2‘ से उम्मीद की जा रही है कि यह भव्यता, तकनीक और आधुनिक युद्ध पर ज्यादा केंद्रित होने वाली है। हालांकि इससे सीन का प्रभाव बढ़ सकता है, लेकिन पहली ‘बॉर्डर’ ने दर्शकों को गहराई से प्रभावित किया। वहीं नए पार्ट के टीजर और ट्रेलर में पहले की अपेक्षा काफी बदलाव देखने को मिले।

बॉर्डर 1 की कहानी

फिल्म की कहानी राजस्थान के रेगिस्तानी इलाके में स्थित लोंगेवाला पोस्ट पर तैनात भारतीय सेना के कुछ जवानों के इर्द-गिर्द घूमती है, जो संख्या में कहीं ज्यादा दुश्मन सेना के सामने डटकर मुकाबला करते हैं। बॉर्डर केवल युद्ध की रणनीतियों तक सीमित नहीं रहती, बल्कि देशभक्ति, त्याग, डर, हिम्मत और सैनिकों व उनके परिवारों के बीच भावनात्मक रिश्तों को गहराई से दिखाती है।

स्टार कास्ट

सनी देओल ने मेजर कुलदीप सिंह चांदपुरी के किरदार में अपने करियर की सबसे यादगार परफॉर्मेंस दी थी। उनके दमदार डायलॉग और मजबूत स्क्रीन प्रेजेंस आज भी दर्शकों को याद आती है। हालांकि दूसरे पार्ट में भी उनका वो जुनून देखने को मिलने वाला है। जैकी श्रॉफ, सुनील शेट्टी, अक्षय खन्ना, सुदेश बेरी और पुनीत इस्सर जैसे कलाकारों ने भी सैनिकों के अलग-अलग पहलुओं को प्रभावशाली ढंग से पेश किया था। जवानों के साथ उनके परिवारों की कहानी ने फिल्म को और अधिक सच्चा और असरदार बनाया था।

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निर्देशन और म्यूजिक

जेपी दत्ता का निर्देशन काबिल-ए-तारीफ था। फिल्म में रातभर चलने वाला वॉर सीन उस दौर में तकनीकी रूप से काफी प्रभावशाली था। असली लोकेशन, टैंक और लड़ाकू विमानों के इस्तेमाल ने फिल्म काफी हद तक रियल बना दिया था। अनु मलिक का संगीत इस फिल्म की जान है। “संदेसे आते हैं” जैसे गाने आज भी दिल को छू जाते हैं। फिल्म के डायलॉग देशभक्ति से भरपूर हैं और सालों बाद भी लोगों की ज़ुबान पर हैं।