श्रीशचंद्र मिश्र
सत्तर करोड़ रुपए की लागत से बनी आमिर खान की फिल्म दंगल की दुनिया भर में हुई करीब 2100 करोड़ रुपए कमाई में 60 फीसद से ज्यादा योगदान चीन का रहा। हिंदी मीडियम भारतीय बॉक्स आॅफिस पर महज 70 करोड़ रुपए जुटा पाई जबकि चीन में उसने डेढ़ सौ करोड़ रुपए कमा कर दिए। अपवाद के रूप में ठग्स आफ हिंदोस्तान को छोड़ दें तो चीन में रिलीज हुई बजरंगी भाईजान, सीक्रेट सुपर स्टार, बाहुबली-2, पीके, धूम-3 आदि लगभग सभी फिल्मों ने अच्छा खासा मुनाफा कमाया है। राजनयिक तनाव की वजह से भारत-पाकिस्तान के फिल्मी रिश्ते भले ही खटाई में पड़ गए हों, चीन से फिल्मी दोस्ताना काफी तेजी से बढ़ रहा है। चीनी उत्पादों पर प्रतिबंध के अभियान के बीच तेजी से विकसित होता यह रिश्ता चौंकाने वाला जरूर है लेकिन व्यावसायिक नजरिए से देखें तो यह काफी हद तक स्वाभाविक। भारतीय फिल्म निर्माताओं को चीन में बड़ा बाजार नजर आ रहा है।
चीन में सिनेमाघरों की संख्या भारत से आठ गुना ज्यादा है और खास बात यह है कि चीन के लोगों को हिंदी फिल्में लुभा रही हैं। 2014 में आमिर खान की ‘पी के’ ने चीन में सौ करोड़ रुपए से ज्यादा का कारोबार किया था। थ्री इडियट्स, धूम-3, माईनेम इज खान, हैप्पी न्यू ईयर जैसी कुछ और फिल्में भी चीन में अच्छा कारोबार कर चुकी हैं। चीन को लगता है कि उसकी उन्नत फिल्म निर्माण की तकनीक में हॉलीवुड की फिल्मों की बजाए हिंदी फिल्में ज्यादा बेहतर हिस्सेदार बन सकती हैं। इसीलिए दोनों देशों के सहयोग से एक नया सिलसिला भी शुरू हुआ है।
भारतीय फिल्म कंपनी इरोज ने चीन की तीन फिल्म कंपनियों के साथ करार किया है जिसके तहत संयुक्त उपक्रम में फिल्में बनेंगी, एक दूसरे की फिल्मों के वितरण अधिकार खरीदे जाएंगे। भारत और चीन की फिल्म कंपनियों ने मिल कर एक फिल्म द टैंग जुएंग जैंग बना भी ली है। इसमें सोनू सूद, नेहा शर्मा, मदना करीमी और अली फजल भी हैं। आॅस्कर के लिए यह फिल्म भेजी गई। एक और फिल्म बनी कुंग फू योगा जिसमें जैकी चैन के साथ सोनू सूद, दिशा पाटनी व अमायरा दस्तूर थे। सलाम नमस्ते निर्देशित कर चुके सिद्धार्थ आनंद लव इन बेजिंग की योजना बना रहे हैं। चीन में पिछले कुछ दशकों में फिल्म निर्माण काफी विकसित हुआ है। कुल स्क्रीन की संख्या अमेरिका से टक्कर ले रही है। बुनियादी सुविधाएं तो सबसे बेहतरीन हैं। इसके बावजूद वहां फिल्मी संभावनाएं तलाशने की कोशिश नहीं हुई तो शायद दोनों देशों के बीच रिश्तों में उतार-चढ़ाव या भाषा की भिन्नता को लेकर।
चीन की पृष्ठभूमि में कुछ फिल्में जरूर बनी हैं। इनमें ज्यादातर में चीन को दुश्मन के रूप में चित्रित किया गया। चेतन आनंद की हकीकत तो 1962 के भारत-चीन युद्ध पर केंद्रित थी और उसमें चीन का आक्रांता रूप दिखाया गया था। 1946 में वी शांताराम ने एक सच्ची घटना पर बनाई फिल्म डॉक्टर कोटनीस की अमर कहानी में चीन से रिश्तों को सकारात्मक पहलू दिया था। 1938 में घायल चीनी सैनिकों का इलाज करने डॉक्टर कोटनीस वहां गए थे और चीनी लड़की से शादी कर वहीं बस गए थे। आजादी के बाद शतरंज, धरती, ललकार आदि कुछ फिल्मों में चीन का संदर्भ आया लेकिन उन सभी में नायक के पराक्रम को उभारने के लिए चीनी सैनिकों को खलनायक के रूप में दिखाया गया।
कुछ साल पहले चांदनी चौक टू चाइना में चीन का एक अलग रूप जरूर दिखा लेकिन वह फंतासी से जुड़ा रहा। इस फिल्म ने चीन के कलाकारों को लेकर एक नई पहल जरूर की। अब यह सिलसिला बढ़ रहा है। सलमान खान की फिल्म ट्यूबलाइट में चीनी अभिनेत्री झू झू दिखीं। चीन की फिल्मों में भारतीय कलाकारों की उपस्थिति जैकी चैन की फिल्म द मिथ में मल्लिका सहरावत के रूप में हुई। उनकी भूमिका हालांकि छोटी थी। कुंग फू योगा और द टैंग जुएंग जैंग में भारतीय कलाकारों को ज्यादा प्रमुखता मिली है। इन फिल्मों की काफी शूटिंग भारत में हुई। ट्यूबलाइट की तरह चीन दिखाने के लिए लद्दाख का सहारा नहीं लेना होगा। चीन का व्यापक फिल्म बाजार तो मिल ही रहा है। लेकिन इसके लिए हिंदी फिल्मों को स्तर और गुणवत्ता पर ध्यान देना होगा।
चीन की फिल्म नीति काफी सख्त है। वहां एक साल में 34 विदेशी फिल्में ही दिखाई जा सकती हैं। हिंदी फिल्मों के लिए यह सीमा अधिकतम पांच की है। यानी एक साल में हिंदी की पांच फिल्मों के लिए ही चीन का बाजार उपलब्ध है। यह सीमा बढ़ सकती है। फिलहाल भारत और चीन की फिल्म कंपनियों का साझेदारी में फिल्म बनाना कितना सफल हो पाता है, उसी से फिल्मों में हिंदी-चीन भाईबंदी का भविष्य तय होगा।
