Bhangra Paa Le movie review
कलाकार-सनी कौशल, रुखसार ढिल्लीं, श्रिया पिलगांवकर
रेटिंग: डेढ़
इस फिल्म का असल मकसद तो है हिंदी फिल्मों के चर्चित निर्माता रमेश तौरानी की बेटी स्नेहा तौरानी की फिल्मी करिअॅर की शुरुआत। वही इस फिल्म की निर्देशक हैं। लगे हाथ हाल में चर्चित हुए और स्टार की हैसियत पा चुके विकी कौशल के भाई सनी कौशल को भी बतौर हीरो मौका मिल गया है। हालांकि, सनी पहले भी फिल्मों में आ चुके हैं। पहले ‘सनसाइंस म्यूजिक टूर एंड ट्रेवेल्स’ में और फिर और अक्षय कुमार की ‘गोल्ड’ में। हालांकि ‘गोल्ड’ में उनकी बड़ी तो नहीं लेकिन ठीक-ठीक भूमिका थी। लेकिन जब एक भाई हीरो बन जाए तो दूसरे को भी लगने लगता है कि मैं भी क्यों नहीं? सो सनी को भी ‘हीरोगीरी’ का मौका मिल गया है। अब रही फिल्म की हीरोइन रुखसार ढिल्लों। तो उनकी भी यह पहली फिल्म है। जब इतने सारे नए लोग हों तो फिल्म को सफल बनाने के लिए कोई लोकप्रिय चीज चाहिए न। आखिर बिल्कुल नादान से लोगों को रखने में यह खतरा तो बना रहता है कि फिल्म शायद न हिट हो। इसलिए पंजाब और पंजाबियों में लोकप्रिय भांगड़ा स्टाइल के डांस ओर म्युजिक का भरपूर इस्तेमाल किया गया है ताकि और न सही पंजाबी तो सिनेमा हाल में आ ही जाएं। अब देखना यह है कि क्या यह नुस्खा सफल होगा? पंजाबियों को सिनेमा हाल में लाने का।
इस फिल्म की सबसे कमजोर कड़ी है कहानी जो दो कालखंडों में लिपटी हुई और जिसे बताना भी दर्शक को उलझाना है। बहरहाल समझ लीजिए कि पहले 1944 में और दूसरी आज के जमाने- दोनों ही वक्तों में लिपटी इस कहानी को निपटाने के लिए सनी कौशल को भी दो भूमिकाएं में रखा है। एक कप्तान सिंह की और दूसरी जग्गी की। कप्तान सिंह वाली कहानी छोटी है और जग्गी वाली बड़ी। एक खांटी एक पंजाबी पुत्तर है जग्गी, जो भांगड़ा का दीवाना है। इतना दीवाना है कि भांगड़ा का डंका लंदन में भी बजाना चाहता है। फिर उसके सामने है सिम्मी जो पंजाबी कुड़ी है। वह भी भांगड़ा की दीवानी है। पर दोनों के भांगड़ा स्टाइल अलग-अलग हैं।
एक में देसी खांटीपन और दूसरे में पश्चिमी तौर-तरीके हैं। दोनों एक दूसरे के प्रतियोगी यानी कंपटीटर हैं। यह आगे चल कर दोनों के बीच होने वाले इश्क की भूमिका है क्योंकि बॉलीवुड में एक दूसरे के कंपटीटर छोरा-छोरी अक्सर आगे चल प्रेमी हो जाते हैं। और यही तरीका है भांगड़ा की भिन्न शैलियों को पेश करने का। लेकिन दिक्कत यह है कि जरूरत से अधिक गाने डाल दिए जाने के कारण फिल्म म्युजिक टीवी शो की तरह लगती है। अगर फिल्म की कहानी को थोड़ा चुस्त रखा जाता और पटकथा को भी, तो इसमें जान आ जाती ।
बहरहाल नए साल के मौके पर आई इस फिल्म में रुखसार ढिल्लों के कारण एक ताजगी जरूर है। और सनी कौशल ने यह दिखाया है कि बंदे ने मेहनत तो दम लगा के की है। लेकिन जिस संगीत पक्ष पर अधिक ध्यान दिया गया है वह भी दमदार है। कोई भी गाना याद रखनेलायक नहीं है। फिल्म में कुछ जगहों पर हास्य जरूर है और जहां जहां यह है वहां वहां दर्शक कुछ देर के लिए ही सही, सुकून का अहसास होता है।
