पश्चिम बंगाल में कथित रोज वैली चिटफंड घोटाले में तृणमूल कांग्रेस के सांसद और लोकसभा में पार्टी के नेता सुदीप बंदोपाध्याय की गिरफ्तारी ने सियासी रंग ले लिया है। इस मामले में एक हफ्ते की भीतर यह पार्टी के दूसरे बड़े नेता की गिरफ्तारी है। इससे नाराज पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने केंद्र सरकार पर बदले की भावना से काम करने का आरोप लगाया है। इसमें आम आदमी पार्टी के संयोजक अरविंद केजरीवाल ने भी ममता बनर्जी का साथ दिया है। उधर सुदीप बंदोपाध्याय की गिरफ्तारी के बाद तृणमूल कांग्रेस के कार्यकर्ताओं ने कोलकाता में भारतीय जनता पार्टी के कार्यालय पर हमला कर अपनी नाराजगी जाहिर की। सीबीआइ का कहना है कि उसके पास तृणमूल कांग्रेस के दोनों नेताओं के खिलाफ पर्याप्त सबूत हैं। फिर तृणमूल कांग्रेस का यह कहना कि जिन नेताओं ने नोटबंदी का विरोध किया, मोदी सरकार उन्हें सबक सिखाने की मंशा से ऐसा कदम उठा रही है, कुछ तर्कसंगत नहीं जान पड़ता।
पश्चिम बंगाल में चिटफंड कंपनियों की धोखाधड़ी पिछले कई दशक से चल रही थी। सारदा घोटाले में भी कई नेताओं पर आरोप लगे थे। उसमें भी तृणमूल के कुछ नेताओं पर अंगुली उठी थी। इन चिटफंड कंपनियों के खिलाफ सर्वोच्च न्यायालय में मामला लंबित है। रोज वैली चिटफंड में करीब सत्रह हजार करोड़ रुपए के घोटाले की जांच सीबीआइ उसी के तहत कर रही है। यह समझना मुश्किल नहीं है कि जब चिटफंड कंपनियों के जरिए लघु निवेश पर रोक है, तो ये कंपनियां किसकी शह पर चल रही थीं। रोज वैली अकेली ऐसी कंपनी नहीं है, जिस पर गरीब लोगों के पैसे की धोखाधड़ी का मामला दर्ज है। सहारा समूह के मुखिया को भी ऐसे ही घोटाले के आरोप में जेल की सजा सुनाई गई थी। पश्चिम बंगाल में ही सारदा घोटाले से जुड़े कई लोगों पर कानून का शिकंजा कसा। फिर अगर सीबीआइ ने तृणमूल के कुछ नेताओं को इसमें शामिल पाया है या इन कंपनियों को शह देने में उनका हाथ देखा है, तो इस जांच को राजनीतिक रंग देने के बजाय निष्पक्ष रूप से पूरा हो जाने देने में किसी को क्यों परहेज होना चाहिए!
हालांकि केंद्र सरकार पर जिस तरह कुछ मामलों को लेकर सीबीआइ के दुरुपयोग के आरोप लगे हैं, उससे सीबीआइ की प्रतिष्ठा पर भी आंच आती है। पहले भी अनेक मौकों पर आरोप लगते रहे हैं कि सीबीआइ केंद्र सरकार के इशारे पर काम करती है। इसलिए रोज वैली चिटफंड मामले में उससे अपनी प्रतिष्ठा का खयाल रखते हुए जांच को आगे बढ़ाने की उम्मीद की जाती है। चिटफंड कंपनियों ने गरीबों की मेहनत की छोटी-छोटी कमाई से अपनी जेबें भरी हैं। छिपी बात नहीं है कि बगैर राजनीतिक शह के ये कंपनियां अपना धंधा नहीं फैला सकतीं। ऐसे मामलों में केवल सत्तारूढ़ दल नहीं, दूसरी पार्टियों के लोगों की भी संलिप्तता होती है। इसलिए केवल तृणमूल कांग्रेस के लोगों के खिलाफ कड़े कदम उठाए जाएंगे, तो वहां से स्वाभाविक रूप से अंगुलियां उठेंगी। ऐसे में सीबीआइ को लाखों धोखा खाए लोगों के हक में खड़ा दिखना चाहिए। हैरानी की बात है कि अनियमितताएं दूर करने की बात हर राजनीतिक दल करता है, पर जब किसी का कोई नेता ऐसे आरोप में पकड़ा जाता है तो वह जांच एजेंसी के कामकाज पर अंगुली उठाने लगता है। अगर तृणमूल के नेता वाकई निर्दोष हैं, तो उन्हें यह बात अदालत में साबित करने से क्यों परहेज होना चाहिए।

