पहले मैदानी इलाकों में लोगों ने पर्यावरण की कोई परवाह नहीं की जिसका नतीजा यह हुआ कि आज प्रदूषण एक ऐसी चुनौती बन कर सामने खड़ा हो चुका है, जिससे निपटना मुश्किल हो रहा है। लोग इन इलाकों के प्रदूषण से कुछ दिनों की राहत के लिए पहाड़ी इलाकों के स्वस्थ और स्वच्छ माने जाने वाले स्थलों का रुख करते हैं। बहुत सारे लोग पहाड़ों पर स्थित धार्मिक स्थलों पर भी जाते हैं। लेकिन वहां जाने के लिए कुछ ऊंची आर्थिक हैसियत वाले लोगों ने जिस तरह हेलीकॉप्टरों का इस्तेमाल करना शुरू कर दिया है, उससे स्थानीय पर्यावरण और जीव-जंतुओं के सहज जीवन पर बुरा असर पड़ा है। दरअसल, जून 2013 में केदारनाथ में आई भयावह बाढ़ और उसमें बड़ी तादाद में लोगों के मारे जाने के बाद सुरक्षा के मद्देनजर लोगों ने वहां जाने के लिए हेलीकॉप्टरों की सेवा लेनी शुरू कर दी। लेकिन आज यही वहां की पारिस्थितिकी के लिए बड़ी समस्या बन रही है। यही स्थिति वैष्णो देवी, अमरनाथ जैसे पहाड़ी धार्मिक स्थलों पर भी है, जहां हेलीकॉप्टरों से आवाजाही की व्यवस्था है।
यही वजह है कि एनजीटी यानी राष्ट्रीय हरित न्यायाधिकरण ने उत्तराखंड के केदारनाथ मंदिर जाने के लिए मुहैया कराए जाने वाले हेलीकॉप्टरों की सेवा पर सवाल उठाया है। एनजीटी ने पर्यावरण एवं वन मंत्रालय, उत्तराखंड सरकार और राष्ट्रीय वन्यजीव बोर्ड और अन्य को उस अर्जी पर नोटिस जारी किया, जिसमें राज्य के पारिस्थितिकीय रूप से संवेदनशील क्षेत्रों में हेलीकॉप्टरों की नियमित आवाजाही के कारण वहां मौजूद जीव-जंतुओं और वनस्पतियों पर मंडराते खतरे को लेकर चिंता जाहिर की गई है। एनजीटी ने 2015 में ही एक आदेश में कहा था कि संवेदी क्षेत्र में हेलीकॉप्टर की ऊंचाई, ध्वनि का स्तर और अन्य चीजों पर गौर करने के बाद राज्य सरकार इस मसले पर अपनी एक नीति बनाए। केदारघाटी क्षेत्र में हेलीकॉप्टरों की उड़ान के लिए लगातार दो हजार फीट की ऊंचाई और ध्वनि का स्तर अधिकतम पचास डेसिबल निर्धारित किया गया है। लेकिन इन मानकों के साथ उस इलाके में आने वाली बाधा की वजह से नागर विमानन महानिदेशालय ने केदारनाथ हेलीकॉप्टर सेवा की अनुमति नहीं दी थी।
गौरतलब है कि हाल ही में भारतीय वन्यजीव इंस्टीट्यूट की एक रिपोर्ट के हवाले से यह खबर आई थी कि इस इलाके में कम ऊंचाई पर उड़ने वाले हेलीकॉप्टर किस तरह केदारनाथ वन्यजीव अभयारण्य के जीवों पर नकारात्मक असर डाल रहे हैं। इस अभयारण्य में बांस, चीड़, देवदार, अल्पाइन जैसे पेड़ों वाले घने जंगल हैं और वहां कस्तूरी हिरण और हिमालयी तहर, जंगली बकरी जैसी लुप्त होने के कगार पर खड़ी प्रजातियां रहती हैं। अक्सर वहां जाने वाले हेलीकॉप्टरों का शोर इनके अस्तित्व के सामने एक बड़ी परेशानी बन चुका है। हालांकि इस समस्या के मद्देनजर तात्कालिक उपाय के तौर पर हेलीपैड की जगह बदलने का सुझाव दिया गया था। लेकिन देश के दूसरे इलाकों की तरह वहां भी इस तरह की चिंता पर गौर करना जरूरी नहीं समझा गया। यह ध्यान रखने की जरूरत है कि उत्तराखंड में पारिस्थितिकी को बुरी तरह प्रभावित करने वाली मानवीय गतिविधियों को केदारनाथ में आई बाढ़ से हुई तबाही का एक बड़ा कारण माना गया था। अगर भविष्य में उस तरह के व्यापक विनाश की संभावना को कम करना है या उससे बचना है तो अभी से स्थानीय पारिस्थितिकी पर नकारात्मक असर डालने वाली छोटी-छोटी बातों का खयाल रखना होगा।
