अब मणिपुर में जारी नाकेबंदी को बावन दिन हो गए हैं। राज्य में इस नाकेबंदी ने चौतरफा संकट पैदा किया है। लोगों को रोजाना हो रही तकलीफों का कोई अंत नहीं है। मौजूदा हालात से राजनीतिक समीकरण बनने-बिगड़ने के संकेत भी दिखने लगे हैं। नाकेबंदी समाप्त करने में केंद्र की निष्क्रियता के विरोध में राज्य के भाजपा के दो विधायकों में से एक, खुमुकचाम जायकिशन ने बुधवार को पार्टी से इस्तीफा दे दिया। जायकिशन हाल में एक उपचुनाव में चुने गए थे, और उनकी जीत को पूर्वोत्तर के इस राज्य में भाजपा की बढ़ती पैठ का संकेत माना गया था। उनके इस्तीफे से बेशक पार्टी को झटका लगा है। क्या पता, वे जो कह रहे हैं, उनकी नाराजगी की वजह वही थी, या कुछ और। लेकिन यह बात काफी हद तक सही है कि मणिपुर के मौजूदा हालात को लेकर केंद्र ने अब तक अपेक्षित गंभीरता नहीं दिखाई है। यह सही है कि राज्य के मुख्यमंत्री ओकराम इबोबी सिंह के आग्रह पर केंद्र ने सीआरपीएफ के चार हजार जवानों को मणिपुर में तैनात किया है, ढाई हजार जवान पिछले हफ्ते भेजे गए थे, और डेढ़ हजार तीन दिन पहले। लेकिन स्थिति को सामान्य बनाने के लिए कोई और कदम उठाना अब तक केंद्र को जाने क्यों जरूरी नहीं लगा है?
गौरतलब है कि यूएनसी यानी यूनाइटेड नगा काउंसिल ने मणिपुर सरकार के एक फैसले के विरोध में दो राजमार्गों- एनएच-2 (इंफल-दीमापुर) और एनएच-37 (इंफल-जिरिबाम)- पर डेढ़ महीने से भी ज्यादा समय से आवाजाही रोक रखी है। विडंबना यह है कि यूएनसी ने ही अब राज्य में राष्ट्रपति शासन लगाने की मांग की है! ये दोनों राजमार्ग, जो कि बाहरी दुनिया से मणिपुर को जोड़ते हैं, राज्य की जीवनरेखा कहे जाते हैं। इन पर आवाजाही ठप रहने से राज्य को आवश्यक वस्तुओं की आपूर्ति बुरी तरह प्रभावित हुई है। खाद्य पदार्थों से लेकर र्इंधन तक, रोजमर्रा की जरूरत की सारी चीजें मुहाल हो गई हैं। कहीं मिलती भी हैं तो बहुत महंगे दाम पर। कालाबाजारियों की बन आई है। नोटबंदी का दंश तो पूरे देश के लोग महसूस कर रहे हैं, पर मणिपुर में समस्या केवल नगदी की नहीं है, उससे ज्यादा रोजमर्रा की चीजों के दुष्प्राप्य होने की है। राज्य के नौ में से सात जिलों को विभाजित कर सात नए जिले बनाने का इबोबी सिंह सरकार का फैसला एक पुरानी मांग की मंजूरी है; यह उन लोगों को रास आया है जो इन जिलों के तहत आएंगे। मगर यूनाइटेड नगा काउंसिल का कहना है कि यह फैसला नगा बहुल इलाकों की जनसांख्यिकी को बदलने की तरकीब है, जो कि विधानसभा चुनाव के मद््देनजर तजवीज की गई है।
यों मणिुपर के लिए नाकाबंदी कोई नया अनुभव नहीं है। अपनी किसी मांग की खातिर दबाव बनाने के एक हथियार की तरह इसका इस्तेमाल कई बार हो चुका है। वर्ष 2011 में तो कुकी संगठनों की तरफ से हुई नाकाबंदी सौ दिन से ज्यादा चली थी, और बदले में फिर नगाओं ने भी वैसा ही किया था। दबाव डालने के ऐसे हथकंडों से किसी समस्या का हल तो कभी नहीं निकला है न निकल सकता है, उलटे राज्य में तरह-तरह का ध्रुवीकरण जरूर होता रहा है। राज्य के मुख्यमंत्री इबोबी सिंह ने हालात सामान्य बनाने में केंद्र से मदद का अनुरोध किया है, यह याद दिलाते हुए कि यूएनसी आखिरकार एनएससीएन (इसाक-मुइवा) के निर्देश या इशारे पर चलता है, जिसके साथ केंद्र की वार्ता चलती रही है। यह दलील अपने में पर्याप्त हो या नहीं, सभी पक्षों से बातचीत कर हालात सामान्य बनाने का रास्ता निकालना केंद्र का फर्ज जरूर बनता है।

