रक्तदान को लेकर आज सबसे बड़ी समस्या यह है कि इसके लिए कोई एकीकृत व्यवस्था नहीं है। कहने को तो कई ब्लड बैंक हैं लेकिन इनके परिचालन में आपसी तालमेल नहीं है। रक्तदान करने वालों को कार्ड तो मिलता है लेकिन मौके पर अगर वे खून लेना चाहें तो इसकी प्रक्रिया आसान नहीं है। दरअसल, रक्तदान को दान के अलावा बचत से भी जोड़ने की जरूरत है।
आज जरूरत इस बात की है कि एक ऐसी राष्ट्रीय नीति बने जिसमें रक्तदान से जुड़े विभिन्न पहलुओं को शामिल किया जाए और इससे संबंधित समस्याओं के समाधान का रास्ता तलाशा जाए। इस दिशा में सबसे जरूरी है कि एक ऐसी व्यवस्था कायम हो जिसमें रक्तदान करने वाले को यह भरोसा हो कि वह सिर्फ रक्तदान नहीं कर रहा बल्कि अपने अच्छे दिनों में अपने बुरे दिनों के लिए रक्त की बचत कर रहा है। ऐसी एकीकृत व्यवस्था कायम हो जिसके तहत अगर कोई रक्तदान करता हो तो उसे एक कार्ड मिले और मौके पर वह देश के किसी भी हिस्से में उसका इस्तेमाल कर सके।
अगर रक्तदान को दान के साथ-साथ बचत से भी जोड़ा गया तो इसके काफी सकारात्मक परिणाम आएंगे।
अभी रक्तदान को लेकर एक भ्रांति यह भी है कि रक्तदान शिविरों में जमा होने वाला खून पैसे लेकर बेच दिया जाता है। लेकिन अगर रक्तदान को बचत से जोड़ा गया तो इस भ्रांति से भी मुक्ति मिलेगी और बहुत सारे लोगों में रक्तदान को लेकर जो संदेह है, वह दूर हो पाएगा।
भारत जैसे विशाल देश में जिस पैमाने पर रक्त की जरूरत है, उसके मुकाबले काफी कम रक्त उपलब्ध है। हर साल चार करोड़ यूनिट खून की जरूरत होती है, लेकिन उपलब्धता चालीस लाख यूनिट की ही है। इसका मतलब यह हुआ कि जितने रक्त की जरूरत है, उसका दस फीसद ही उपलब्ध है। जाहिर है कि इस वजह से बहुत सारे लोगों को जान से हाथ धोना पड़ रहा है। रक्तदान के महत्त्व को इस बात से भी समझा जा सकता है कि इसे किसी कारखाने में नहीं बनाया जा सकता और न ही इसे किसी खेत में पैदा किया जा सकता है। यह मानव शरीर के अलावा कहीं और तैयार किया नहीं हो सकता।
ऐसे में अगर किसी की जान खतरे में है और उसे खून चाहिए तो चाहे वह कितना भी अमीर हो और चाहे वह कितना भी पैसा खर्च करना चाहे, उसे कोई भी खून बनाकर नहीं दे सकता। उसे रक्तदान का ही सहारा लेना होगा। एक अनुमान यह है कि देश में हर रोज 38,000 लोगों को रक्त की जरूरत होती है। इन दिनों डेंगू से बेहाल होने वालों की संख्या तेजी से बढ़ रही है। जो लोग डेंगू के शिकार होते हैं, उनमें से अधिकांश को इलाज के दौरान खून की जरूरत पड़ती है। लेकिन कई बार ऐसा होता है कि मरीजों को खून देने के नाम पर लोग आनाकानी करते हैं। कई तरह की भ्रांतियों की वजह से लोग रक्तदान से कतराते हैं। इसका नुकसान यह होता है कि कई मरीजों को अपनी जान गवांनी पड़ती है तो कई मरीजों के ठीक होने में अधिक वक्त लगता है।
रक्तदान को लेकर देश में पिछले कुछ सालों में कुछ कोशिशें हुई हैं। इनमें सरकारी स्तर पर होने वाले प्रयासों के मुकाबले गैरसरकारी क्षेत्रों में हुए प्रयास अधिक हैं। लेकिन अब भी रक्तदान को लेकर आम लोगों में कई तरह की भ्रांतियां हैं और जिस स्तर की जागरूकता होनी चाहिए, उसका अभाव है। इस वजह से रक्तदान को लेकर जागरूकता फैला रहे लोगों के लिए काम करना मुश्किल हो जाता है।
रक्तदान के महत्त्व को लेकर जितना भी कहा जाए, वह कम ही है। रक्तदान से आज कई लोगों की जिंदगी बचाई जा रही है। कुछ खास तरह की बीमारियों में खून की जरूरत अपेक्षाकृत अधिक होती है। सिकल सेल बीमारी से जूझ रहे मरीज को जिंदगी भर खून की जरूरत होती है। कैंसर के मरीजों की संख्या दिनोंदिन बढ़ती जा रही है। अलग-अलग तरह के कैंसर में खून की जरूरत अलग-अलग होती है। कुछ कैंसर मरीज ऐसे होते हैं, जिन्हें हर रोज खून की जरूरत होती है। वहीं कैंसर इलाज के दौरान होने वाली कीमोथैरेपी की प्रक्रिया में भी खून की जरूरत होती है। सड़क दुर्घटना या अन्य दुर्घटनाओं में घायल होने वाले लोगों को भी तुरंत खून की जरूरत होती है। इसके अलावा सैंकड़ों और बीमारियां हैं जिनमें खून की जरूरत किसी न किसी स्तर पर जरूर होती है। ऐसे में रक्तदान कितना जरूरी है, इसका अंदाजा सहज ही लगाया जा सकता है।
विश्व स्वास्थ्य संगठन का अध्ययन बताता है कि भारत में हर साल 23.4 करोड़ बड़े आॅपरेशन होते हैं। 6.3 करोड़ ट्रॉमा से संबंधित आॅपरेशन हो रहे हैं। 3.1 करोड़ आॅपरेशन कैंसर के हो रहे हैं। इन सभी में खून की जरूरत होती है। विश्व स्वास्थ्य संगठन की मानें तो देश में हर साल एक करोड़ ऐसे मामले भी सामने आ रहे हैं जिनमें बच्चा पैदा करने के दौरान मां को खून की जरूरत पड़ जा रही है। ऐसी स्थिति में अगर तुरंत खून नहीं मिले तो संबंधित मरीज की जान भी जा सकती है। ये आंकड़े बता रहे हैं कि रक्तदान कितना जरूरी है और इससे कितने लोगों की जान बचाई जा सकती है।
अब भी रक्तदान को लेकर कई स्तर पर कई तरह की भ्रांतियां हैं। कई लोग अब भी रक्तदान से डरते हैं। उन्हें लगता है कि अगर वे रक्तदान कर देंगे तो वे कमजोर हो जाएंगे और उन्हें बीमारियां हो जाएंगी। कुछ लोगों को यह डर लगता है कि कहीं रक्तदान करने की प्रक्रिया में उन्हें कोई बीमारी न हो जाए। दरअसल, आज जरूरत इस बात की है कि तथ्यों के साथ इस दिशा में जागरूकता अभियान चलाया जाए और लोगों को यह समझाया जाए कि रक्तदान से कोई समस्या नहीं होती।
जिस तरह की भ्रांतियां रक्तदान को लेकर हैं, तथ्य उसके उलट हैं। रक्तदान की अपनी एक प्रक्रिया है। ऐसा नहीं है कि कोई भी जाए और कहे कि मुझे रक्तदान करना है तो उसके शरीर से खून निकाल लिया जाएगा। रक्तदान की इच्छा रखने वाले व्यक्ति के मेडिकल रिकॉर्ड के बारे में जानकारी हासिल की जाती है। इसके बाद उसके शरीर की कुछ बुनियादी जांच होती है। अगर सब कुछ सही हो तब जाकर उसके शरीर से खून निकाला जाता है। एक आम स्वस्थ्य आदमी हर 56 दिन में रक्तदान कर सकता है। इससे उसके शरीर के काम करने की प्रक्रिया पर कोई नकारात्मक असर नहीं पड़ता। बल्कि डॉक्टरों का तो यह भी मानना है कि अगर कोई नियमित तौर पर रक्तदान करता हो तो उसके स्वास्थ्य पर नकारात्मक असर की बात तो दूर बल्कि इसका उसके स्वास्थ्य पर सकारात्मक असर ही पड़ता है। यहां यह जानना जरूरी है कि एक स्वस्थ्य आदमी के शरीर में उसके वजन के सात फीसद के बराबर खून होता है।
रक्तदान के बारे में एक और महत्त्वपूर्ण बात यह है कि रक्तदान करने वाले की जांच रक्तदान से पहले करके ही काम खत्म नहीं हो जाता बल्कि जो खून रक्तदान में मिलता है उसकी फिर से जांच होती है और यह पता लगाया जाता है कि रक्तदान करने वाला व्यक्ति किसी गंभीर बीमारी से पीड़ित तो नहीं है या फिर उसके रक्त में कोई ऐसी चीज तो नहीं है जिससे कोई और बीमारी फैले। अगर रक्तदान में आए खून में ऐसी कोई समस्या निकलती है तो वह खून किसी और को नहीं चढ़ाया जाता। इसलिए यहां यह समझने की जरूरत है कि रक्तदान से लेकर किसी जरूरतमंद को खून चढ़ाने तक की पूरी प्रक्रिया में सुरक्षा का पूरा ध्यान रखा जाता है इसलिए इसे लेकर किसी तरह के संदेह में रहना ठीक नहीं है।
डॉक्टरों का कहना है कि एक व्यक्ति अगर एक बार रक्तदान करता है तो उससे जो रक्त मिलता है उससे अधिकतम तीन लोगों की जान बचाई जा सकती है। यानी मौके पर वह तीन लोगों के काम आ सकती है। एक चिकित्सीय अध्ययन में यह अनुमान लगाया गया है कि अगर कोई व्यक्ति हर तीन महीने पर रक्तदान करता है और अगर वह यह काम अठारह साल की उम्र में शुरू करता है तो जब तक वह साठ साल का होगा तब तक वह पांच सौ लोगों की जिंदगी बचा चुका होगा। ये आंकड़े इस बात को साफ कर रहे हैं कि रक्तदान का महत्त्व कितना अधिक है। जो भी नौजवान रक्तदान कर सकते हैं, अगर वे रक्तदान को लेकर जागरूक हो जाएं तो एक झटके में रक्त की कमी से जान गवांने वाले लोगों की संख्या काफी कम हो जाएगी।
अभी स्थिति यह है कि देश में जितने लोग रक्तदान कर सकते हैं उसका सिर्फ एक फीसद लोग ही रक्तदान कर रहे हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन की एक हालिया रिपोर्ट में बताया गया है कि अभी जितने लोग भारत में रक्तदान कर रहे हैं अगर उसमें देश की सिर्फ दो फीसद आबादी जुड़ जाए तो यहां खून की कमी से होने वाली मौतों की समस्या से मुक्ति मिल जाएगी। यह आंकड़ों के लिहाज से कोई बड़ा काम नहीं लगता है लेकिन जमीनी स्तर पर इसके लिए काफी मेहनत करने की जरूरत होगी। रक्तदान के साथ समस्या यह है कि दान किए गए रक्त को पांच से छह सप्ताह तक ही सुरक्षित रखा जा सकता है। इसलिए ऐसा नहीं होता कि अगर एक बार रक्त संग्रह बन जाए तो उसे चाहे कितने भी समय तक रखा जाए। इस समस्या का समाधान तब ही हो सकता है जब नियमित तौर पर लोग रक्तदान करें।
रक्तदान को लेकर जिस स्तर पर जागरूकता के प्रसार की जरूरत है, वह अब तक पूरी नहीं हो पाई है। रक्तदान शिविर तो कई लगते रहते हैं लेकिन इसके प्रति लोगों को जागरूक करने के प्रयास हर स्तर पर होने चाहिए। इसमें भी सबसे अधिक जरूरत इस बात की है कि इससे युवा वर्ग को किसी तरह जोड़ा जाना चाहिए। इसके लिए वैसे लोगों का इस्तेमाल किया जा सकता है जिनका युवाओं पर प्रभाव हो। ०
