बुधवार को तड़के एनएससीएन यानी नेशनल सोशलिस्ट काउंसिल आॅफ नगालिम के खापलांग गुट के उग्रवादियों के खिलाफ हुई सेना की बड़ी कार्रवाई ने एक बार फिर यह रेखांकित किया है कि पूर्वोत्तर में उग्रवाद की समस्या को हल्के में नहीं लिया जा सकता। ताजा कार्रवाई म्यांमा सीमा के नजदीक हुई और इसमें कई उग्रवादी मारे गए। यों उग्रवादी गुट का दावा है कि सेना के तीन जवान भी मारे गए, पर सेना ने इससे साफ इनकार किया है। भारत-म्यांमा सीमा से कोई पंद्रह किलोमीटर दूर लंगखू गांव के पास भारतीय सैनिकों पर उग्रवादियों के हमले के बाद सेना ने यह कार्रवाई की। इससे पहले, जून 2015 में खापलांग गुट के उग्रवादियों के खिलाफ सेना ने बड़ी कार्रवाई की थी। तब भी यह पलटवार की तरह था। पहले उग्रवादियों ने मणिपुर के चंदेल जिले में घात लगा कर बीएसएफ के काफिले पर हमला बोला था, जिसमें अठारह जवान शहीद हो गए थे। इस घटना ने पूर्वोत्तर में उग्रवाद की भयावहता की तरफ पूरे देश का ध्यान खींचा था। तब के क्षोभ और आवेश भरे माहौल में सेना ने म्यांमा की सीमा में कुछ किलोमीटर भीतर जाकर नगा उग्रवादियों पर धावा बोला, जिसमें काफी संख्या में उग्रवादी मारे गए थे। इसे ‘सर्जिकल स्ट्राइक’ भी कहा गया। मगर ताजा कार्रवाई के बारे में सेना ने खुद कहा है कि यह सर्जिकल स्ट्राइक नहीं थी, क्योंकि कार्रवाई भारतीय सीमा के भीतर ही हुई।

पिछली बार यानी जून 2015 में नगा उग्रवादियों के खिलाफ सैन्य कार्रवाई के लिए अपनी सीमा के उल्लंघन का म्यांमा ने बुरा माना था और इसका इजहार भी किया था। शायद यही वजह होगी कि इस बार उस हद तक जाने से बचा गया या वैसा कोई दावा नहीं किया गया। एनएससीएन के खापलांग गुट की गिनती पूर्वोत्तर के सबसे खतरनाक हथियारबंद गुटों में होती रही है। 1980 में एनएससीएन के गठन के कुछ साल बाद, टी मुइवा और इसाक चिसी स्वू से अनबन के चलते खापलांग इससे अलग हो गए और उन्होंने अपना अलग गुट एनएससीएन (खापलांग) बना लिया। वर्ष 1997 में केंद्र के साथ शांति वार्ता में दोनों गुट शामिल हुए। इसाक-मुइवा गुट के संघर्ष विराम समझौते पर हस्ताक्षर करने के चार साल बाद खापलांग गुट ने भी इस तरह का समझौता स्वीकार कर लिया। पर मार्च 2015 में खापलांग गुट ने शांति समझौते को धता बता कर ‘आजादी के लिए युद्ध’ की घोषणा कर दी। इसी के कुछ दिनों बाद उसने मणिपुर में बीएसएफ के काफिले को निशाना बनाया था। अगस्त 2015 में केंद्र ने जहां इसाक-मुइवा गुट के साथ समाधान की रूपरेखा तलाशने का करार किया, वहीं इसके एक महीने बाद खापलांग गुट को पांच साल के लिए प्रतिबंधित संगठन घोषित कर दिया।

खापलांग गुट खुद तो एक खतरनाक संगठन है ही, इसने पूर्वोत्तर के अन्य उग्रवादी संगठनों को भी यूएनएलएफडब्ल्यू यानी यूनाइटेड लिबरेशन फ्रंट आॅफ वेस्टर्न साउथ ईस्ट एशिया नाम से एक करने में अहम भूमिका निभाई, जिसमें उल्फा का शांतिवार्ता-विरोधी गुट भी शामिल है। इस साल जून में सतहत्तर साल की उम्र में खापलांग की मौत हो गई। अब प्रतिबंधित संगठन एनएससीएन (खापलांग) की कमान खागो कोन्याक के हाथ में है। खापलांग ने भारत सरकार के साथ चौदह साल पुराना संघर्ष विराम समझौता 2015 में एकतरफा ढंग से तोड़ दिया था, पर उनके गुट का म्यांमा के साथ 2012 में हुआ संघर्ष विराम समझौता लागू है। क्या इसलिए कि खापलांग की सामुदायिक जड़ें म्यांमा में थीं? जो हो, एनएससीएन के हिंसक रवैए में फिलहाल कोई बदलाव नजर नहीं आता। इसलिए उसके खिलाफ सैन्य कार्रवाई अपरिहार्य हो जाती है।