मुंबई में एक पुल पर भगदड़ की वजह से बाईस लोगों की मौत ऐसी घटनाओं की ही एक कड़ी है, जिन्हें आमतौर पर दुर्घटना का नाम दे दिया जाता है। फिर हादसे को ही केंद्र में रख कर होने वाली जांच की रिपोर्ट पर कार्रवाई क्या होती है, इसके बारे में आम लोगों को शायद ही कुछ पता चल पाता है। शुक्रवार को मुंबई में परेल और एलफिंस्टन रोड स्टेशनों को जोड़ने वाले ओवरब्रिज पर सबसे व्यस्त समय में बारिश के चलते लोग रुक गए थे। खबरों के मुताबिक वहां एक साथ चार ट्रेनें आर्इं और उनसे निकले लोग पुल के सहारे इधर से उधर जाने की कोशिश करने लगे। इस बीच किसी अफवाह ने भगदड़ की शक्ल ले ली और करीब दो दर्जन लोगों की जान चली गई। रेलमंत्री ने घटना की जांच के आदेश दे दिए हैं। संभव है कि जांच की रिपोर्ट में इस घटना को हादसे का दर्जा दे दिया जाए, कुछ मुआवजों की घोषणा हो और फिर सब कुछ पहले की तरह चलता रहे। लेकिन यह सोचने की जरूरत है कि ऐसे हादसे क्या सचमुच किसी संयोग की वजह से होते हैं, या फिर व्यवस्था में गहरे पैठी लापरवाही और बदइंतजामी लोगों की जान लील रही है।
आखिर वे कौन-सी वजहें हैं कि काफी समय से जिस पुल को हादसे के जोखिम से भरा हुआ बताया जा रहा था, दैनिक यात्रियों की ओर से भी शिकायतें की जा रही थीं, उसे नए सिरे से बनाने या फिर चौड़ा करने के लिए कोई पहलकदमी नहीं की गई। शिवसेना सांसदों ने भी पुल को चौड़ा करने के लिए पत्र लिखा था, लेकिन तत्कालीन रेलमंत्री सुरेश प्रभु ने मंदी का हवाला देकर तब इस मांग को टाल दिया। सवाल है कि मंदी की दलील बुलेट ट्रेन जैसी बेहद खर्चीली परियोजनाओं के मामले में क्यों नहीं दी जाती है? अब घटना के बाद, जैसा कि अपेक्षित है, वहां नया पुल बनाने की घोषणा होगी और उसे शायद जल्द पूरा भी किया जाएगा। सवाल है कि क्या इसके लिए ऐसे किसी हादसे का इंतजार किया जा रहा था? इस हादसे के लिए, जिसने बाईस लोगों की जान ले ली, आखिरी तौर पर किसकी जवाबदेही बनती है? इस तरह की आपराधिक अनदेखी और लापरवाही बरतने वाले तंत्र में बैठे वे कौन लोग होते हैं, जिन्हें इसकी फिक्र नहीं होती कि उनके रवैये की वजह से कितने लोगों की जान जा सकती है?
ऐसी घटनाओं की जांच आमतौर पर भीड़, अफवाह, भगदड़ और हादसे की दलील में उलझ कर रह जाती है और घटनास्थल की स्थिति के लिए जिम्मेवार व्यक्तियों पर शायद ही कभी आंच आती है। देश भर में धार्मिक आयोजनों के दौरान भी भगदड़ में बड़ी तादाद में लोगों के मारे जाने की बहुत सारी घटनाएं हो चुकी हैं। जरूरत इस बात की है कि भीड़भाड़ वाली जगहों पर व्यवस्था की जिम्मेदारी जिन आयोजकों, संबंधित महकमों और अधिकारियों पर होती है, उन्हें भी ऐसी घटनाओं के लिए सीधे जवाबदेह बनाया जाए। ऐसे हादसों के मद््देनजर जागरूकता कार्यक्रम के तहत लोगों को भी इस बात के लिए प्रशिक्षित और जागरूक किया जाना चाहिए कि अचानक भगदड़ की स्थिति में बदहवास होने के बजाय होश से काम लें और क्या करें क्या न करें! ऐसी घटनाओं को रोकने और त्रासदी को न्यूनतम करने के लिए प्रशासनिक और सामाजिक स्तर पर अभी बहुत कुछ किए जाने की जरूरत है।
