संसदीय लोकतंत्र सुचारु रूप से और संतोषजनक ढंग से काम करे, इसके लिए जरूरी है कि हमारी विधायिका में वही लोग जाएं जिनका दामन पाक-साफ हो। पर तथ्य बताते हैं कि हर चुनाव के बाद संसद और विधानसभाओं में ऐसे लोगों की संख्या और बढ़ जाती है जिनकी आय और संपत्ति के बीच कोई तार्किक मेल नहीं होता। इस पर लगाम कसने के मकसद से चुनाव के लिए पर्चा भरते समय उम्मीदवारों को अपनी, जीवनसाथी और आश्रितों की संपत्ति का ब्योरा देना अनिवार्य किया गया। पर इससे उनकी बेतहाशा कमाई पर रोक लग पाना मुश्किल ही बना रहा है। ऐसे में सर्वोच्च न्यायालय के ताजा फैसले से कुछ बेहतर नतीजे की उम्मीद बनी है।
न्यायालय ने कहा है कि सभी उम्मीदवारों को अपनी, जीवनसाथी और आश्रितों की संपत्ति का ब्योरा देने के साथ-साथ सब की आय का स्रोत भी बताना होगा। यह भी स्पष्ट करना होगा कि उनकी या उनके किसी परिजन की कंपनी ने कभी सरकारी टेंडर हासिल किया या नहीं। अदालत ने सरकार को निर्देश दिया है कि वह एक ऐसा तंत्र विकसित करे, जो जनप्रतिनिधियों की संपत्ति में वृद्धि पर नजर रखे और उनके खिलाफ जांच या कार्रवाई की सिफारिश कर सके। अदालत ने कहा है कि एक स्वस्थ लोकतंत्र के लिए चुनाव प्रक्रिया की पवित्रता बेहद जरूरी है; सांसदों-विधायकों द्वारा संपत्ति की जमाखोरी पर रोक नहीं लगाई गई तो यह सिलसिला लोकतंत्र के विनाश की ओर बढ़ेगा और इससे माफिया राज का रास्ता खुल जाएगा।
ऐसे अनेक राजनीतिकों के उदाहरण मौजूद हैं, जो बहुत कमजोर आर्थिक पृष्ठभूमि से आकर चुनाव लड़े, फिर लोकसभा या विधानसभा में पहुंचे और पांच साल बाद उनके पास करोड़ों की संपत्ति आ गई। इसका खुलासा भी उनके अगली बार चुनाव का पर्चा भरते समय दाखिल हलफनामे से हो जाता है। जाहिर-सी बात है, वह सब उन्होंने जनप्रतिनिधि के तौर पर मिले अपने वेतन के बल पर अर्जित नहीं किया होगा। एक अध्ययन के मुताबिक सैंतीस सांसदों और दो सौ सत्तावन विधायकों की संपत्ति में बेहद अतार्किक वृद्धि हुई। पांच गुने से लेकर करीब इक्कीस गुना तक। इस तरह धन-संपत्ति जुटाने में उन्हें हिचक इसलिए नहीं होती थी क्योंकि यह बताना अनिवार्य नहीं था कि उन्होंने उसे किन स्रोतों से हासिल किया। अब सर्वोच्च न्यायालय के ताजा आदेश के बाद उन्हें बेतहाशा संपत्ति जुटाने में शायद कुछ संकोच हो।
अगर उस पर नजर रखने और उसके बारे में पूछताछ करने का कोई कारगर तंत्र विकसित होगा, तो उनकी संपत्ति की भूख पर निस्संदेह कुछ लगाम लगेगी। यह भी होगा कि बहुत-से लोग अपनी संपत्ति का सही ब्योरा पेश करने के बजाय उसे छिपाएंगे। बेनामी संपत्ति पर काबू पाना सरकार के लिए अब भी बड़ी चुनौती है। फिर अपने परिजनों, नजदीकी रिश्तेदारों के नाम कंपनियां खोल कर जुटाई गई धन-संपत्ति अलग मसला है। जनप्रतिनिधियों के पास आय से अधिक संपत्ति आना भ्रष्टाचार पर काबू पाने में बड़ी बाधा है। यह भी स्पष्ट है कि इससे चुनाव प्रक्रिया में पारदर्शिता लाने, चुनाव खर्च पर लगाम कसने और मतदाताओं को धनबल के जरिए प्रभावित करने की प्रवृत्तियों को रोकना मुश्किल बना हुआ है। इस चुनौती से पार पाया जा सकता है अगर सर्वोच्च न्यायालय के ताजा आदेश का संजीदगी से पालन हो। सरकार की तरफ से भी कुछ गंभीर पहल होनी चाहिए। लोकपाल की शीघ्र नियुक्ति हो। सीबीआइ को स्वायत्त बनाया जाए। सूचना आयोगों के खाली पद शीघ्र भरे जाएं।
